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स्वयं का सफ़र

by हिंदी विवेक
in कहानी
1

आज वर्षो बाद शालिनी अकेले ट्रेन से सफर कर रही थी । अर्जुन ने उससे कहा कि यह तुम्हारे स्वयं की यात्रा है और पीछे छूटे अपने संसार को स्मृतियों में संरक्षित कर लो । जो छूट रहा है वो सुखद स्मृतियों में दर्ज रहेगा । ट्रेन का सफर जैसे जीवन के सफर को ही इंगित करता है । कितने परिचित , अपरिचित लोगों से मिलना और अपने – अपने स्टेशन पर हर किसी का उतर जाना जैसे जीवन के कोरे सच को उदघाटित कर रहा था । एक डिब्बे में उपस्थित हर सहयात्री की अपनी एक जीवन यात्रा है । सामने बर्थ पर बैठी तकरीबन छः वर्ष की मासूम सी बच्ची जिसने अपना नाम परी बताया नन्ही शरारतों से बरबस उसे अपनी ओर आर्कषित कर रही थीं । ‘ आंटी आप किसके साथ आए हो ? ‘ सुन कर शालिनी की तंद्रा भंग हुई । ‘किसी ने साथ नही ‘ शालिनी ने मुस्कुराते हुए कहा ।

‘ आंटी आपको अकेले डर नही लगता ‘ मेरे पापा कहते है कि अकेले नही जाना । बगल में बैठी उसकी मम्मी थोड़ी संजीदा सी प्रतीत हो रही थीं । वह फोन पर अपने पति से बातें कर रही थी और परी की मासूम हरकतों के बारे में बतला रही थीं । उसे मोबाईल से आती दूसरे तरफ की आवाज कुछ जानी – पहचानी लग रही थी । जीवन में स्मृतियों की लंबी फेरहिस्त होती है, उसमें से किसी एक को खंगालना आसान नही होता । फिर परी की मम्मी यानि निम्मी से बातें होने लगी । निम्मी एक स्कूल टीचर थी और बड़ी व्यवस्थित -सी लगी । उसने बड़े करीने से साड़ी पहन रखी थी और क्लचर से बाहर निकलते उसके रेशमी बाल सुंदर लग रहे थे । वे दोनों बाते कर रही थी और ऊपर बैठे दो सहयात्री उनकी बातों को बस , जैसे सुनने में लगे थे । पहले तो औपचारिक सतही तौर पर बातें होती रही फिर अचानक यह सच उजागर हुआ कि निम्मी का ससुराल तो उसकी बुआ के घर के पड़ोस में ही है । वह स्मृतियों में विचरने लगी कि बुआ के घर वे लोग कितने मजे करते थे ।

शालिनी की बुआ की लड़की मिन्नी उसकी हमउम्र थी अत: उसके साथ पड़ोस में भी खूब घूमना होता था । निम्मी के पति यानि विनोद को वह बखूबी जानती थी इसलिए मोबाईल से आती आवाज उसे जानी – पहचानी सी लग रही थी । विनोद अपने नाम के अनुरूप ही विनोदी स्वभाव का था । उसे बैडमिंटन खेलने का बड़ा शौक था और विनोद को भी इस खेल में थोड़ी महारत हासिल थी । वो घंटों साथ खेलते रहते और एकदूसरे को छिपी नजरों से देखा भी करते थे । उसे कई बार ऐसा लगा कि विनोद भी उसके प्रति आर्कषित है और उसे नोटिस करता है लेकिन उस समय पढ़ाई के प्रति वो समर्पित थी इसलिए इधर – उधर ज्यादा ध्यान नही देती थी । समय ने अपनी रफ्तार पकड़ी और धीरे – धीरे रिश्ते बस , शादी – ब्याह में मिलने तक सिमट कर रह गये । शालिनी पति के रूप में अर्जुन को पाकर बहुत खुश थी और उसके दोनों बच्चे तो मानो उसका ही प्रतिरूप थे । शक्ल तो ज्यादा अर्जुन से मिलती थी लेकिन व्यवहार में बिल्कुल उसके जैसे थे । जब से शालिनी की गोहाटी पोस्टिंग की खबर आयी थी वो विचलित -सी थी । कैसे सब कुछ व्यवस्थित हो पाएगा ? हमेशा अपने परिवार के साथ रहने वाली वो अकेले कैसे रहेगी ? इन्ही उधेड़बुन में घिरी वो ट्रेन पर चढ़ी थी।

मासूम -सी परी के प्रश्नों ने जैसे उसकी स्थिति पर ही सवाल कर दिया था । निम्मी उससे खाने की वस्तुएँ शेयर कर रही थी । इस सफर में दोनों घुलमिल गयी फिर भी वो निम्मी को यह बताने की हिम्मत नही जुटा पायी कि वो उसके पति को बखूबी जानती है और उसके मन में आज भी वो अनछुए एहसास जीवित है । ट्रेन स्टेशन पर रुक रही थी और यात्री चढ़ -उतर रहे थे फिर, सहसा ! ऊपर बैठा सहयात्री बोल पड़ा ‘ तुम शालिनी हो ना ‘ वह एकबारगी चौंक गयी और ऊपर गौर से देखा अरे ! ये तो पंकज है उसका बचपन का साथी , उसकी पड़ोस वाली आंटी की बेटा । कैसा सुखद संयोग है ! इस ट्रेन में मेरे न जाने कितने अपने सफर कर रहे है और मुझे पता भी नही है । इस ट्रेन में कई बोगिया है और कितने सहयात्री है लेकिन हमारे बीच की कड़ी कहीं टूटी पड़ीं है। हम सिमट कर रह गये है और अपनी प्राइवेसी शेयर नही करना चाहते अत: किसी से जुड़ना आसान नहीं होता । शालिनी ने पंकज से पूछा ‘तुमने मुझे पहचान लिया ‘ उसने कहा ‘ तुम चाहे कितनी भी बदल गयी हो लेकिन तुम्हारी मुस्कुराहट आज भी हूबहू है ‘ मैंने जब तुम्हे पहली बार ट्रेन पर चढ़ते देखा तो लगा कि तुम शालिनी तो नही हो फिर तुम्हारी सोशल मीडिया पोस्ट खंगाली तो श्योर हो गया । लोग खामखां सोशल मीडिया को गलियाते फिरते है । सच तो है कि सोशल मीडिया के कई सकारात्मक पहलू भी है । जानती हो शालिनी मैं भी गोहाटी जा रहा हूँ ।

मैं अपने परिवार के साथ वहाँ सात वर्षो से रह रहा हूँ । तुम अभी कहाँ ठहरोगी ? शालिनी ने कहा ‘ मेरा गेस्ट – हाऊस बुक है ‘ कोई नही शालिनी तुम्हे किसी भी मदद की जरूरत हो तो बेझिझक बताना , मैं सौ – फीसदी हाजिर रहूँगा । ‘ शालिनी नन्ही परी की ओर मुस्कुराते हुए देख रही थी और मानों कह रही थी कि हम बिल्कुल अकेले नही है और जब हमारे अपने साथ हो तो डर किस बात का ?

परिणीता सिन्हा ‘ स्वयंसिद्धा ‘

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Comments 1

  1. Anonymous says:
    6 minutes ago

    बहुत ही सुंदर रचना, विशेष रूप से नाम, Shalini

    Reply

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