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Iran vs Israel Latest Update

अमेरिका-ईरान युद्ध : सीमित संघर्ष या महायुद्ध ?

by अमोल पेडणेकर
in देश-विदेश, विशेष
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इज़रायल की “आयरन डोम” और “डेविड्स स्लिंग” जैसी वायु-रक्षा प्रणालियां काफी उन्नत हैं। अमेरिका की नौसेना की उपस्थिति भी संतुलन बदल सकती है। फिर भी बड़े पैमाने पर मिसाइल वर्षा किसी भी रक्षा तंत्र की परीक्षा ले सकती है। इजरायल की आयरन डोम जैसी रक्षा प्रणालियों की परीक्षा का भी यह समय हो सकता है।

पश्चिम एशिया यानी मिडिल ईस्ट एक बार फिर वैश्विक राजनीति के केंद्र में है। अमेरिका और इज़रायल ने मिलकर ईरान के सैन्य और परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमला किया है, तो यह केवल तीन देशों के बीच की सैन्य झड़प नहीं है, बल्कि वैश्विक शक्ति-संतुलन की परीक्षा बन सकती है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का यह कथन कि “ईरान अब कभी परमाणु कार्यक्रम नहीं चला पाएगा” और इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का यह दावा कि “ईरान का परमाणु कार्यक्रम विश्व के लिए खतरा है”, संकेत देता है कि यह कार्रवाई पूर्व-नियोजित और रणनीतिक है।

US On High Alert Amid Fear Of Israeli Strike On Iran's Nuclear Sites: Report

दूसरी ओर, ईरान का यह बयान कि “ईरान पर हुए इस हमले का जवाब कुचलने वाला होगा” इस संघर्ष को सीमित रखने की संभावना को कम करता है।क्या यह कुछ घंटों का युद्ध है या लंबा संघर्ष? इस बात पर विश्व की नजरे टिकी हुई है। इतिहास बताता है कि पश्चिम एशिया में कोई भी सैन्य कार्रवाई अक्सर अपेक्षा से अधिक लंबी और जटिल हो जाती है। 2003 में अमेरिका का इराक पर हमला वर्षों तक चला। अफगानिस्तान-रूस का संघर्ष भी इसी बात पर जोर देता है। अफगानिस्तान और इराक के अनुभव ने अमेरिकी समाज को लंबे युद्धों से थका दिया है।

यदि वर्तमान संघर्ष केवल ईरान के परमाणु ढांचे को नष्ट करने तक सीमित है, तो यह कुछ दिनों या हफ्तों का युद्ध अभियान हो सकता है। परंतु यदि ईरान ने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से इज़रायल और अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर व्यापक मिसाइल हमले शुरू कर दिए, तो यह क्षेत्रीय युद्ध में बदल सकता है। वैसे यह आलेख लिखने तक ईरान ने इजरायल के अलग-अलग ठिकानों पर मिसाइल हमले कर दिए हैं।

Israel-Iran War: इजरायल-ईरान के बीच भीषण जंग... भारत के लिए क्‍यों बढ़ी  टेंशन? ये हैं कारण - Israel Iran War US Attack Strait of Hormuz Close  Tension to India Crude Oil tutd -

ईरान की सैन्य क्षमता को देखते हुए उसका जवाब प्रभावी होगा? ईरान की सबसे बड़ी ताकत उसकी बैलिस्टिक और क्रूज़ मिसाइल क्षमता है। शहाब और फतह जैसी मिसाइलें इज़रायल और खाड़ी क्षेत्र तक पहुंच सकती हैं। ड्रोन तकनीक में भी ईरान ने उल्लेखनीय प्रगति की है। लेख लिखते समय कुवैत और कतर, बहरीन के अमेरिकी सैन्य ठिकानो के पास ईरान ने मिसाईल हमला किया है। इसी प्रकार यदि ईरान कतर, सऊदी अरब पर और भी हमले बढाता है या अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाता है, तो संघर्ष का दायरा बढ़ सकता है।

Iran vows to continue strikes against Israel, US bases, military officials  say | Reuters

हालांकि, इज़रायल की “आयरन डोम” और “डेविड्स स्लिंग” जैसी वायु-रक्षा प्रणालियां काफी उन्नत हैं। अमेरिका की नौसेना की उपस्थिति भी संतुलन बदल सकती है। फिर भी बड़े पैमाने पर मिसाइल वर्षा किसी भी रक्षा तंत्र की परीक्षा ले सकती है। इजरायल की आयरन डोम जैसी रक्षा प्रणालियों की परीक्षा का भी यह समय हो सकता है।

चीन और रूस दोनों ईरान के रणनीतिक सहयोगी रहे हैं। रूस पहले से ही यूक्रेन युद्ध में उलझा है; अब वह सीधे सैन्य हस्तक्षेप से बचने की संभावना ज्यादा है, परंतु ईरान को हथियार और खुफिया सहयोग दे सकता है। चीन, जो ईरान से ऊर्जा आयात करता है, वह ईरान को आर्थिक और कूटनीतिक समर्थन दे सकता है। यदि इस युद्ध में ये दोनों देश खुलकर ईरान के साथ खड़े होते हैं, तो यह संघर्ष महाशक्तियों के टकराव का रूप ले सकता है।
संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएनओ) का अब तक का इतिहास मिश्रित रहा है।

सुरक्षा परिषद में अमेरिका, रूस और चीन जैसे स्थायी सदस्यों के वीटो अधिकार के कारण ठोस कार्रवाई अक्सर अटक जाती है। यदि अमेरिका स्वयं युद्ध का पक्षकार है, तो संयुक्त राष्ट्र के प्रभावी हस्तक्षेप की संभावना कम दिखती है। संभवत, आपात बैठक बुलाई जाएगी, युद्धविराम की अपील होगी, परंतु वास्तविक सैन्य रोकथाम कठिन होगी।

Live updates: U.S. military begins 'major combat operations in Iran,' Trump  says

खाड़ी के देश कतर, सऊदी अरब, कुवैत जैसे अमेरिका के दोस्त मुस्लिम राष्ट्र एक जटिल स्थिति में हैं। सऊदी अरब और अमेरिका के संबंध मजबूत हैं, परंतु उनकी धरती पर अमेरिकी ठिकाने हैं। यदि ईरान इन पर हमला करता है, तो वे सीधे युद्ध में खिंच सकते हैं। कतर, जहां अमेरिकी एयरबेस है, रणनीतिक लक्ष्य बन सकता है। तुर्की, पाकिस्तान और अन्य मुस्लिम राष्ट्रों को भी आंतरिक जनमत और अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच संतुलन साधना होगा।

अमेरिका को तीन स्तरों पर नुकसान हो सकता है, यदि खाड़ी में स्थित उसके ठिकानों पर ईरान के द्वारा हमले होते हैं तो अमेरिका को सैन्य नुकसान हो सकता हैं। तेल की कीमतों में उछाल से वैश्विक अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी। यदि युद्ध लंबा खिंचता है तो जनमत अमेरिका के विरुद्ध जाने की संभावना ज्यादा हो सकती है। अगर ऐसा होता है तो यह वैश्विक स्तर पर अमेरिका का राजनीतिक नुकसान होने वाली बात होगी।
क्या यह है?

US attack Iran: US, Israel launch Operation Epic Fury against Iran;  explosions rock Tehran - India Today

अमेरिका का तर्क है कि वह परमाणु प्रसार रोकने के लिए यानी शांति के लिए युद्ध की कार्रवाई कर रहा है। इस प्रकार अमेरिका की धारणा है। ईरान इसे अपनी संप्रभुता पर हमला बताएगा। असल में अमेरिका-इजरायल और ईरान का यह युद्ध शक्ति-संतुलन और दबाव-नीति के बीच है। ईरान को वार्ता की मेज पर कमजोर स्थिति में लाने का प्रयास इस युद्ध के माध्यम से अमेरिका कर रहा है।

भारत के लिए यह स्थिति अत्यंत संवेदनशील है। ईरान में लगभग 10,000 भारतीयों की उपस्थिति बताई जा रही है। इज़रायल में भी भारतीय समुदाय मौजूद है। भारत की प्राथमिकता होगी कि अपने नागरिकों की सुरक्षित निकासी करे। साथ में इन परिस्थितियों में तटस्थ कूटनीतिक रुख बनाए रखना। ऊर्जा आपूर्ति और व्यापार हितों की रक्षा करना। इज़रायल से रक्षा सहयोग और ईरान से ऊर्जा संबंध दोनों बनाए रखना है। भारत परंपरागत रूप से संतुलन की नीति अपनाता रहा है।

Iran: We can destroy US bases 'minutes after an attack'

यदि अमेरिका, इजरायल और ईरान का यह संघर्ष लंबा चलता है, तो वैश्विक ध्रुवीकरण बढ़ सकता है। अमेरिका, इज़रायल, पश्चिमी गठबंधन और ईरान, रूस, चीन का दूसरा गठबंधन अगर आमने-सामने खड़े होते हैं तो यह परिदृश्य “नई शीत युद्ध” जैसी स्थिति पैदा कर सकता है।

युद्ध की शुरुआत में बयानबाज़ी अक्सर आक्रामक होती है। असली संकेत तो आने वाले भविष्य की गतिविधियों से मिलेंगे। क्या हमले सीमित होंगे? क्या ईरान-अमेरिका के सैन्य क्षेत्रीय ठिकानों पर हमला करेगा? क्या चीन और रूस इस युद्ध में सक्रिय भूमिका निभाएंगे? यदि प्रतिघात नियंत्रित रहा, तो यह सीमित सैन्य कार्रवाई रह सकती है। यदि प्रतिशोध का दायरा बढ़ा, तो पश्चिम एशिया एक व्यापक युद्ध की ओर बढ़ सकता है।

वर्तमान परिस्थिति में विश्व शांति की जिम्मेदारी केवल संयुक्त राष्ट्र या महाशक्तियों पर नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण कूटनीति पर है। आने वाले कुछ दिनों में ही तय होगा कि यह संघर्ष इतिहास में एक “सीमित ऑपरेशन” के रूप में दर्ज होगा या 21वीं सदी के सबसे बड़े भू-राजनीतिक संकट के रूप में।

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Tags: #21stCenturyCrisis #IsWorldWarComing #MiddleEastOnFire #DiplomacyMatters#MiddleEastWar #IranIsraelConflict #USIranWar #GlobalCrisis #WorldPolitics #Geopolitics #BreakingNews #WestAsia

अमोल पेडणेकर

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