एआई इम्पैक्ट समिट 2026 ने यह स्पष्ट कर दिया है कि 21वीं सदी की वैश्विक व्यवस्था अब केवल पारंपरिक कूटनीति या सैन्य शक्ति से संचालित नहीं होगी, बल्कि ज्ञान, तकनीक और नवाचार इसकी वास्तविक धुरी बनेंगे। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जिसे कभी विज्ञान-कथा का विषय माना जाता था, आज शासन, अर्थव्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा जैसे प्रत्येक क्षेत्र को गहराई से प्रभावित कर रही है। ऐसे समय में भारत की राजधानी में विश्व नेतृत्व का एकत्र होना केवल औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि भारत की उभरती तकनीकी क्षमता और दूरदर्शी नीति-दृष्टि का सशक्त संकेत है।
उद्घाटन संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बात पर बल दिया कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता का विकास मानव-केंद्रित होना चाहिए। यह विचार अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि तकनीकी इतिहास यह दर्शाता है कि यदि नवाचार मानव मूल्यों और सामाजिक उत्तरदायित्व से विमुख हो जाए, तो वह असमानता, बेरोज़गारी और विभाजन को जन्म दे सकता है।
भारत ने इस सम्मेलन के माध्यम से यह स्पष्ट संदेश दिया कि वह तकनीकी प्रगति को सामाजिक न्याय, समावेशिता और लोकतांत्रिक मूल्यों से जोड़कर देखता है। इस आयोजन की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा उस समय और बढ़ गई जब गूगल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सुंदर पिचाई तथा ओपनएआई के प्रमुख सैम अल्टमैन ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। उनकी सहभागिता संकेत करती है कि भारत अब केवल एक विशाल उपभोक्ता बाजार नहीं, बल्कि अनुसंधान, नवाचार और नीति-निर्माण में सक्रिय भागीदार बन रहा है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता केवल एक तकनीकी अवधारणा नहीं, बल्कि परिवर्तन की व्यापक प्रक्रिया है। कृषि क्षेत्र में यह मिट्टी की गुणवत्ता, वर्षा के पैटर्न तथा फसल रोगों का विश्लेषण कर किसानों को सटीक सलाह दे सकती है। स्वास्थ्य सेवाओं में रोगों की शीघ्र पहचान, औषधि अनुसंधान और दूरस्थ चिकित्सा सेवाओं को अधिक सुलभ बनाने में इसकी भूमिका उल्लेखनीय है।
शिक्षा के क्षेत्र में व्यक्तिगत आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षण प्रणाली विकसित की जा सकती है, जिससे सीखने की प्रक्रिया अधिक प्रभावी बने।

प्रशासन में डेटा-आधारित निर्णयों से पारदर्शिता और दक्षता में वृद्धि संभव है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में यह तकनीक समावेशी विकास का सशक्त साधन बन सकती है— बशर्ते इसका उपयोग संतुलित, पारदर्शी और उत्तरदायी ढंग से किया जाए।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता के साथ जुड़ी सबसे बड़ी चिंता रोजगार की है। स्वचालन आधारित प्रणालियाँ अनेक पारंपरिक कार्यों को प्रतिस्थापित कर रही हैं। बैंकिंग, विनिर्माण, परिवहन और सेवा क्षेत्र में यह परिवर्तन स्पष्ट दिखाई दे रहा है। इससे अल्पकालीन अस्थिरता उत्पन्न हो सकती है; किंतु दीर्घकाल में नई तकनीकें नए अवसर भी सृजित करती हैं— डेटा विश्लेषक, एआई अभियंता, साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ और मशीन लर्निंग शोधकर्ता जैसे पेशे तेजी से उभर रहे हैं।
भारत की युवा जनसंख्या यदि समय रहते तकनीकी कौशल अर्जित करे, तो यह परिवर्तन अवसर में बदल सकता है। इसके लिए शिक्षा प्रणाली में संरचनात्मक सुधार, उद्योग–शिक्षा साझेदारी तथा अनुसंधान एवं विकास पर अधिक निवेश अनिवार्य होगा।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता की शक्ति डेटा पर आधारित है। परंतु नागरिकों की निजता और व्यक्तिगत जानकारी की सुरक्षा सर्वोपरि है। यदि सुदृढ़ डेटा संरक्षण तंत्र और पारदर्शी नियामक ढाँचा नहीं होगा, तो जनता का विश्वास डगमगा सकता है। जिम्मेदार एआई शासन, स्पष्ट नियमावली और जवाबदेही, ये सभी तत्व तकनीकी प्रगति को स्थायी और विश्वसनीय आधार प्रदान करेंगे। नवाचार और निजता के बीच संतुलन ही डिजिटल भविष्य की वास्तविक कसौटी बनेगा।
एल्गोरिद्मिक पक्षपात, कृत्रिम वीडियो, भ्रामक सूचना और स्वचालित हथियार प्रणालियाँ— ये सभी एआई से जुड़े गंभीर नैतिक प्रश्न हैं। यदि इन पर वैश्विक स्तर पर स्पष्ट मानदंड और आचार-संहिता विकसित नहीं की गई, तो तकनीक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं और मानवाधिकारों के लिए चुनौती बन सकती है। भारत के पास अवसर है कि वह विकसित और विकासशील देशों के बीच संवाद का सेतु बने और “मानव-केंद्रित तकनीक” का व्यावहारिक मॉडल प्रस्तुत करे।
नवाचार के संदर्भ में आत्मनिर्भरता भी उतनी ही आवश्यक है। तकनीकी नेतृत्व उसी राष्ट्र को प्राप्त होता है जो अनुसंधान और विकास में अग्रणी हो। भारत का स्टार्टअप पारितंत्र तेजी से विकसित हो रहा है। सरकारी प्रोत्साहन, निजी निवेश और युवाओं की रचनात्मकता मिलकर एआई-आधारित समाधान विकसित कर सकते हैं। किंतु आयातित तकनीक पर अत्यधिक निर्भरता दीर्घकालिक चुनौती बन सकती है। स्वदेशी अनुसंधान, उच्च-गुणवत्ता प्रयोगशालाएँ और वैश्विक सहयोग, इन तीनों का संतुलित समन्वय अनिवार्य है।
यदि कृत्रिम बुद्धिमत्ता केवल शहरी और संपन्न वर्ग तक सीमित रह जाए, तो यह डिजिटल विभाजन को और गहरा कर सकती है। ग्रामीण क्षेत्रों, लघु किसानों, छोटे उद्यमियों और वंचित समुदायों तक तकनीकी पहुँच सुनिश्चित करना आवश्यक है। भाषा विविधता और स्थानीय आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए समाधान विकसित किए जाने चाहिए। तभी यह तकनीक वास्तव में समावेशी और लोकतांत्रिक सिद्ध होगी।
इसके अतिरिक्त, कृत्रिम बुद्धिमत्ता के संदर्भ में हरित प्रौद्योगिकी और जलवायु परिवर्तन से निपटने की संभावनाएँ भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। ऊर्जा प्रबंधन, स्मार्ट ग्रिड, कार्बन उत्सर्जन की निगरानी, जल-संसाधन प्रबंधन तथा आपदा पूर्वानुमान जैसे क्षेत्रों में एआई आधारित प्रणालियाँ नीतिगत निर्णयों को अधिक वैज्ञानिक और प्रभावी बना सकती हैं।
भारत जैसे देश, जो एक ओर तीव्र औद्योगिक विकास की ओर अग्रसर है और दूसरी ओर जलवायु चुनौतियों से जूझ रहा है, उसके लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने का सशक्त उपकरण बन सकती है। यदि एआई का उपयोग स्वच्छ ऊर्जा नवाचार, कृषि जल-प्रबंधन और शहरी यातायात नियंत्रण में व्यापक रूप से किया जाए, तो आर्थिक वृद्धि और पर्यावरणीय संतुलन के बीच सामंजस्य स्थापित किया जा सकता है। इस दृष्टि से यह शिखर सम्मेलन केवल डिजिटल भविष्य की नहीं, बल्कि टिकाऊ भविष्य की भी रूपरेखा प्रस्तुत करता है।
इसके साथ ही, कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में भारत की वैश्विक भूमिका केवल तकनीकी नेतृत्व तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि बौद्धिक और दार्शनिक दिशा देने वाली भी होनी चाहिए। भारत की सभ्यता ने सदैव ज्ञान को नैतिकता, करुणा और समष्टि-कल्याण से जोड़कर देखा है। यदि यही दृष्टि तकनीकी नवाचार में परिलक्षित हो; जहाँ मानव गरिमा, समान अवसर और सामाजिक संतुलन सर्वोपरि हों, तो भारत विश्व समुदाय को एक वैकल्पिक विकास मॉडल प्रदान कर सकता है।
“वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना के अनुरूप यदि एआई का उपयोग वैश्विक सहयोग, डिजिटल समानता और साझा समृद्धि के लिए किया जाए, तो यह तकनीक विभाजन नहीं, बल्कि वैश्विक एकात्मता का सेतु बन सकती है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता का युग मशीनों का ही नहीं, बल्कि मानवीय विवेक की परीक्षा का युग है। यह अवसर है कि भारत तकनीकी शक्ति को मानवीय मूल्यों से जोड़े और विकास को केवल आर्थिक प्रगति नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और पर्यावरणीय संतुलन के साथ परिभाषित करे। यदि दूरदर्शिता, नैतिक प्रतिबद्धता और समावेशी नीति के साथ आगे बढ़ा जाए, तो भारत न केवल इस तकनीकी क्रांति का सहभागी होगा, बल्कि उसका मार्गदर्शक भी बन सकता है। चुनौती गंभीर है, पर संभावना ऐतिहासिक, और यही वह क्षण है जिसे दूरदर्शी नेतृत्व और सजग समाज मिलकर भविष्य की दिशा में परिवर्तित कर सकते हैं।
इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 केवल एक सम्मेलन नहीं, बल्कि एक वैश्विक आंदोलन का आगाज़ है। “सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय” के मंत्र के साथ, भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि एआई का भविष्य केवल मुनाफे में नहीं, बल्कि मानवता के कल्याण में है।
मुकेश अंबानी द्वारा घोषित दस लाख करोड़ रुपए के निवेश और प्रधानमंत्री मोदी के विज़न ने भारत को एआई के ‘ग्लोबल हब’ के रूप में स्थापित कर दिया है। यह समिट गवाह है कि कैसे तकनीक का उपयोग गरीबी मिटाने, खेती को सुधारने और शिक्षा को हर घर तक पहुँचाने के लिए किया जा सकता है। संक्षेप में, यह आयोजन यह संदेश देता है कि जब तकनीक को भारतीय मूल्यों का साथ मिलता है, तो वह विनाश नहीं, विकास का मार्ग प्रशस्त करती है।
– डॉ. दीपक कोहली

