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महाशिवरात्रि : ब्रह्माण्डीय ऊर्जा और आत्म-साक्षात्कार का महापर्व”

महाशिवरात्रि : ब्रह्माण्डीय ऊर्जा और आत्म-साक्षात्कार का महापर्व”

by हिंदी विवेक
in अध्यात्म
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ॐ महाशिवरात्रि केवल एक पौराणिक परम्परा नहीं, बल्कि खगोल विज्ञान, अध्यात्म और जीव विज्ञान का एक अद्भुत संगम है। फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को आने वाली यह रात्रि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की शक्तियों के एक विशेष संरेखण का समय है। यह ‘शून्य’ से ‘अनंत’ की यात्रा और स्वयं के भीतर छिपे ‘शिव तत्व’ को पहचानने का अवसर है।

वैज्ञानिक आधार : ऊर्जा का ऊर्ध्वगामी प्रवाह

आधुनिक विज्ञान के युग में महाशिवरात्रि का महत्व और भी प्रासंगिक हो गया है। इस दिन पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध में ग्रहों की स्थिति इस प्रकार होती है कि मनुष्य के शरीर के भीतर की ऊर्जा (कुण्डलिनी) प्राकृतिक रूप से ऊपर की ओर (रीढ़ की हड्डी के माध्यम से मस्तिष्क की ओर) प्रवाहित होती है।

• रीढ़ की हड्डी का महत्व : मनुष्य एकमात्र ऐसा जीव है जिसकी रीढ़ की हड्डी सीधी है। महाशिवरात्रि की रात को ‘जागरण’ का अर्थ केवल जागना नहीं, बल्कि ‘सीधा बैठकर’ ऊर्जा के इस प्राकृतिक उभार का लाभ उठाना है। जब ऊर्जा मस्तिष्क के केंद्रों तक पहुँचती है, तो यह याददाश्त को तेज करती है और मानसिक स्पष्टता प्रदान करती है।
• चन्द्रमा और मन का सम्बन्ध : अमावस्या से ठीक एक रात पहले चन्द्रमा की शक्ति न्यूनतम होती है। चंद्रमा ‘मन’ का कारक है। जब मन शिथिल होता है, तब आध्यात्मिक अभ्यास के माध्यम से उसे नियन्त्रित करना और आन्तरिक शान्ति पाना सबसे आसान होता है।

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ॐ’ और पंचाक्षरी मन्त्र का महाविज्ञान

महाशिवरात्रि की पूजा ‘ॐ’ के बिना अधूरी है। ‘ॐ नमः शिवाय’ केवल एक धार्मिक मंत्र नहीं, बल्कि ध्वनि तरंगों का एक विज्ञान है।

• ॐ (प्रणव नाद) : नासा के शोध और प्राचीन वेदों के अनुसार, ‘ॐ’ ब्रह्माण्ड की मौलिक ध्वनि है। यह तीन ध्वनियों से बना है ‘अ’ (सृजन), ‘उ’ (पालन) और ‘म’ (लय)। इसके उच्चारण से शरीर के तंत्रिका तन्त्र में एक विशेष कम्पन होता है जो तनाव को पूरी तरह समाप्त कर देता है।
• पंचाक्षरी मन्त्र और पंचतत्व : यह मन्त्र हमारे शरीर के पाँच तत्वों को सन्तुलित करता है :-
• न : पृथ्वी तत्व – यह शरीर में स्थिरता, हड्डियां, मांसपेशियां और संरचना का प्रतिनिधित्व करता है।
• म : जल तत्व – यह शरीर में तरलता, रक्त, प्लाज्मा और स्नेहन को नियंत्रित करता है।
• शि : अग्नि तत्व – यह तेज, पाचन अग्नि और चयापचय (metabolism) का प्रतीक है।
• वा : वायु तत्व – यह शरीर में प्राण, गति, श्वसन और तंत्रिका संचार को नियंत्रित करता है।
• य : आकाश तत्व – यह चेतना, शरीर के अंदर के खाली स्थान (जैसे कोशिकाएं, मस्तिष्क गुहाएं) का प्रतीक है। 

जब हम ‘ॐ’ के साथ इसका जाप करते हैं, तो हम अपनी व्यक्तिगत चेतना को ब्रह्मांडीय चेतना से जोड़ देते हैं।

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12 ज्योतिर्लिंग : भारत की ऊर्जा संरचना

भारत के 12 ज्योतिर्लिंग केवल मन्दिर नहीं, बल्कि ‘पावर स्टेशन’ हैं, जिन्हें प्राचीन ऋषियों ने खगोलीय गणनाओं के आधार पर स्थापित किया था।

• सोमनाथ (गुजरात) : चेतना के पुनरुत्थान का प्रतीक।
• मल्लिकार्जुन (आन्ध्र प्रदेश) : शिव और शक्ति का सन्तुलन।
• महाकालेश्वर (मध्य प्रदेश) : काल (समय) और मृत्यु पर विजय।
• ओंकारेश्वर (मध्य प्रदेश) : ‘ॐ’ के आकार में नर्मदा के तट पर स्थित ऊर्जा।
• केदारनाथ (उत्तराखण्ड) : संकल्प और तपस्या की पराकाष्ठा।
• भीमाशंकर (महाराष्ट्र) : शक्ति और सुरक्षा का स्रोत।
• काशी विश्वनाथ (उत्तर प्रदेश) : ज्ञान और मोक्ष का केंद्र।
• त्र्यम्बकेश्वर (महाराष्ट्र) : गौतम ऋषि और गंगा के अवतरण का साक्षी।
• वैद्यनाथ (झारखण्ड) : शारीरिक और मानसिक आरोग्य।
• नागेश्वर (गुजरात) : विकारों और विषों से मुक्ति।
• रामेश्वरम (तमिलनाडु) : समर्पण और भक्ति का सेतु।
• घुश्मेश्वर (महाराष्ट्र) : अटूट विश्वास और क्षमा का प्रतीक।

सांस्कृतिक एकता : अखण्ड भारत का स्वरूप

  • महाशिवरात्रि भारत की विविध संस्कृतियों को एक सूत्र में पिरोती है।
  • • उत्तर भारत : यहाँ ‘शिव की बारात’ निकाली जाती है, जिसमें भूत, प्रेत, पशु और देवता सब साथ चलते हैं। यह ‘इनक्लूसिविटी’ (समावेशिता) का सन्देश है—कि ईश्वर के द्वार सबके लिए खुले हैं।
    • कश्मीर (हेरात) : यहाँ यह पारिवारिक मिलन और विशेष अनुष्ठानों का पर्व है, जो ज्ञान के प्रसार पर बल देता है।
    • दक्षिण भारत : यहाँ पूरी रात नटराज के सम्मुख शास्त्रीय संगीत और नृत्य के माध्यम से भक्ति प्रकट की जाती है।
    • आधुनिक संस्थान : यूरोपीय नाभिकीय अनुसन्धान संगठन में नटराज की प्रतिमा का होना इस बात का प्रमाण है कि विज्ञान भी शिव के ‘कॉस्मिक डांस’ को कणों की गति के रूप में स्वीकार करता है।
    • पारिस्थितिकी और शिव (पशुपति) : शिव ‘पशुपति’ हैं, जो समस्त जीव-जन्तुओं और प्रकृति के रक्षक हैं। महाशिवरात्रि पर बेलपत्र, धतूरा और बेर जैसी जंगली वनस्पतियों का अर्पण यह सन्देश देता है कि सृष्टि में कुछ भी ‘अशुभ’ या ‘व्यर्थ’ नहीं है। यह पर्व हमें पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की प्रेरणा देता है।

युवा पीढ़ी के लिए जीवन दर्शन

आज के युवाओं को महाशिवरात्रि से क्या सीखना चाहिए?

• अर्धनारीश्वर : यह पुरुष और स्त्री ऊर्जा के पूर्ण सन्तुलन का प्रतीक है।
• विषपान (हलाहल) : नकारात्मकता को अपने अन्दर न लें और न ही दूसरों पर उगलें, बल्कि उसे गले में ही रोककर अपनी शक्ति में बदल दें।
• भस्म और वैराग्य : यह याद दिलाता है कि अन्त में सब कुछ राख होना है, इसलिए अहंकार त्याग कर वर्तमान में जिएं।
• त्रिशूल : इच्छा, ज्ञान और क्रिया—इन तीनों के बीच सन्तुलन ही सफलता की कुंजी है।
• ‘स्व’ का जागरण और आत्म-बोध : महाशिवरात्रि हमें ‘स्व’ की पहचान कराती है। शिव ‘अद्वैत’ हैं, जो यह सिखाते हैं कि परमात्मा कहीं बाहर नहीं, बल्कि हमारे अपने भीतर है। ‘स्व’ का अर्थ केवल स्वयं का विकास नहीं, बल्कि अपनी स्व-भाषा, स्व-भूषा, स्व-संस्कृति और स्व-धर्म के प्रति गौरव का भाव है। जब हम अपनी जड़ों से जुड़कर ‘स्व’ को पहचानते हैं, तभी हम व्यक्तिगत और राष्ट्रीय स्तर पर आत्मनिर्भर बन सकते हैं।

सामाजिक समरसता, कुटुम्ब और नागरिक कर्तव्य

 सामाजिक समरसता : शिव की बारात में देवता, असुर, मनुष्य और पशु सभी का साथ होना ‘इनक्लूसिविटी’ का सर्वोच्च उदाहरण है। यह सिखाता है कि समाज में जाति या वर्ग का कोई भेद नहीं होना चाहिए।
• कुटुम्ब प्रबोधन : शिव का परिवार ‘विरोधाभासों के बीच समन्वय’ का अनूठा उदाहरण है। जहाँ शेर-बैल और मोर-साँप जैसे जन्मजात शत्रु एक साथ शांति से रहते हैं। यह हमें सिखाता है कि वैचारिक मतभेद होने पर भी परिवार में प्रेम और तालमेल कैसे बनाए रखा जाए।

• नागरिक कर्तव्य : जैसे शिव ने ‘हलाहल विष’ पीकर संसार की रक्षा की, वैसे ही एक सजग नागरिक के रूप में हमारा कर्तव्य है कि हम समाज की बुराइयों (नशा, गंदगी, भ्रष्टाचार) के विरुद्ध खड़े हों। अपनी ऊर्जा को लोक-कल्याण के लिए समर्पित करना ही वास्तविक ‘रुद्राभिषेक’ है।

वैदिक तथ्य और मन्त्र शक्ति

पुराणों के अनुसार, इसी रात भगवान शिव ने ताण्डव नृत्य किया था और इसी रात उनका विवाह माता पार्वती से हुआ था। ऋग्वेद का महामृत्युंजय मन्त्र इसी रात्रि को सिद्ध करने के लिए सबसे प्रभावशाली माना जाता है :-

त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥

यह मन्त्र न केवल अकाल मृत्यु से रक्षा करता है, बल्कि कोशिकाओं के पुनर्जीवन में भी सहायक माना जाता है।

मौन से आत्म-साक्षात्कार शिव ‘आदियोगी’ हैं। जहाँ पंचाक्षरी मन्त्र का जाप ऊर्जा जगाता है, वहीं इस रात्रि में कुछ समय का ‘मौन’ और ‘ध्यान’ हमें अपने अन्तर्मन की गहराइयों से जोड़ता है। शोर से शून्य की ओर बढ़ने की यह प्रक्रिया ही वास्तविक आध्यात्मिक जागरण है।

महाशिवरात्रि केवल उपवास रखने की रात नहीं, बल्कि ‘उप-वास’ (स्वयं के पास बैठने) की रात है। यह अन्धकार को मिटाकर प्रकाश की ओर बढ़ने का संकल्प है। जब हम ‘ॐ नमः शिवाय’ का जाप करते हुए जागरण करते हैं, तो हम अपनी सीमाओं को तोड़कर असीमित संभावनाओं की ओर कदम बढ़ाते हैं।

गौरव के साथ कहें “सत्यं शिवम सुन्दरम्।”

– अखिलेश चौधरी

 

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