| भाषा केवल संवाद का साधन नहीं बल्कि स्मृतियों, संस्कृति और सामूहिक चेतना की वाहक होती है। आज वैश्वीकरण और डिजिटल वर्चस्व के दौर में सैंकड़ों भाषाएं चुपचाप विलुप्त हो रही हैं। यह केवल शब्दों की नहीं बल्कि सभ्यताओं के अंत का संकेत है। मातृभाषाओं का संरक्षण वास्तव में संस्कृति-सभ्यता के भविष्य की रक्षा है। |
भाषा मनुष्य की सबसे सूक्ष्म और सशक्त पहचान है। यह केवल शब्दों का संयोजन नहीं बल्कि स्मृतियों, अनुभवों, भावनाओं, परम्पराओं और सामूहिक चेतना का जीवंत विस्तार है। मनुष्य जिस भाषा में सोचता है, उसी में वह संसार को समझता है और उसी के माध्यम से अपने अस्तित्व को अर्थ देता है। मातृभाषा व्यक्ति के संज्ञानात्मक, भावनात्मक और सामाजिक विकास की पहली सीढ़ी होती है। शैशव से किशोरावस्था तक, भाषा ही वह माध्यम है, जो बच्चे को परिवार, समाज और संस्कृति से जोड़ता है। इसी के सहारे ज्ञान का प्रथम आलोक फैलता है और आत्मविश्वास का निर्माण होता है। इसलिए जब कोई भाषा कमजोर होती है तो केवल शब्द नहीं खोते बल्कि सोचने का एक पूरा ढ़ांचा, दुनिया को देखने का एक अनूठा दृष्टिकोण और पीढ़ियों की संचित बुद्धि भी धुंधली पड़ने लगती है।
विश्व के अनेक शोध इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने वाले बच्चे अधिक गहरी समझ विकसित करते हैं, उनकी आलोचनात्मक क्षमता सुदृढ़ होती है और वे अन्य भाषाओं को भी अपेक्षाकृत सहजता से सीख पाते हैं। यही कारण है कि यूनेस्को बार-बार इस बात पर बल देता रहा है कि मातृभाषा आधारित शिक्षा समावेशी, न्यायसंगत और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की आधारशिला है। इसके बाद भी आज दुनिया के लगभग 40 प्रतिशत शिक्षार्थी अपनी मातृभाषा में शिक्षा से वंचित हैं। यह स्थिति न केवल शैक्षिक असमानता को बढ़ाती है बल्कि भाषायी विविधता के लिए भी गम्भीर संकट पैदा करती है।
भाषाओं के संरक्षण का प्रश्न नया नहीं है। इतिहास साक्षी है कि जब-जब किसी समाज पर राजनीतिक, सांस्कृतिक या आर्थिक दबाव बढ़ा, उसकी भाषाएं सबसे पहले निशाने पर आईं। उपनिवेशवाद के दौर में अनेक देशों की स्थानीय भाषाएं हाशिए पर चली गईं और शासक वर्ग की भाषा सत्ता, शिक्षा और रोजगार की भाषा बन गई। इसी संघर्ष का एक मार्मिक उदाहरण 21 फरवरी 1952 को तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में देखने को मिला, जब ढ़ाका विश्वविद्यालय के छात्रों ने अपनी मातृभाषा बांग्ला को आधिकारिक दर्जा दिलाने के लिए आंदोलन किया और कई युवा अपने प्राणों की आहुति दे बैठे। उन्हीं शहीदों की स्मृति से प्रेरित होकर 21 फरवरी को ‘अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस’ के रूप में मान्यता मिली। यह दिवस केवल अतीत की एक घटना का स्मरण नहीं बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए एक चेतावनी भी है कि भाषा और पहचान को अलग नहीं किया जा सकता। आज वैश्विक परिदृश्य पर दृष्टि डालें तो स्थिति और भी चिंताजनक दिखाई देती है।
विश्व में 8 हजार से अधिक भाषाएं दर्ज की गई हैं, परंतु इनमें से बड़ी संख्या लुप्तप्राय स्थिति में है। हर कुछ सप्ताह में एक भाषा हमेशा के लिए चुप हो जाती है। इसके साथ ही एक पूरी सांस्कृतिक स्मृति, लोककथाएं, गीत, कहावतें, पारम्परिक ज्ञान और प्रकृति के साथ सहजीवन की समझ भी समाप्त हो जाती है। वैश्वीकरण और बाजारवाद ने इस संकट को और गहरा किया है। बेहतर रोजगार, सामाजिक प्रतिष्ठा और वैश्विक सम्पर्क के नाम पर कुछ गिनी-चुनी भाषाएं आगे बढ़ती जा रही हैं, जबकि सैंकड़ों भाषाएं पीछे छूटती जा रही हैं।
डिजिटल युग ने इस असंतुलन को दोहरी धार दी है। एक ओर तकनीक ने अभिव्यक्ति के नए अवसर खोले हैं, दूसरी ओर इंटरनेट और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भाषाई विविधता बहुत सीमित है। आज अधिकांश डिजिटल सामग्री कुछ ही वैश्विक भाषाओं में उपलब्ध है। जिन भाषाओं का डिजिटल अस्तित्व नहीं है, वे नई पीढ़ी की चेतना से धीरे-धीरे बाहर हो रही हैं। सोशल मीडिया, मोबाइल एप्स, ऑनलाइन शिक्षा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस दौर में वही भाषाएं टिक पाएंगी, जो तकनीक के साथ कदम मिला सकेंगी। दुर्भाग्य से अनेक आदिवासी और क्षेत्रीय भाषाएं अभी इस दौड़ से बहुत पीछे हैं।
भारत के संदर्भ में यह प्रश्न और भी व्यापक हो जाता है। भारत केवल भौगोलिक या राजनीतिक इकाई नहीं बल्कि भाषाओं का एक विशाल उपमहाद्वीप है। यहां सैंकड़ों भाषाएं और बोलियां जीवित हैं, जो सदियों से विविध संस्कृतियों, धर्मों और परम्पराओं को एक सूत्र में पिरोती रही हैं। भारतीय संविधान ने भाषाई विविधता को सम्मान देते हुए अनेक प्रावधान किए हैं। नागरिकों को अपनी भाषा, लिपि और संस्कृति के संरक्षण का अधिकार दिया गया है और राज्य को यह दायित्व सौंपा गया है कि वह भाषाई अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा करे। इसके बाद भी व्यवहार में अनेक भाषाएं उपेक्षा का शिकार हैं। शिक्षा व्यवस्था में भाषा का प्रश्न आज भी सबसे संवेदनशील मुद्दों में से एक है।
लम्बे समय तक यह धारणा बनी रही कि अंग्रेजी या अन्य प्रमुख भाषाओं में शिक्षा ही प्रगति की कुंजी है। परिणामस्वरूप अनेक माता-पिता ने भी अपनी मातृभाषा के स्थान पर तथाकथित ‘प्रतिष्ठित’ भाषाओं को अपनाना शुरू कर दिया। इससे बच्चों और उनके परिवेश के बीच एक खाई पैदा हुई। जब बच्चा घर में एक भाषा बोलता है और स्कूल में दूसरी तो उसकी समझ और आत्मविश्वास पर असर पड़ता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने इस वास्तविकता को स्वीकार करते हुए प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा में शिक्षा पर जोर दिया है। यह एक सकारात्मक कदम है, परंतु इसे सफल बनाने के लिए प्रशिक्षित शिक्षकों, गुणवत्तापूर्ण पाठ्यसामग्री और सामाजिक समर्थन की आवश्यकता है।
भाषा संरक्षण केवल नीति या कानून से सम्भव नहीं है, यह समाज की सामूहिक चेतना से जुड़ा प्रश्न है। जब तक लोग स्वयं अपनी भाषा को सम्मान नहीं देंगे, उसे दैनिक जीवन, शिक्षा, प्रशासन और तकनीक में स्थान नहीं देंगे तब तक कोई भी प्रयास अधूरा रहेगा। भारत में कई विश्वविद्यालयों और संस्थानों ने लुप्तप्राय भाषाओं के दस्तावेजीकरण, शब्दकोश निर्माण और शोध की दिशा में काम शुरू किया है। डिजिटल आर्काइव, ऑडियो-विजुअल रिकॉर्डिंग और अनुवाद परियोजनाएं इस दिशा में आशा की किरण हैं। आवश्यकता इस बात की है कि इन प्रयासों को स्थानीय समुदायों से जोड़ा जाए ताकि भाषा केवल संग्रहालय की वस्तु न बनकर जीवित परम्परा बनी रहे। भाषाओं को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाने का अर्थ केवल अनुवाद नहीं, उनके सांस्कृतिक संदर्भ, लोकज्ञान और भावनात्मक गहराई को भी संरक्षित करना है।
अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस यह सोचने का अवसर देता है कि हम भाषाओं के संरक्षण की दिशा में कितना आगे बढ़े हैं और कहां चूक रहे हैं। भाषा यदि समाप्त होती है तो उसके साथ इतिहास की एक धारा, संस्कृति की एक परत और मानव अनुभव का एक अनोखा रंग भी मिट जाता है। इसलिए मातृभाषाओं का संरक्षण केवल अतीत को बचाने का प्रयास नहीं बल्कि भविष्य को समृद्ध करने का उत्तरदायित्व है।
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योगेश कुमार गोयल

