| डॉ. मोहन जी भागवत के सम्बोधनों की सबसे उल्लेखनीय विशेषता यही है कि वे उत्तेजना पैदा नहीं करते। भीड़ को नहीं, विवेक को सम्बोधित करते हैं और हर प्रश्न का उत्तर नारे में नहीं, विचार में देते हैं। उनकी भाषा में न तो कटुता है, न ही कृत्रिम मधुरता बल्कि वह भाषा है जो समाज को सोचने के लिए विवश करती है। |
भारत आज जिस कालखंड से गुजर रहा है, वह सामान्य ऐतिहासिक संक्रमण नहीं है। यह वह समय है जब एक राष्ट्र अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता के बाद मानसिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक स्वतंत्रता को पुनः परिभाषित कर रहा है। सत्ता-परिवर्तन, आर्थिक सुधार और तकनीकी प्रगति इस प्रक्रिया के बाहरी आयाम हैं, किंतु भीतर गहरे स्तर पर भारत एक प्रश्न से जूझ रहा है, हम कौन हैं? हमारी दिशा क्या है? और आने वाली पीढ़ियों के लिए हम कैसा भारत छोड़कर जाना चाहते हैं? इसी प्रश्नभूमि में आज जिस बौद्धिक नेतृत्व की चर्चा सर्वाधिक प्रासंगिक होती जा रही है, वह है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पू. सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी का नेतृत्व। यह नेतृत्व न तो किसी संवैधानिक पद की उपज है, न ही मीडिया-निर्मित छवि का परिणाम। यह उभार विचारों की निरंतरता, राष्ट्र, सम्मान हित से जुड़ी दृष्टि की स्पष्टता और समय की कसौटी पर खरे उतरते मार्गदर्शन का स्वाभाविक निष्कर्ष है।
वर्तमान के परिप्रेक्ष्य में नेतृत्व को प्रायः सत्ता, प्रभाव और निर्णय लेने की तात्कालिक क्षमता से जोड़ दिया गया है, परंतु भारतीय चिंतन परम्परा में नेतृत्व का अर्थ इससे कहीं व्यापक और गहन है। भारतीय दृष्टि में नेता वह नहीं जो केवल आदेश दे बल्कि वह है जो समाज को उसकी आत्म-पहचान से जोड़ सके, वहीं सच्चा नेतृत्व होता है। वर्तमान संकटों को पार करने की दृष्टि और भविष्य के लिए मूल्याधारित दिशा प्रस्तुत कर सके। इस कसौटी पर परखें तो स्पष्ट होता है कि डॉ. मोहन भागवत जी का विविधांगी नेतृत्व आज के राजनीतिक नेतृत्व से भिन्न श्रेणी में आता है। यह नेतृत्व सत्ता-केंद्रित नहीं बल्कि चेतना-केंद्रित है।
बौद्धिक नेतृत्व वह होता है जो तत्काल तालियां नहीं बल्कि दीर्घकालिक परिवर्तन उत्पन्न करता है। डॉ. मोहन भागवत जी के सम्बोधनों की सबसे उल्लेखनीय विशेषता यही है कि वे उत्तेजना पैदा नहीं करते, भीड़ को नहीं, विवेक को सम्बोधित करते हैं और हर प्रश्न का उत्तर नारे में नहीं, विचार में देते हैं। उनकी भाषा में न तो कटुता है, न ही कृत्रिम मधुरता। वह भाषा है जो समाज को सोचने के लिए विवश करती है। यही कारण है कि उनके वक्तव्य प्रायः विवाद का नहीं बल्कि गम्भीर विमर्श का विषय बनते हैं।
यदि पिछले एक दशक के डॉ. मोहन जी भागवत के बौद्धिक सम्बोधनों को समग्रता में देखा जाए तो यह स्पष्ट होता है कि उनमें तीन स्तरों पर दिशा-दर्शन मिलता है।
डॉ. मोहन जी भागवत का पहला आग्रह, व्यक्ति के आचरण पर होता है। वे बार-बार यह रेखांकित करते हैं कि राष्ट्र निर्माण का प्रारम्भ सत्ता से नहीं, संस्कार से होता है। उनके अनुसार अनुशासन, संयम, कर्तव्यबोध और समाज के प्रति उत्तरदायित्व, ये राष्ट्रवाद के मौलिक तत्व हैं। यह दृष्टि उपभोक्तावादी और अधिकार केंद्रित आधुनिक विमर्श से अलग खड़ी दिखाई देती है। उनका दूसरा प्रमुख, फोकस समाज की संरचना पर है। वे स्पष्ट रूप से कहते हैं कि भारत की शक्ति उसकी विविधता में है, पर यह विविधता संघर्ष नहीं, समन्वय से संचालित होनी चाहिए।
जाति, भाषा, पंथ और क्षेत्र के नाम पर होने वाले विभाजन के संदर्भ में उनका दृष्टिकोण स्पष्ट है, अस्मिता आवश्यक है, पर अस्मिता यदि श्रेष्ठता बोध में बदले तो वह समाज को तोड़ती है। इस समरसतापूर्ण दृष्टि के कारण ही उनका नेतृत्व टकराव की राजनीति से ऊपर दिखाई देता है। उनका तीसरा स्तर, राष्ट्र से आगे जाकर विश्व तक विस्तृत होता है। वे भारत को किसी साम्राज्यवादी शक्ति के रूप में नहीं बल्कि मार्गदर्शक सभ्यता के रूप में देखते हैं। उनके अनुसार भारत का विचार ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ पर आधारित है। विश्व की समस्याओं का समाधान भारत की सांस्कृतिक दृष्टि में निहित है। यह दृष्टि भारत को न तो उपदेशक बनाती है, न ही आत्मकेंद्रित। यह भारत को वैश्विक संतुलनकर्ता के रूप में प्रस्तुत करती है।
भारत आज केवल एक ऐतिहासिक परिवर्तन के दौर से नहीं गुजर रहा बल्कि वह अपनी सभ्यतागत चेतना के पुनर्जागरण के निर्णायक चरण में प्रवेश कर चुका है। राम मंदिर पुनरुद्धार से लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष तक का यह कालखंड भारत के सामाजिक मानस को नई दिशा दे रहा है।
इस सम्पूर्ण वैचारिक परिवर्तन के केंद्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पू. सरसंघचालक डॉ. मोहन जी भागवत का बौद्धिक नेतृत्व स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। उनके सम्बोधन केवल वक्तव्य नहीं हैं बल्कि वे भारत के भविष्य की वैचारिक रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं।
राम मंदिर आंदोलन की सफलता को अनेक लोग राजनीतिक या धार्मिक विजय के रूप में देखते हैं, पर डॉ. मोहन जी भागवत ने इस विजय को संयम और सामाजिक परिपक्वता की कसौटी बना दिया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि राम मंदिर संघर्ष का अंत, उत्तरदायित्व का आरम्भ है। अब किसी को जीत-हार का उन्माद नहीं बल्कि समाज को जोड़ने की भूमिका निभानी है। यह कथन हिंदू समाज को आत्मनिरीक्षण की ओर ले जाता है।
सदियों के संघर्ष के बाद प्राप्त यह क्षण यदि अहंकार में परिवर्तित होता तो वह भारत की आत्मा के विरुद्ध होता। ऐसे ऐतिहासिक एवं निर्णायक मोड़ पर डॉ. मोहन जी भागवत का बौद्धिक इसीलिए विशिष्ट है, वह विजय को भी सनातन संस्कार में ढालने की बात करता है।
वर्तमान सार्वजनिक विमर्श में विरोधी विचारधाराओं ने हिंदुत्व को या तो भय का विषय बनाया है या उग्रता का। डॉ. मोहन जी भागवत ने इस कृत्रिम द्वंद्व को तोड़ते हुए हिंदुत्व को उसके मूल स्वरूप में प्रस्तुत किया, जो सबको साथ लेकर चलता है। जो विविधता को कमजोरी नहीं, शक्ति मानता है। जो आत्मरक्षा सिखाता है, पर आक्रामकता नहीं। उनका यह स्पष्ट संदेश कि हिंदू समाज को स्वयं सशक्त होना है, किसी के विरोध में नहीं, आज के वर्तमान भारत में अत्यंत प्रासंगिक है।
आज का भारतीय युवा ऊर्जा से भरा है, पर दिशा को लेकर भ्रमित भी है। एक ओर वैश्विक अवसर हैं, दूसरी ओर सांस्कृतिक जड़ों से कटने का संकट। डॉ. मोहन भागवत जी के बौद्धिक से युवा मन सेे आत्मगौरव का पुनर्स्थापन, राष्ट्रीयता की सकारात्मक परिभाषा और जीवन को मिशन में बदलने का आग्रह, इन तीन स्तरों पर आकर्षित करते हैं।
युवाओं को बताया जा रहा है कि भारतीय होना, हिंदू होना, पिछड़ेपन का नहीं बल्कि वैश्विक मानवता को दिशा देने वाली परम्परा का हिस्सा होना है। यह राष्ट्रवाद न तो उग्र है, न ही प्रतिक्रियात्मक। यह राष्ट्रवाद सेवा, अनुशासन और सामाजिक उत्तरदायित्व से जुड़ा है। संघ का कार्य युवा को करियर के साथ किरदार जोड़ना सिखाता है। यही कारण है कि आज बड़ी संख्या में शिक्षित, तकनीकी और पेशेवर युवा संघ की ओर आकर्षित हो रहे हैं।

हिंदू समाज की सबसे बड़ी कमजोरी लम्बे समय तक उसका असंगठित स्वरूप रहा है। डॉ. मोहन जी भागवत के सम्बोधन इस कमजोरी को स्वीकारते भी हैं और उस पर तंज करते हुए समाधान भी प्रस्तुत करते हैं। जातिगत विभाजन पर स्पष्ट संवाद सामाजिक समरसता पर निरंतर बल देते हैं। मंदिर, मठ और परम्पराओं को समाज सेवा से जोड़ने का आग्रह, यह दृष्टि हिंदू जागरण को केवल भावनात्मक आंदोलन नहीं बल्कि संगठित सामाजिक चेतना में रूपांतरित कर रही है।
संघ शताब्दी वर्ष में आत्ममंथन और आत्मविस्तार का साक्षात्कार कराने का प्रयास डॉ. मोहन जी भागवत ने अपने सम्बोधन में किया है। संघ के शताब्दी वर्ष निमित्त रा. स्व. संघ के स्वयंसेवकों से संवाद करते हुए वे कहते हैं कि संघ का शताब्दी वर्ष उत्सव का नहीं, उत्तरदायित्व के विस्तार का अवसर है। यह संदेश डॉ. मोहन भागवत जी बार-बार देते हैं। उन्होंने स्वयंसेवकों से अपेक्षा की है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वयंसेवक समाज में दिखाई देना आवश्यक है, सिर्फ प्रचार में नहीं।
स्वयंसेवक सेवा में अग्रणी रहें, मंचों पर नहीं। स्वयंसेवक समाज से संवाद करें, टकराव नहीं। डॉ. मोहन जी भागवत ने रा. स्व. संघ के विश्व भर के स्वयंसेवकों से स्थापित किया हुआ यह संवाद और संवाद से प्रस्तुत हुआ यह दृष्टिकोण रा. स्व. संघ को एक मौन, परंतु प्रभावी राष्ट्रनिर्माता के रूप में स्थापित करता है।

डॉ. मोहन जी भागवत का सांस्कृतिक दृष्टिकोण उल्लेखनीय है क्योंकि वह संस्कृति को संग्रहालय में बंद नहीं करते। उनके लिए संस्कृति का अर्थ है परिवार व्यवस्था। संस्कृति का अर्थ है स्त्री सम्मान। संस्कृति का अर्थ है प्रकृति के साथ संतुलन। संस्कृति का अर्थ है ‘स्व’ और समाज के बीच सामंजस्य। संस्कृति का अर्थ समाज की समरसता है। डॉ. मोहन जी भागवत ने अपने उद्बोधन से प्रस्तुत की हुई सनातन भारत की यह संस्कृति एवं दृष्टि भारत को केवल विकासशील नहीं बल्कि दिशादर्शक राष्ट्र बनाने में सहयोग दे सकती है।
संघ के शताब्दी वर्ष निमित्त पिछले सम्पन्न किए हुए कार्यों को देखते हुए भविष्य में स्वयंसेवकों को अपने कार्य की दिशा देने हेतु मार्गदर्शन करते समय उन्होंने अमृत काल का विषय स्वयंसेवकों के सामने प्रस्तुत किया है। अमृत काल का उनका ‘संदेश’ केवल स्वयंसेवकों तक सीमित नहीं है बल्कि उसके साथ सारे भारतवर्ष के समस्त नागरिकों को दिया एक ‘संकल्प’ है। वे कहते हैं कि ‘विकसित भारत’ बनाना केवल सरकार का काम नहीं है, उसमें समाज का भी योगदान होना अत्यंत आवश्यक है। जहां शासन अमृतकाल को योजनाओं और आंकड़ों से जोड़ता है, वहीं डॉ. मोहन जी भागवत उसे चरित्र निर्माण का कालखंड बताते हैं।
उनका स्पष्ट आग्रह है कि यदि समाज नहीं बदला तो कोई भी नीति स्थाई नहीं हो सकती। सामाजिक समरसता, कुटुम्ब प्रबोधन, स्व-बोध, पर्यावरण एवं नागरिक कर्तव्य इन विषयों के संदर्भ में समाज में जो उदासीनता है, उस उदासीनता को दूर करने हेतु हम सभी को अपने आप में व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के रूप में परिवर्तन लाना आवश्यक है, इस संदर्भ में डॉ. मोहन जी भागवत का यह कथन भारत के उज्ज्वल भविष्य की कुंजी है। डॉ. मोहन जी भागवत के नेतृत्व का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष है, संगठनात्मक अनुशासन और परम्परा-निष्ठा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में पू. सरसंघचालक का पद किसी व्यक्ति पूजा का केंद्र नहीं है।

यह पद एक उत्तरदायित्वपूर्ण परम्परा का वाहक है। डॉ. मोहन जी भागवत इस परम्परा को आगे बढ़ाते हुए यह सुनिश्चित करते हैं कि संगठन व्यक्ति से बड़ा रहे, विचार व्यक्ति से ऊपर रहे और नेतृत्व सेवा का पर्याय बना रहे। यही कारण है कि संघ में सेवा कार्य, आपदा प्रबंधन, शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक समरसता और ग्रामीण विकास इन सभी क्षेत्रों में स्वयंसेवकों की सक्रियता ‘विचार से कर्म तक’ की यात्रा को दर्शाती है।
वैश्वीकरण के दौर में जब अस्मिता की राजनीति उग्र होती जा रही है, तब डॉ. मोहन जी का संदेश संतुलन का है। वे विश्व के हिंदुओं को अपनी सांस्कृतिक पहचान पर गर्व करने की प्रेरणा देते हैं, पर साथ ही यह भी स्पष्ट करते हैं कि हिंदुत्व का अर्थ किसी का विरोध नहीं, उनका हिंदुत्व एक समावेशी जीवन दर्शन है, जो मानवता को जोड़ता है, न कि विभाजित करता है।
आज का समाज शोर से थक चुका है। वह ऐसे नेतृत्व की खोज में है जो भावनाओं का शोषण न करे, समस्याओं को सरल नारों में न बांधे और भविष्य को लेकर स्पष्ट, संतुलित दृष्टि दे। डॉ. मोहन जी का नेतृत्व इसीलिए ऊपरी स्तर पर आता दिखाई देता है क्योंकि वह क्षणिक लोकप्रियता नहीं, दीर्घकालिक दिशा प्रदान करता है। डॉ. मोहन जी भागवत के बौद्धिक और सम्बोधन आज जिस प्रकार हिंदू समाज और युवाओं के मन को प्रभावित कर रहे हैं, वह क्षणिक नहीं हो सकते, यह एक दीर्घकालिक वैचारिक निवेश है। भारत आज केवल परिवर्तन के दौर से नहीं गुजर रहा बल्कि वह अपने इतिहास और भविष्य के बीच खड़े होकर यह तय कर रहा है कि वह केवल एक उभरती शक्ति बनेगा या सभ्यता का दिशादर्शक राष्ट्र।
डॉ. मोहन जी भागवत ने अब तक प्रस्तुत किए हुए विविध विचार आने वाले भविष्य में आत्मगौरव में परिवर्तित हो, सशक्त संगठन में ढले और सेवा में प्रकट हों तो भविष्य का भारत केवल आर्थिक या सामरिक शक्ति नहीं होगा बल्कि वह सभ्यता की अगली राह दिखाने वाला राष्ट्र बनेगा। और कदाचित् यही इस अमृतकाल का वास्तविक अर्थ है।
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