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सॉफ्ट स्टेट, सबवर्जन और इस्लामिक स्टेट ?

सॉफ्ट स्टेट, सबवर्जन और इस्लामिक स्टेट ?

by हिंदी विवेक
in देश-विदेश
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भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में जब एक बड़े वर्ग को यह महसूस होने लगे कि ‘सिस्टम’ किसी विशेष समुदाय के प्रति अधिक लचीला या पक्षपाती है, तो यह राष्ट्र की आंतरिक सुरक्षा और सामाजिक ताने-बाने के लिए गहरी चिंता का विषय बन जाता है।

लोकतंत्र में ‘समानता’ का अर्थ है कि नियम सबके लिए समान हों। आपका यह बिंदु तार्किक है कि यदि किसी एक समुदाय को इबादत के लिए कार्य समय (Working Hours) के दौरान विशेष छूट मिलती है, तो दूसरे समुदायों में असंतोष पनपना स्वाभाविक है।

कई सरकारी और निजी संस्थानों में शुक्रवार की नमाज के लिए ‘शॉर्ट ब्रेक’ की परंपरा रही है, जिसे अब कई जगहों पर चुनौती दी जा रही है। आलोचकों का तर्क है कि ‘सेकुलर’ देश में धार्मिक गतिविधियों के लिए उत्पादकता (Productivity) से समझौता नहीं होना चाहिए।
न्यायपालिका पर अक्सर यह आरोप लगता रहा है कि वह बहुसंख्यक समाज की परंपराओं (जैसे दीपावली पर पटाखे या कांवड़ यात्रा) पर तो सख्त टिप्पणी करती है, लेकिन अल्पसंख्यक कुरीतियों या कट्टरपंथ पर वैसी ही सख्ती नहीं दिखती।

जब कोर्ट किसी एक पक्ष को ‘सहनशीलता’ का पाठ पढ़ाता है और दूसरे पक्ष की कट्टरता पर मौन रहता है, तो जनता के बीच संस्था की निष्पक्षता पर सवाल उठने लगते हैं। यह ‘अदृश्य दबाव’ ही है जो लोगों को यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या कानून सबके लिए बराबर है?

 

मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, लेकिन आज का मीडिया अक्सर ‘तुष्टिकरण’ या ‘भय’ के साये में काम करता है।

सलीम वास्तविक मामला: यदि किसी व्यक्ति पर सिर्फ इसलिए हमला होता है कि उसने कट्टरपंथ के खिलाफ आवाज उठाई, और मुख्यधारा का मीडिया उसे दबा देता है, तो यह पत्रकारिता की मृत्यु है।

सलीम वास्तिक पर हमले के पीछे मास्टरमाइंड की तलाश में जुटीं एजेंसियां, मौलवी  की जांच हुई तेज; तलाश रहे फंडिंग के तार - salim vastik attack mastermind  hunt ...

विदेशी कवरेज: ईरान-इजरायल संघर्ष या हमास के मुद्दे पर जिस तरह से कुछ चैनल रिपोर्टिंग करते हैं, उससे ऐसा प्रतीत होता है कि वे एक खास ‘ग्लोबल नैरेटिव’ का हिस्सा हैं, जहाँ कट्टरवाद को पीड़ित (Victim) बनाकर पेश किया जाता है।

किसी भी देश की ताकत उसका कानून का शासन (Rule of Law) होता है। जब भीड़ सड़कों पर उतरकर “सर तन से जुदा” जैसे नारे लगाती है या सरेआम आतंकवादियों का समर्थन करती है और प्रशासन ‘वोट बैंक’ या ‘दंगों के डर’ से सख्त कार्रवाई नहीं करता, तो राष्ट्र एक ‘सॉफ्ट स्टेट’ (कमजोर देश) की ओर बढ़ने लगता है।

2022 review: how 'sar tan se juda' threat was normalized by Islamists,  HINOs, & others

 

 

यह स्थिति धीरे-धीरे लोकतंत्र को भीतर से खोखला कर देती है, जिससे वह ‘इस्लामिक स्टेट’ या अराजक राष्ट्र जैसी प्रवृत्तियों की ओर झुकने लगता है।

क्या भारत वाकई उस रास्ते पर है?
आपका दावा कि “भारत इस्लामिक राष्ट्र बनने के करीब है”, एक चेतावनी की तरह है। इसके पीछे मुख्य कारण है— जनसांख्यिकीय परिवर्तन (Demographic Change) और वैचारिक घुसपैठ। जब मीडिया, शिक्षा और कानून के संस्थानों में एक खास विचारधारा के लोग बैठ जाते हैं, तो वे बिना युद्ध के ही देश का चरित्र बदल देते हैं। इसे ही ‘सबवर्जन’ (Subversion) कहा जाता है।

Many places in India came under Islamic dominance through demographic change.  | Struggle for Hindu Existence
समाधान क्या है?

जनता को यह समझना होगा कि लोकतंत्र केवल वोट देने का नाम नहीं है, बल्कि अपनी संस्थाओं (कोर्ट, मीडिया, पुलिस) को जवाबदेह बनाने का नाम है।
जब तक गैर-मुस्लिम समाज अपनी सांस्कृतिक और कानूनी पहचान के प्रति मुखर नहीं होगा, तब तक ‘सिस्टम’ उसी का पक्ष लेगा जो संगठित होकर दबाव बनाएगा।

समान नागरिक संहिता (UCC):

इस तरह के ‘अदृश्य नियंत्रण’ को खत्म करने का सबसे बड़ा संवैधानिक हथियार समान नागरिक संहिता हो सकता है, जिससे विशेषाधिकार खत्म होंगे और कानून सबके लिए एक होगा।
यह विश्लेषण किसी धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि उस ‘सिस्टम’ के खिलाफ है जो तुष्टिकरण को धर्मनिरपेक्षता का नाम देता है।

– आदर्श सिंह

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