वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा 1 फरवरी को प्रस्तुत केंद्रीय बजट 2026-27 को यदि शिक्षा के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो यह बजट मात्र भारत की सामाजिक संरचना, युवा आकांक्षाओं और आर्थिक भविष्य को एक नई दिशा देने का प्रयास प्रतीत होता है।
सरकार ने शिक्षा बजट में 8.27 प्रतिशत की वृद्धि कर 1,39,289 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है, जो नि:संदेह यह संकेत देता है कि शिक्षा को विकास की धुरी मानने की सोच अभी जीवित है। हालांकि सवाल यह भी है कि क्या यह वृद्धि देश की विशाल युवा आबादी, क्षेत्रीय असमानताओं और शिक्षा की गुणवत्ता से जुड़ी चुनौतियों के मुकाबले पर्याप्त है या फिर यह केवल एक प्रतीकात्मक कदम बनकर रह जाएगी।
इस बजट का सबसे अधिक चर्चित और सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण प्रस्ताव देश के हर जिले में गर्ल्स हॉस्टल निर्माण की घोषणा है। 789 जिलों में छात्रावासों की यह योजना बालिका शिक्षा को लेकर लंबे समय से चली आ रही संरचनात्मक बाधाओं को तोड़ने का प्रयास है।

ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में आज भी शिक्षा छोड़ने की सबसे बड़ी वजह सुरक्षा, आवास और सामाजिक दबाव हैं। यदि यह योजना समयबद्ध, पारदर्शी और गुणवत्तापूर्ण ढ़ंग से लागू होती है तो यह न केवल उच्च शिक्षा में लड़कियों की भागीदारी बढ़ाएगी बल्कि स्टैम (एसटीईएम) जैसे क्षेत्रों में उनकी मौजूदगी को भी मजबूत करेगी। किंतु यहां यह चिंता भी उभरती है कि पूर्व में घोषित कई छात्रावास योजनाएं अधूरी इमारतों, अपर्याप्त सुविधाओं और संचालन के अभाव में दम तोड़ चुकी हैं। बजट घोषणा के साथ-साथ राज्यों के साथ समन्वय, रखरखाव और सामाजिक जागरूकता पर भी उतना ही जोर जरूरी होगा।
सरकार का ‘एजुकेशन टू एम्प्लॉयमेंट एंड एंटरप्राइज’ दृष्टिकोण इस बजट की वैचारिक रीढ़ कहा जा सकता है। उच्च शिक्षा और रोजगार के बीच की खाई भारतीय शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी विफलताओं में से एक रही है। इस अंतर को पाटने के लिए हाई-पावर स्थायी समिति के गठन की घोषणा स्वागत योग्य है लेकिन भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में केवल समितियों से बदलाव की उम्मीद करना बेमानी होगा। जब तक पाठ्यक्रम, मूल्यांकन प्रणाली और फैकल्टी ट्रेनिंग में ठोस सुधार नहीं होंगे, तब तक डिग्रीधारी लेकिन बेरोजगार युवाओं की समस्या बनी रहेगी। समिति का असली मूल्यांकन उसके सुझावों की गति और जमीन पर उनके क्रियान्वयन से होगा।
पांच यूनिवर्सिटी टाउनशिप विकसित करने का प्रस्ताव शिक्षा, शोध और उद्योग के त्रिकोण को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वाकांक्षी कदम है।
औद्योगिक और लॉजिस्टिक्स हब के आसपास विश्वविद्यालयों, शोध केंद्रों और आवासीय परिसरों का एकीकृत विकास, यदि सही ढ़ंग से हुआ तो यह भारतीय उच्च शिक्षा को वैश्विक मानकों के करीब ला सकता है। इससे इंटर्नशिप, अप्रेंटिसशिप और प्लेसमेंट के अवसर बढ़ेंगे और छात्रों को ‘रेडी फॉर इंडस्ट्री’ बनाया जा सकेगा।
हालांकि, यह भी सच है कि भारत में पहले से मौजूद कई औद्योगिक क्षेत्रों के आसपास शिक्षा संस्थानों का विकास असंतुलित रहा है, जहां निजी संस्थान गुणवत्ता की बजाय मुनाफे को प्राथमिकता देते हैं। ऐसे में यूनिवर्सिटी टाउनशिप मॉडल को केवल रियल एस्टेट प्रोजेक्ट न बनने देने के लिए कड़े नियामक ढ़ांचे और अकादमिक स्वायत्तता की जरूरत होगी।
ऑरेंज इकोनॉमी पर शिक्षा के माध्यम से फोकस इस बजट का सबसे आधुनिक और भविष्य उन्मुख पहलू है। एनीमेशन, विजुअल इफेक्ट्स, गेमिंग और कॉमिक्स जैसे एवीजीसी सेक्टर को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ने की योजना, भारत के रचनात्मक युवाओं के लिए नए अवसर खोल सकती है।
15,000 माध्यमिक विद्यालयों और 500 कॉलेजों में कंटेंट क्रिएटर लैब्स की स्थापना का प्रस्ताव इस दिशा में एक बड़ा कदम है, जिसमें इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिएटिव टेक्नोलॉजीस की भूमिका अहम होगी। यह पहल रोजगार सृजन, स्टार्टअप संस्कृति और डिजिटल अर्थव्यवस्था को मजबूती दे सकती है। लेकिन यहां भी यह खतरा है कि कहीं यह योजना शहरी और निजी संस्थानों तक सीमित न रह जाए। यदि टियर-2 और टियर-3 शहरों के स्कूलों तक आधुनिक उपकरण, प्रशिक्षित शिक्षक और इंडस्ट्री एक्सपोजर नहीं पहुंचा तो ऑरेंज इकोनॉमी का सपना असमान विकास की कहानी बन सकता है।

आयुष और आयुर्वेद को लेकर बजट में की गई घोषणाएं भारत की पारंपरिक ज्ञान प्रणाली को वैश्विक मंच पर स्थापित करने की कोशिश का हिस्सा हैं। तीन नए अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थानों की स्थापना, आयुर्वेदिक दवाओं की टेस्टिंग के लिए नेशनल लैब्स और बायोफार्मा हब बनाने की योजना, यह सब आयुर्वेद को वैज्ञानिक और व्यावसायिक आधार देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।

कोविड-19 के बाद आयुर्वेद को मिली वैश्विक स्वीकार्यता को यदि मानकीकरण, शोध और गुणवत्ता नियंत्रण के साथ आगे बढ़ाया गया तो भारत इस क्षेत्र में नेतृत्व कर सकता है। जामनगर स्थित डब्ल्यूएचओ का वैश्विक पारंपरिक चिकित्सा केंद्र को और सशक्त करने का प्रस्ताव इसी सोच को पुष्ट करता है। हालांकि, आलोचक यह भी तर्क देते हैं कि आधुनिक चिकित्सा शिक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य ढ़ांचे में अभी भी संसाधनों की भारी कमी है, ऐसे में संतुलन बनाए रखना अनिवार्य होगा।
विदेश में शिक्षा और इलाज के लिए टीसीएस को 5 प्रतिशत से घटाकर 2 प्रतिशत करना मध्यम वर्ग के लिए सीधी राहत है। यह कदम वैश्विक शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच को आसान बनाएगा और अभिभावकों पर वित्तीय बोझ कम करेगा। लेकिन इसके साथ यह सवाल भी उठता है कि क्या यह नीति अप्रत्यक्ष रूप से घरेलू उच्च शिक्षा और स्वास्थ्य संस्थानों की कमजोरियों को स्वीकार करने जैसा नहीं है।
यदि भारत में ही विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय और अस्पताल पर्याप्त संख्या में और सुलभ होते तो विदेश जाने की मजबूरी कम होती। टीसीएस में राहत तात्कालिक समाधान है, दीर्घकालिक सुधार के लिए घरेलू संस्थानों में निवेश और गुणवत्ता सुधार अनिवार्य रहेगा।
शिक्षा बजट के सकारात्मक पहलुओं के साथ इसकी सीमाएं भी स्पष्ट हैं। कुल बजट में शिक्षा का हिस्सा अभी भी उस स्तर पर नहीं है, जिसकी अपेक्षा ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था से की जाती है। सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात में शिक्षा पर खर्च बढ़ाने की पुरानी मांग इस बजट में भी पूरी तरह संतुष्ट नहीं होती।
प्राथमिक शिक्षा, शिक्षक प्रशिक्षण, डिजिटल डिवाइड और सीखने के परिणामों की गुणवत्ता जैसे मुद्दे बजट भाषण में अपेक्षाकृत हाशिये पर रहे। नई योजनाओं की घोषणा जितनी आकर्षक है, उतना ही जरूरी है कि मौजूदा योजनाओं के प्रभाव का ईमानदार मूल्यांकन किया जाए।
कुल मिलाकर, बजट 2026-27 का शिक्षा खंड आशावाद और सावधानी दोनों का मिश्रण है। यह बजट यह संकेत देता है कि सरकार शिक्षा को केवल सामाजिक क्षेत्र नहीं बल्कि आर्थिक विकास, रोजगार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा से जोड़कर देख रही है।

गर्ल्स हॉस्टल, यूनिवर्सिटी टाउनशिप, ऑरेंज इकोनॉमी और आयुष सेक्टर पर फोकस, यह सभी पहलें यदि जमीन पर प्रभावी ढ़ंग से लागू होती हैं तो आने वाले दशक में भारत की शिक्षा प्रणाली का चेहरा बदल सकती हैं। लेकिन यदि ये घोषणाएं भी कागजी वादों, अधूरे प्रोजेक्ट्स और असमान क्रियान्वयन की भेंट चढ़ गई तो यह बजट एक और छूटे हुए अवसर के रूप में याद किया जाएगा।
शिक्षा के क्षेत्र में असली परीक्षा अब बजट भाषण की नहीं बल्कि नीति की निरंतरता, प्रशासनिक क्षमता और राजनीतिक इच्छाशक्ति की है, जो तय करेगी कि यह बजट इतिहास बनेगा या केवल बहस का विषय।
– योगेश कुमार गोयल
