नर्मदा परिक्रमा के तीसरे दिन झगड़िया (गुजरात) में “नर्मदा के रेत दस्युओं” से सामना हुआ। मध्य प्रदेश से लेकर गुजरात तक नर्मदा के इस दोहन पर मैया प्रेमियों की दृष्टि जाना आवश्यक है। पिछली परिक्रमा के दौरान बाबरी घाट (हरदा) में यह विचलित करने वाला दृश्य उपस्थित हुआ था, ध्यानाकर्षण हेतु वह भावलेख अविकल साझा है…
इस बार नर्मदा की खंड परिक्रमा के दौरान मैया के सौंदर्य के मूर्तिमान महोल्लास के बीच मन को गहरे तक विषाद में भर देने वाला दृश्य उपस्थित हुआ। इस दृश्य से हम सभी सुधिजनों और जवाबदेहों का परिचित होना आवश्यक है। मैया का आँचल पकड़े-पकड़े चलने की हमारी घनीभूत इच्छा ने बाबरी (हरदा) में मैया का किनारा समाप्त हो जाने पर सड़क मार्ग से जाने के स्थान पर नाव से आगे बढ़ने का विकल्प चुना।
कदाचित हम यह विकल्प न चुनते तो इस भीषण और क्रूर वास्तविकता से हमारा साक्षात्कार न हो पाता। बाबरी घाट मूलतः मध्य प्रदेश के सीहोर जिले में है, लेकिन हम पश्चिम की ओर बढ़ रहे थे, इसलिए जिला हरदा में बाबरी घाट हमारे दाहिनी ने हाथ पर था।
बाबरी घाट पर नर्मदा में रेत उत्खनन का दृश्य किसी भी मैया और पर्यावरण प्रेमी को अवसाद में भर देने के लिए काफी था। अभी तक हमें नर्मदा के किनारे मिलने वाली रेत के उत्खनन की जानकारी थी, पर यहां तो नर्मदा की धारा के ठीक बीच से रेत उलीची जा रही थी।
नर्मदा की धारा को चीरती हुई सैकड़ों मोटर बोट और उन पर हज़ारों की संख्या में सवार मल्लाह और मजदूर हम पदयात्रियों को किसी दूसरी ही दुनिया में ले गए। मुझे बारंबार फिल्म “पाइरेट्स आफ कैरीबियन सी” के दृश्य याद आ रहे थे। रंग-बिरंगी पताकाओं से सजी मोटरबोटों पर सवार रेत दस्यु बाँस से नर्मदा की गहराई और रेत की उपलब्धता का अनुमान लगाते हुए जालीदार बाल्टियों से रेत निकाल रहे थे। उन मोटरबोटों की आपसदारी में क्रूर उल्लास और उत्साह के वातावरण में अधिक से अधिक रेत निकाल लेने की प्रतिस्पर्धा चल रही थी। एक मोटरबोट से ललकार उठती और प्रत्युत्तर में दूसरी मोटरबोट से अट्टहास।
मोटरबोट नर्मदा की नाभि से रेत उठाकर किनारे खड़े ट्रैक्टर पर स्थानांतरित करती और वहाँ से वह रेत ट्रकों पर शिफ्ट की जाती है। तट पर सैकड़ों की तादाद में हाइवा और ट्रक खड़े थे। नाविक से जानकारी ली तो पता चला कि पाथाड़ा से नीलकंठ (नसरुल्लागंज) तक यह नज़ारा आम है। यहाँ से यह रेत भारत के विभिन्न स्थानों, खासतौर पर हरियाणा और पंजाब को भेजी जाएगी। इस हृदय विदारक दृश्य शृंखला में हम नर्मदाप्रेमी परिक्रमा वासी एक दूसरे से नज़रें बचाते ग्लानि में डूबे जा रहे थे। अनुभव हो रहा था मानो किसी स्त्री के गर्भस्थान से सृजन का नमक उलीच कर उसे बाँझ बनाने के षड्यंत्र में हम भी शामिल हैं।
परिक्रमा के बाद के दिनों में नर्मदा के अप्रतिम सौंदर्य के बीच भी यह संदर्भ कभी छूट नहीं पाया। ग्रामीण जनों से बातचीत में वे भी इस उत्खनन से अप्रसन्न और चिंतित दिखाई दिए। इस पूरे परिक्षेत्र का रहवासी नर्मदा को अपनी माँ की तरह प्रेम करता है और इस प्रेम का प्रमाण स्थान-स्थान पर परिक्रमा वासियों के प्रति उनके अहेतुक प्रेम को देखकर लगाया जा सकता है।
स्थानीय जनों से बातचीत में यह भी समझ आया कि रेत उत्खनन ने नदी के प्राकृतिक और परिस्थितिकी तंत्र पर प्रतिकूल असर डाला है और इससे इस नदी पर निर्भर रहने वाले मछुआरों की आजीविका पर बहुत असर आया है।

एक मछुआरे ने बताया कि इन दोनों नर्मदा में पाई जाने वाली महाशीर मछली लगभग विलुप्त हो चुकी है। यह नर्मदा में मिलने वाली एक बड़े आकार की मछली है जो औसतन 20 किलोग्राम की होती है और यह मछली बहुत सारे प्रदूषण कारक जीव जंतुओं का आहार करने के कारण “नर्मदा की बाघ” भी कहलाती है।
तटीय रहवासियों ने यह भी बताया की मछलियों की अन्य प्रजातियाँ जैसे घोघरा और गुरमुच भी अब कम मिल रही हैं। नदी के किनारे रहने वाले सारस, बगुले और टिटहरी भी मात्रात्मक रूप से कम हुए हैं। जल मुर्गियों की संख्या में वृद्धि हुई है जो पानी की खराब गुणवत्ता और प्रदूषण की गवाह है।

नर्मदा को अपने मूल प्रवाह और सहायक नदियों को इस प्रवाह में सम्मिलित होने के लिए रेत की आवश्यकता होती है, यह नदी के बहाव को संतुलित करने का कार्य भी करती है। अत्यधिक रेत उत्खनन ने इस प्राकृतिक प्रक्रिया को बाधित किया है, जिससे नर्मदा के प्रवाह पर विपरीत असर पड़ रहा है। हमें यह समझना होगा कि कोई भी नदी सिर्फ उसमें बहने वाला पानी नहीं बल्कि उसमें साँस लेने वाला पूरा जीवन होता है।
हम जानते हैं कि नर्मदा भ्रंश घाटी में बहने वाली नदी है। भ्रंश घाटी पृथ्वी की टेक्नोनिक प्लेट्स के आपसी टकराव की प्रक्रिया में बनती है, न कि मिट्टी के कटाव की प्रक्रिया से। जब प्लेटों में खिंचाव बढ़ जाता है या शिलाओं पर उनकी सहनशक्ति से अधिक दबाव पड़ता है तब शिलाएं टूट कर भ्रंश घाटी का निर्माण करती हैं इस दबाव के कारण भ्रंश घाटी में बहने वाली नदियों में भूगर्भीय हलचल और बाढ़ आने का खतरा सदैव बना रहता है। अत्यधिक रेत उत्खनन से नदी की तलछट व्यवस्था में व्यवधान आने के साथ-साथ तीव्र ढलान वाले ऊंचे और अस्थिर तटबंधों का निर्माण होता है। अस्थिर तटों के ढहने से नदी का दबाव और प्रवाह विकसित इलाकों की ओर मुड़ सकता है। भ्रंश घाटी का आयतन सीमित होने के कारण आयतन और वेग की अनुपातहीनता भविष्य के बड़े संकट की ओर इशारा है।
मध्य प्रदेश में रेत के नियमन हेतु मध्य प्रदेश गौण खनिज नियम 1996 प्रभावशील है, जिसके अंतर्गत सीमांकित रेत खदानों से पर्यावरणीय अनुमति के उपरांत निश्चित मात्रा में ही रेत का उत्खनन किया जा सकता है। रेत उत्खनन के लिए मशीनों का इस्तेमाल प्रतिबंधित है और इस रेत उत्खनन के एवज में रॉयल्टी दी जाती है।
खनिजों के अवैध उत्खनन परिवहन और भंडारण पर कार्यवाही की प्रभावी नवीन नीति के अनुसार रेत का अवैध उत्खनन करते पाए जाने पर रॉयल्टी का 15 गुना अधिक जुर्माना तथा उतनी ही राशि पर्यावरण की क्षतिपूर्ति के रूप में वसूल की जाएगी। इस कार्य में संलिप्त व्यक्ति के विरुद्ध पुलिस कार्यवाही का भी प्रावधान है।
स्पष्ट है कि इस विषय में कानून और शासन की मंशा निर्विवाद है लेकिन प्रश्न यह है कि क्या इतना ही होना पर्याप्त है? क्या जवाबदेहों तक इन घटनाओं की सूचना है? क्या रेत की बढ़ती आवश्यकताओं की दृष्टि से टिकाऊ तथा भविष्यदृष्टा रेत नीति बनाने का यह सही समय नहीं है?
पिछले कुछ वर्षों में अधोसंरचनागत आवश्यकताओं के मद्देनज़र रेत की माँग बहुत अधिक बढ़ गई है। रेत की माँग और पूर्ति के इस असंतुलन को दूर करने के लिए यदि समय रहते सम्यक वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई तो यह न केवल नर्मदा के स्वास्थ्य बल्कि इस क्षेत्र की संपूर्ण भौगोलिक साँस्कृतिक एवं सामाजिक गतिकी के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती के रूप में उपस्थित होगा। “क्रश्ड सैंड” के उपयोग को बढ़ावा देना, वैकल्पिक व्यवस्था की ओर बढ़ाया गया पहला कदम हो सकता है।
मध्य प्रदेश की जीवन रेखा नर्मदा न केवल हमारी धार्मिक आस्थाओं बल्कि सांस्कृतिक चेतना का जीवंत दस्तावेज है। प्रत्येक परिस्थिति में इसकी शुचिता को अक्षुण्ण रखना सरकार, शासन और नागरिकों का दायित्व भी है।
– रक्षा दुबे चौबे

