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पिता की डाँट कैसे बन गई अपराध?

पिता की डाँट कैसे बन गई अपराध?

by हिंदी विवेक
in अवांतर
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कक्षा 11 में पढ़ने वाले एक किशोर को उसके पिता ने किसी बात पर डाँट दिया। बात वहीं समाप्त हो सकती थी, पर नहीं हुई। पुत्र को यह अपमान लगा। वह सीधे कोतवाली पहुँचा और पिता पर पिटाई का आरोप लगाते हुए तहरीर दे दी। पुलिस ने पिता को तलब किया।

भारत में पिता का डाँटना कभी अपराध की श्रेणी में नहीं आता था और वह घर की चारदीवारी के भीतर ही समाप्त हो जाता था। वह डाँट कठोर हो सकती थी, पर उसके भीतर चिंता होती थी— संतान के भविष्य की, उसके चरित्र की, उसके भटक जाने के भय की।

पिता की आवाज़ में अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व बोलता था। आज वही डाँट अपराध बन गई है। एक पिता ने अपने पुत्र को फटकार दिया और पुत्र सीधे थाने पहुँच गया। पिता पर मारपीट का आरोप लगा, तहरीर दी गई। मामला इतना बढ़ा कि वही पिता, जिसने जीवन भर अपने पुत्र को संभाला, उसी के पैरों में गिरकर माफी माँगता दिखाई दिया। यह दृश्य केवल एक घर की त्रासदी नहीं है; यह हमारे समय की मानसिकता का क्रूर चित्र है।
यह घटना उत्तर प्रदेश के देवरिया जनपद, सदर कोतवाली क्षेत्र की बताई जा रही है।

कक्षा 11 में पढ़ने वाले एक किशोर को उसके पिता ने किसी बात पर डाँट दिया। बात वहीं समाप्त हो सकती थी, पर नहीं हुई। पुत्र को यह अपमान लगा। वह सीधे कोतवाली पहुँचा और पिता पर पिटाई का आरोप लगाते हुए तहरीर दे दी। पुलिस ने पिता को तलब किया। पिता ने पूरी घटना बताई, शांत भाव से समझाने की कोशिश की, संवाद का रास्ता खोजा। पर पुत्र नहीं माना। वह बार-बार कार्रवाई की माँग करता रहा, अपने मामा को बुलाने की जिद करता रहा। अंततः पिता को अपने ही पुत्र के सामने झुकना पड़ा। तभी जाकर मामला शांत हुआ।

यह दृश्य देखकर मन केवल दुखी नहीं होता, वह सवाल भी करता है— हम यहाँ तक कैसे पहुँचे? क्या यह केवल एक बिगड़े हुए बच्चे की कहानी है या इसके पीछे कोई गहरी सामाजिक प्रक्रिया काम कर रही है?
इस प्रश्न का उत्तर केवल कानूनों या पीढ़ियों के टकराव में नहीं मिलता। इसके पीछे एक दीर्घकालिक वैचारिक निर्माण है— जिसे अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। यही वे शक्तियाँ हैं, जिन्हें हम सामान्य भाषा में ग्लोबल मार्केट फोर्सेज कहते हैं।

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बाज़ार को परिवार से कोई भावनात्मक शत्रुता नहीं होती, पर उसकी अपनी एक स्वार्थपूर्ण आवश्यकता होती है। बाज़ार को उपभोक्ता चाहिए— ऐसा उपभोक्ता जो अकेला हो, जड़ों से कटा हो, रिश्तों से मुक्त हो और हर समस्या का समाधान बाहर खरीदे।
परिवार व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाता है। वह उसे सहनशीलता, संयम और उत्तरदायित्व सिखाता है। यही बात बाज़ार के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा है। इसलिए परिवार को सीधे नहीं तोड़ा गया, बल्कि उसकी आत्मा को धीरे-धीरे कमजोर किया गया।

इस प्रक्रिया की शुरुआत विचारों से हुई। पिता को ‘पितृसत्ता’ का प्रतीक कहा गया— तानाशाह, शोषक, नियंत्रक। अनुशासन को दमन बताया गया। मर्यादा को पिछड़ापन कहा गया। स्वतंत्रता की ऐसी परिभाषा गढ़ी गई, जिसमें कर्तव्य का कोई स्थान नहीं था। अधिकार सर्वोपरि हो गए, उत्तरदायित्व गायब हो गया।
शिक्षा-पाठ्यक्रमों, मीडिया विमर्शों, मनोरंजन और सोशल मीडिया के माध्यम से यह विचार लगातार दोहराया गया कि व्यक्ति किसी के प्रति जवाबदेह नहीं है। परिवार उसकी स्वतंत्रता में बाधा है। विवाह बोझ है। माता-पिता का मार्गदर्शन हस्तक्षेप है।

जब यह विचार पीढ़ियों के मन में बैठ गया, तब उसका स्वाभाविक परिणाम सामने आने लगा— संवाद की जगह शिकायत, समझ की जगह कार्रवाई और घर की जगह थाना।
कानूनों का उद्देश्य संरक्षण होना चाहिए था, पर जब वे सामाजिक संतुलन से कटकर लागू होते हैं, तब वे अविश्वास को जन्म देते हैं। आज स्थिति यह है कि पिता मार्गदर्शक नहीं, संभावित अपराधी बनता जा रहा है। पुत्र शिष्य नहीं, अधिकार-सचेत उपभोक्ता बन गया है— जिसे ज़रा-सी असुविधा पर सिस्टम का उपयोग करना सिखाया गया है। यह संयोग नहीं है कि घर की बातें अब थाने में सुलझाई जा रही हैं।
यह भी सत्य है कि कुछ पिता स्वयं संतुलन खो बैठे हैं। अति-सख़्ती ने विद्रोह को जन्म दिया और अति-ढील ने अधिकारहीनता को। बच्चों को ‘आप-आप’ कहकर, हर सीमा मिटाकर, उन्होंने अनजाने में बच्चों को ही निर्णयकर्ता बना दिया। पर यह भ्रम भी उसी वातावरण में पनपा है, जहाँ अनुशासन को हिंसा और स्नेह को कमजोरी बताया गया।

परिवार किसी एक भावना से नहीं चलता। वह संतुलन से चलता है— प्यार, दुलार, भय, चिंता और विश्वास के समन्वय से। यही संतुलन परिवार की आत्मा है और यही संतुलन बाज़ार के लिए असुविधाजनक है, क्योंकि असंतुलित मन अधिक खरीदता है, अधिक निर्भर होता है और अधिक अकेला होता है।
जो क्रोध, जो अहंकार, जो निष्ठुरता, जो परायापन और परपीड़ा का सुख आज हमारे घरों में दिख रहा है, वह बाहर से नहीं आया। उसे वर्षों तक गढ़ा गया है। और अब वही लौटकर हमारे अपने घरों में दस्तक दे रहा है— पिता के झुके हुए सिर के रूप में और पुत्र की कठोर जिद के रूप में।

राम का आदर्श केवल धार्मिक प्रतीक नहीं है। वह संतुलन का प्रतीक है— कर्तव्य और करुणा का, अनुशासन और स्नेह का। उस आदर्श के बिना जो समाज रचा जा रहा है, वह टिकाऊ नहीं हो सकता। क्योंकि जब परिवार टूटता है, तो समाज बिखरता है। और जब समाज बिखरता है, तब राज्य के कमजोर होने में देर नहीं लगती। आज जब एक पिता अपने ही पुत्र से घर की इज्जत बचाने के लिए भीख माँगने को विवश हो जाए, तब समझ लेना चाहिए कि यह किसी एक घर की विफलता नहीं है। यह उस व्यवस्था का परिणाम है, जिसने बाज़ार को सर्वोपरि और परिवार को बाधा मान लिया है।
यह भविष्य की चेतावनी नहीं है।
यह वर्तमान है।

 

-दीपक कुमार द्विवेदी

 

 “इस बारे में आपकी क्या राय है? नीचे कमेंट्स में बताएं।”

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Tags: #father #love #son #police

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