| डोनाल्ड ट्रंप के लिए नोबेल पुरस्कार अब सम्मान का विषय नहीं, बल्कि मान-अपमान की लड़ाई बन चुकी है। वे इसे व्यक्तिगत प्रतिष्ठा से जोड़ चुके हैं। परिणामस्वरूप उनका आचरण एक जिम्मेदार राष्ट्राध्यक्ष से अधिक, एक नाराज़ और प्रतिशोधी व्यक्ति जैसा दिखने लगा है। |
डोनाल्ड ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार न मिलना मात्र एक व्यक्तिगत निराशा नहीं है, बल्कि उन्होंने इसे अपनी राजनीतिक प्रतिष्ठा और अहं से जोड़ दिया है। परिणामस्वरूप आज वैश्विक मंच पर जो चित्र उभर रहे हैं, वह किसी जिम्मेदार विश्व नेता का नहीं, बल्कि एक ऐसे राष्ट्राध्यक्ष का है जो पुरस्कार न मिलने की बौखलाहट में पूरे विश्व के सामने अपनी नाराजगी दिखाने पर उतारू है।
हिंदी की कहावत इस पर चरितार्थ होती है ‘खिसियानी बिल्ली खम्बा नोचे’ नोबेल पुरस्कार को लेकर ट्रंप द्वारा अब तक दिए गए बयान, पोस्ट और इशारे यह स्पष्ट करते हैं कि उन्होंने इसे अपनी नाक का सवाल बना लिया है। कनाडा, वेनेजुएला, नार्वे और ग्रीनलैंड को लेकर दिए गए उनके दावे इसी मानसिकता के परिचायक हैं। मानो विश्व को यह संदेश दिया जा रहा हो कि मुझे शांति का पुरस्कार नहीं दिया है, तो शांति बनाए रखने की जिम्मेदारी भी मेरी नहीं। यह सोच न केवल भयावह है, बल्कि वैश्विक राजनीति को हास्यास्पद स्तर तक ले जाती है।
नॉर्वे के प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए वक्तव्य में यह स्पष्ट है कि नोबेल पुरस्कार सरकार नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र समिति तय करती है। इसके बावजूद भी ट्रंप का निरर्थक रुख नहीं बदला है। ग्रीनलैंड पर कब्जे को लेकर उनका तर्क है कि यदि हमने नहीं लिया तो चीन और रूस ले लेंगे। दरअसल यह भय का ऐसा नैरेटिव है, जिसका उद्देश्य आंतरिक राजनीति में स्वयं को मजबूत दिखाना और बाहरी दुनिया को धमकाना है।
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा को 2009 में नोबेल शांति पुरस्कार मिला। यह पुरस्कार तब मिला, जब ओबामा ने न तो कोई बड़ा शांति समझौता किया था और न ही विश्व स्तर पर युद्ध समाप्त करने जैसा ठोस प्रत्यक्ष कार्य सामने था। इसी तथ्य को लेकर डोनाल्ड ट्रंप के मन में गहरा असंतोष और पीड़ा है। ट्रंप का तर्क है कि उन्होंने अपने कार्यकाल में आठ युद्ध और संघर्ष रुकवाने में भूमिका निभाई, इसके बावजूद उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से वंचित रखा गया। यही तुलना, यही हीनभाव और यही अहं आज डोनाल्ड ट्रंप की राजनीति और वैश्विक व्यवहार को विकृत रूप में सामने ला रहा है।
यहां प्रश्न केवल ट्रंप की व्यक्तिगत मगरूरी या मूर्खता का नहीं है बल्कि असली चिंता इस बात की है कि अमेरिका जैसा वैश्विक नेतृत्व करने वाला देश यदि इस प्रकार की अस्थिर और आवेगपूर्ण राजनीति का प्रदर्शन करे, तो विश्व व्यवस्था पर उसका क्या प्रभाव पड़ेगा। यूरोप और नाटो जैसे पारंपरिक सहयोगियों के साथ ट्रंप का टकराव उनकी भाषा और धमकियों में झलकती है। मित्र देशों को भी शत्रु की तरह देखना और शत्रुओं को सौदेबाजी की वस्तु बनाना, यह अमेरिका की उस नीति से उलट है जिसने उसे विश्व का नेतृत्वकर्ता बनाया।
संपूर्ण विश्व आज अमेरिका को सम्मान और भरोसे की दृष्टि से नहीं तो आशंका व व्यंग्यतात्मक दृष्टि से अधिक देखने लगा है। क्या यह मगरूरी है या बेवकूफी? शायद दोनों का मिश्रण होगा। मगर यह मिश्रण विश्व के सामने एक खतरनाक उदाहरण प्रस्तुत करता है कि ट्रंप को शांति पुरस्कार न मिलने की टीस यदि राष्ट्र के सीमाओं का उल्लंघन, धमकियां और सहयोगियों से दूरी का कारण बने, तो यह केवल ट्रंप की विफलता नहीं, बल्कि अमेरिकी लोकतांत्रिक संतुलन की भी परीक्षा है। विश्व समुदाय के लिए यह समय सतर्क रहने का है न की ट्रंप की धमकियों से डरने का और न ही उन्हें हल्के में लेने का।
यूरोप के कुछ देशों, विशेषकर फ्रांस को लेकर डोनाल्ड ट्रंप जैसी आक्रामक भाषा और धमकियाँ वैश्विक राजनीति में गंभीर परिणाम पैदा कर सकती हैं, लेकिन इसे सीधे-सीधे तीसरे महायुद्ध की शुरुआत कहना तो जल्दबाजी हो सकती है। इस प्रश्न को भावनाओं से नहीं तो रणनीतिक विवेक के संदर्भ में समझना होगा। यूरोप, विशेषकर फ्रांस और जर्मनी, अब अमेरिका पर आँख बंद कर भरोसा करने की स्थिति में नहीं हैं। यदि अमेरिका ही अपने सहयोगियों को धमकाने लगे तो नाटो का नैतिक और राजनीतिक आधार कमजोर होगा, इस बर्ताव से यूरोप में अमेरिका-विरोधी भावना बढ़ेगी।

क्या तीसरा महायुद्ध अमेरिका के विरुद्ध लड़ा जाएगा? इस बात का सीधा उत्तर पारंपरिक युद्ध के रूप में नहीं, लेकिन रणनीतिक रूप में खेला जाएगा। फ्रांस या यूरोप अमेरिका के खिलाफ खुला युद्ध नहीं छेड़ेगा। परमाणु हथियारों के युग में सीधा महायुद्ध आत्मघाती होगा, लेकिन खतरा कहाँ है?तीसरा महायुद्ध यदि हुआ, तो वह इस तरह होगा: प्रत्यक्ष युद्ध नहीं, बल्कि बहु-स्तरीय संघर्ष आर्थिक युद्ध , तकनीकी युद्ध, प्रॉक्सी युद्ध, मित्र राष्ट्र की संकल्पना में पुनर्गठन जैसे ही रूप में होगा। ट्रंप की नीति से सबसे बड़ा खतरा युद्ध नहीं, बल्कि अविश्वसनीय नेतृत्व है। जब व्यक्तिगत अहं राष्ट्रीय नीति बन जाता है तब दुनिया अराजकता की ओर बढ़ती है। ट्रंप की धमकियाँ युद्ध को जन्म नहीं देतीं, लेकिन वे युद्ध रोकने वाली संस्थाओं को कमजोर ज़रूर करती हैं।
युद्ध से पहले पतन आता है, इतिहास बताता है
महायुद्ध अचानक नहीं होते, पहले भरोसा टूटता है, संस्थाएँ कमजोर होती हैं और फिर कोई छोटी चिंगारी बड़ा विस्फोट बन जाती है डोनाल्ड ट्रंप की भाषा और रवैया तीसरे महायुद्ध की घोषणा नहीं, लेकिन युद्ध से पहले पतन आता है। अमेरिका का पतन शायद प्रारंभ हो रहा है।
डोनाल्ड ट्रंप के लिए नोबेल पुरस्कार अब सम्मान का विषय नहीं, बल्कि मान-अपमान की लड़ाई बन चुकी है। वे इसे व्यक्तिगत प्रतिष्ठा से जोड़ चुके हैं। परिणामस्वरूप उनका आचरण एक जिम्मेदार राष्ट्राध्यक्ष से अधिक, एक नाराज़ और प्रतिशोधी व्यक्ति जैसा दिखने लगा है। इसी मानसिक विकृति के कारण ट्रंप ने वैश्विक राजनीति की मर्यादाएं तोड़ दी है। नोबेल पुरस्कार किसी व्यक्ति का प्रमाणपत्र नहीं, बल्कि शांति के आदर्शों का सम्मान है। यदि कोई नेता उस सम्मान के अभाव में पूरे विश्व को अस्थिर करने पर उतारू हो जाए, तो यह स्पष्ट संकेत है कि समस्या पुरस्कार में नहीं, ट्रंप के नेतृत्व की मानसिकता में है। और यही मानसिकता आज वैश्विक राजनीति के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरी है।
