राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के निर्माण से लेकर अभी तक भारतीय समाज में इस संगठन को लेकर अनेक सवाल, संशय, जिज्ञासा रहती आई हैं। जो पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं, उन्हें कभी-भी किसी भी मसले का सही जवाब मिल ही नहीं सकता, लेकिन जो कोरी स्लेट पर इबारत लिखना चाहता है, उसे संघ के 100 साला सफर को रेखांकित करने वाली फिल्म शतक काफी संतोषप्रद, सटीक और सटीक रूप में जानकारी देने में सक्षम है।
/filters:format(webp)/movietalkies/media/media_files/2026/02/20/shatak-1-2026-02-20-17-01-42.jpg)
इसलिये मेरा तो मानना है कि संघ ने प्रयासपूर्वक देश के चुनिंदा शहरों में संघ विरोधियों के लिये विशेष शो आयोजित करना चाहिये। बेशक, वह ऐसा कभी नहीं करेगा, क्योंकि संघ कभी खंडन-मंडन के चक्कर में रहा ही नहीं। उसका एकमात्र ध्येय राष्ट्र निर्माण, हिंदू एकता और सामाजिक सद्भाव रहा है। इस मायने में 20 फरवरी को प्रदर्शित फिल्म शतक अपने मंतव्य में सफल कही जा सकती है।

जिस तरह से मनुष्य की उम्र 100 साल हो जाना बड़ी उपलब्धि है और यह आनंद तब कई गुना बढ़ जाता है, जब वह व्यक्ति स्वस्थ-प्रसन्न भी हो। इस लिहाज से संघ 100 साल पूरे कर खुशहाल, मजबूत, लोकप्रिय और संभावनाओं से भरपूर है। पूरी तरह से गैर सरकारी सहायता प्राप्त किसी संगठन के 100 बरस पूरे होना ऐतिहासिक होने के साथ चमत्कृत करने वाला है। उसकी खास वजह यह है कि उम्र बढ़ने के साथ यह अपेक्षाकृत सक्षम, अपने ध्येय में दृढ़ और राष्ट्र हित के संकल्प में अडिग साबित हुआ। यह बेहद असाधारण है। यह तब हुआ, जब 100 साल में से करीब 85 साल तो संघ संघर्ष ही करता रहा। अलबत्ता अटल बिहारी वाजपेयी के 5 साल व नरेंद्र मोदी सरकार के 10 साल के कार्यकाल में जरूर वह सरकारी प्रताड़ना से बचा रहा, वरना तो कभी उसे चैन की सांस नहीं लेने दी गई।

अस्तु, शतक फिल्म में संघ के इसी संघर्षशील सफर को दिखाया गया है, वह भी बिना किसी अतिरेक के। हां, इतना अवश्य है कि जिन घटनाओं को लेकर संघ विरोधी लगातार दुष्प्रचार करते रहे, उनके वास्तविक स्वरूप को तथ्यात्मक तरीके से फिल्मांकित किया गया है। कश्मीर में कबिलाइयों के भेष में घुसे पाकिस्तानी सैनिकों से लोहा लेना हो, दादरा नगर हवेली से विदेशियों को भगाना हो, चीन से युद्ध के बाद संघ के उल्लेखनीय योगदान के मद्देनजर दिल्ली की परेड में स्वयं सेवको को शामिल करना हो या तीन-तीन बार प्रतिबंध लगाना हो।
संघ ने अपनी कार्य पद्धति के परिप्रेक्ष्य में राजनीति से निश्चित दूरी बनाये रखने का भी ध्यान रखते हुए 1980 में भारतीय जनता पार्टी के गठन और 2014 में केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के घटनाक्रम को स्पर्श भी नहीं किया, जो बताता है कि संघ श्रेय के भाव से काम नहीं करता। इसीलिये स्वयं सेवक के लिये भी हमेशा यह स्पष्टता रही कि वह अपनी कोई भी निजी मान्यता और पूजा पद्धति रखे, लेकिन संघ के समाज कल्याण और राष्ट्र हित के भाव को धारण किये रहे, उतना काफी है।
/filters:format(webp)/movietalkies/media/media_files/2026/02/20/shatak-8-2026-02-20-17-01-42.jpg)
फिल्म शतक पूरी तरह से दृश्य माध्यम के आवश्यक तकाजों का पालन करते हुए बनाई गई है, जिसमें सधा हुआ संपादन, जहां जरूरी हो, वहां संगीत, किसी सांप्रदायिक विद्वेष को बढ़ाने वाले घटनाक्रम से परहेज और क्रमबद्धता बरकरार रखी गई।
तुर्की के शहंशाह के समर्थन में भारत में भड़के दंगों में हिंदुओं पर हुए अत्याचारों को जरूर दिखाया गया है, जो राष्ट्रीय अस्मिता से जुड़ा मसला था। एक और उल्लेखनीय पक्ष यह है कि संघ के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार की बाल्यकाल से युवावस्था तक स्वतंत्रता आंदोलन में प्रत्यक्ष योगदान की स्पष्ट घटनाओं को सविस्तार बताया गया है, ताकि संघ विरोधी राजनीतिक लोगों का झूठ सामने आये कि संघ के लोगों का आजादी में कोई योगदान नहीं है। जबकि श्यामाप्रसाद मुखर्जी, बलराज मधोक, वीर सावरकर आदि अनेक महापुरुषों ने फिरंगी सरकार से लोहा लिया था।
एक और विशेष बात है कि इसे सितारा चमक से दूर रखा गया है, ताकि दर्शक सीधे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े, न कि किसी नामचीन कलाकार के आभामंडल की गिरफ्त में रहे। फिल्म में संभवत मराठी रंगमंच व फिल्मों के निष्णात कलाकार लिये गये हैं, ताकि उनके हिंदी उच्चारण में मराठी का स्वाभाविक पुट रहे। इसमें अजय देवगन की कमेंट्री जरूर है, जो बीच-बीच में कथानक को स्पष्ट करते चलती है। करीब दो घंटे की इस फिल्म में लगभग आधे संवाद कलाकार बोलते हैं तो आधे भाग में कमेंट्री चलती है।

स्वतंत्रता के समय राष्ट्रीय ध्वज के तौर पर भगवा पर आम सहमति होने के बावजूद तिरंगे को अपनाने का खुलासा भी है, जो बताता है कि किस तरह से हमारे नेतृत्वकर्ता प्रारंभ से ही तुष्टिकरण की राह पर चलते रहे।
फिल्म का निर्माण वीर कपूर ने किया है, जबकि निर्देशक हैं आशीष मल्ल। संगीत मोंटी शर्मा-सनी इंदर का है। इसमें आर्टीफिशियल इंटिलेजेंस व वीएफएक्स का काफी उपयोग किया गया है, जो भविष्य के फिल्म निर्माण की तस्वीर साफ करता है। इस फिल्म के लिये बॉक्स ऑफिस पर भले ही लोग न टूटे, लेकिन साधारण जिज्ञासा रखने वाला भी इसे जरूर देखेगा। विरोधियों को इसलिये देखना चाहिये कि आखिर संघ ने कैसे यह मुकाम बनाया कि वह विश्व का सबसे बड़ा गैर राजनीतिक संगठन बन गया, जिसमें आज भी पूर्णकालिक जीवनदायी स्वयंसेवक ध्येय पथ पर अग्रसर हो रहे हैं।
– रमण रावल

