| कहने के लिए तो अंतरराष्ट्रीय नियम-कानून बने हुए हैं, परंतु आज भी दुनिया में जंगल का कानून ही चलता है। अमेरिका की दादागिरी और डोनाल्ड ट्रम्प की मनमानी नीतियां इसके साक्षात प्रमाण हैं। अत: ‘वीर भोगे वसुंधरा‘ के शाश्वत भाव को अंगीकार कर भारत को प्रत्येक क्षेत्र में आत्मनिर्भर और शक्तिशाली होना ही होगा। |
पिछले कुछ वर्षों से विश्व राजनीति में ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ की कहावत को बड़ी सैन्य ताकतों द्वारा बड़ी बेशर्मी से अमल में लाते हुए हमने देखा है। बड़ी ताकतों ने कानून के शासन के अंतरराष्ट्रीय तौर पर मान्य सिद्धांतों को ताक पर रखते हुए दादागीरी दिखाकर अपने प्रादेशिक क्षेत्र का विस्तार और राष्ट्रीय हितों की पूर्ति करने की चाल चली है। अमेरिका डेनमार्क को धमका रहा है कि अपना ग्रीन लैंड क्षेत्र उसे सौंप दे।
अमेरिका ने जनवरी के शुरु में वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को सपत्नीक उसके बेडरूम से अपह्रत करवा लिया। 2022 में रूस ने पड़ोसी यूक्रेन पर हमला बोल दिया और इसके बड़े भूभाग को अपने कब्जे में ले लिया। यूक्रेन के पक्ष में जब कुछ यूरोपीय देशों और नाटो सैन्य संगठन ने बोला और एकजुट होकर रूस के विरुद्ध जवाबी सैन्य कार्रवाई करने की चेतावनी दी तो रूस ने भी अपनी परमाणु ताकत के बारे में नाटो को अहसास दिला दिया।
ईरान की लगातार खराब होती आर्थिक स्थिति के कारण वहां चल रही व्यापक हिंसा की पृष्ठभूमि में अमेरिका ईरान में सत्ता परिवर्तन की धमकियां दे रहा है और इस तरह वह दुनिया की पुलिस की तरह बर्ताव करने से बाज नहीं आ रहा।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प तो लगता है ‘विश्व विजय’ अभियान पर निकले हैं। अत्यंत नाटकीय तरीके से जिस तरह अमेरिकी सैनिकों ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को गहरी सुरक्षा से बाहर निकाल कर उनके विरुद्ध मादक पदार्थों की तस्करी के आरोप लगाकर अमेरिका भेज दिया, वह विश्व इतिहास में अद्वितीय ही कहा जा सकता है। वेनेजुएला के खनिज तेल संसाधनों पर अमेरिका की लालची दृष्टि थी, परंतु वेनेजुएला ने अपने देश से अमेरिकी तेल कम्पनियों को ‘देश निकाला’ दिया तो अमेरिका ने तरह-तरह से उसे तंग करना शुरु कर दिया।
इसी तरह डोनाल्ड ट्रम्प ने सत्ता सम्भालते ही कनाडा को अमेरिका का 51 वां राज्य बनाने की मंशा सार्वजनिक कर दी। इसके साथ ही ट्रम्प ने घमकी दी कि डेनमार्क यदि खुशी से ग्रीन लैंड के क्षेत्र को अमेरिका को नहीं सौंपेगा तो अमेरिका सेना भेजकर यह क्षेत्र हथिया लेगा। चीन भी ताइवान को धमकी दे रहा है कि वह चीन का शासन स्वीकार कर ले, परंतु ताइवान ने चीन को ऐसा दुस्साहस नहीं दिखाने के लिए अपनी सैन्य ताकत को इतना मजबूत किया है कि चीन ताइवान पर हमला करने का दुस्साहस नहीं दिखा सकता।
चीन ने भारत की सैन्य ताकत को कमजोर समझते हुए मई, 2020 में पूर्वी लद्दाख के सीमांत क्षेत्रों में अतिक्रमण किया, जिसका सामना करने के लिए भारत ने भी अपनी सेना भेज दी तो चीन को अपने सैनिक पीछे हटाने पड़े। हालांकि चीन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा के पार अपने 50 हजार सैनिकों को तैनात रखा। भारत-चीन रिश्तों में पहले से चल रही तनातनी में इस तरह भारी बढ़ोतरी हो गई है।
अमेरिकी राष्ट्रपति पद के दूसरे कार्यकाल (2024-27) में डोनाल्ड ट्रम्प ने अपनी मनमानी भरी कार्रवाई करनी शुरू की है। जो देश अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय सहयोगी और मित्र माने जाते थे, उन देशों के विरुद्ध अमेरिका ने एकतरफा तरीके से भारी टैरिफ लगाकर रिश्तों पर काफी प्रतिकूल असर डाला है।
डोनाल्ड ट्रम्प से भारत को काफी उम्मीदें थीं, पर जिस तरह उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रवाद का परचम लहराया है और मित्र व साझेदार देशों के साथ आत्मीय सामरिक रिश्तों की परवाह नहीं करते हुए अकल्पनीय कदम उठाए हैं, वे पूरी दुनिया के लिए चौंकाने वाले तो है हीं, भारत के लिए भी पांव तले जमीन खिसकने जैसे हैं। डोनाल्ड ट्रम्प ने वास्तव में भारत के साथ रिश्तों को झकझोर कर रख दिया है, इससे भारत की विदेश नीति के समक्ष कई उलझनें और चुनौतियां पैदा हो गई हैं।

डोनाल्ड ट्रम्प के पहले कार्यकाल (2016-2020) के दौरान जिस तरह प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति ट्रम्प के बीच मित्रतापूर्ण रिश्ते बने और द्विपक्षीय सम्बंधों ने गहराई लेनी शुरु की, उससे पाकिस्तान व चीन जैसे भारत के प्रतिद्वंद्वी देश भी सहम गए थे और भारत को लेकर उनका दृष्टिकोण बदलता हुआ दिखने लगा था।
अपने पहले कार्यकाल में डोनाल्ड ट्रम्प ने पाकिस्तान को आतंकवाद समर्थक देश मानते हुए उसके विरुद्ध सख्त दृष्टिकोण अपनाया, जिस कारण पाकिस्तान पूरी दुनिया में अलग-थलग पड़ने लगा था, किंतु अपना दूसरा कार्यकाल शुरु होते ही जिस तरह पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर को राजनयिक प्रोटोकाल तोड़ते हुए लंच पर आमंत्रित किया और ऑपरेशन सिंदूर के समापन के लिए भारत-पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता का दावा करते हुए भारत और प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को नीचा दिखाने का प्रयास किया, वह भारत को स्वीकार नहीं हुआ तो इससे दोनों देशों के बीच तनातनी बढ़ने लगी। जिस अमेरिका ने हिंद प्रशांत के क्षेत्र में चीन के दबदबे को कम करने के लिए भारत को साथ लेकर चार देशों- अमेरिका, जापान, आस्ट्रेलिया और भारत का एक गठजोड़ ‘क्वाड’ बनाया था, अब अमेरिका उससे किनारा कर रहा है।
भारत के लिए बहुत ही विकट स्थिति पैदा हो गई है। चीन के विरुद्ध जो भारत अमेरिका के साथ साझेदारी का रिश्ता मजबूत कर अपना मनोबल बढ़ाता था और जिस चीन के विरुद्ध भारत को विकल्प के तौर पर खड़ा किया जा रहा था, वह भारत अब चुनौतियों से घिरने लगा है। विश्व रंगमंच पर अपनी सक्रिय उपस्थिति और भूमिका मजबूत करने के लिए भारत को बड़ी अर्थव्यवस्था के तौर पर अपनी ऐसी छवि पेश करनी होगी कि वह दुनिया का सबसे अधिक आकर्षक बाजार और सामाजिक-राजनीतिक स्थिरता वाला देश है, जहां निवेश करना लाभदायक सिद्ध होगा। भारत को ग्लोबल साउथ यानी दक्षिण के देशों के हितचिंतक के तौर पर माना जाता है, इसलिए भारत को दक्षिण के देशों के साथ निकटता बढ़ानी होगी। अफ्रीका के देश पिछले कुछ वर्षों से भारत की दृष्टि से ओझल होने लगे थे।
इन देशों के साथ न केवल फोकस- अफ्रीका जैसे शिखर आयोजनों का सिलसिला बढ़ाना होगा बल्कि इन अफ्रीकी देशों के साथ द्विपक्षीय स्तर पर भी सम्बंधों को प्रगाढ़ करने की रणनीति पर चलना होगा। इस वर्ष गणतंत्र दिवस परेड के मौके पर यूरोपीय संघ के नेताओं को मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित कर भारत ने एक अच्छी राजनयिक पहल की है। इस बहाने भारत को यूरोपीय देशों के साथ द्विपक्षीय रिश्तों को प्रगाढ़ करने का सिलसिला तेज करना होगा।
यूरोपीय संघ के साथ मुक्त व्यापार समझौता सम्पन्न होने से भारत और यूरोप के बीच व्यापार व आर्थिक आदान-प्रदान को भी गहराई मिलेगी, जिससे अमेरिकी बाजार की कमी भारतीय व्यापारियों को नहीं खलेगी। जर्मन चांसलर को 12-13 जनवरी को भारत आमंत्रित करना और इसके बाद फ्रांस के राष्ट्रपति के भारत दौरे से भारत यूरोप की दो बड़ी आर्थिक व सैन्य ताकतों के साथ अपने रिश्तों को और मजबूत कर दुनिया को यह संदेश देगा कि भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति पर चलते हुए सामरिक स्वायत्तता बनाए रखता है और किसी भी बड़ी ताकत की अयोग्य शर्तों के आगे नहीं झुकता है।
–रंजीत कुमार

