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Iran Israel War

वर्चस्व की लड़ाई

by रमेश पतंगे
in देश-विदेश
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वर्तमान में चल रहा युद्ध भूमि जीतने के लिए नहीं ईरान के तेल भंडार को अपने कब्जे में लेने के लिए भी नहीं है। यह कारण द्वितीय महायुद्ध के लिए थे। प्राकृतिक साधन संपत्ति पर कब्जा करना, युद्ध के माध्यम से भूमि जीतना, यह युद्ध का कारण अब नहीं रहा। यह युद्ध अब वर्चस्व की लड़ाई के लिए है।

ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच युद्ध हो रहा है। इस युद्ध की ऐतिहासिक पार्श्वभूमी Global Conflict इस साइट पर विस्तार से उपलब्ध है। यह युद्ध 28 फरवरी को प्रारंभ हुआ, अर्थात कुछ वर्ष पूर्व रुका हुआ युद्ध पुन: शुरू हुआ। जून 2025 को इजराइल ने ईरान पर आक्रमण किया था। तब अमेरिका आज की तरह युद्ध में शामिल नहीं हुआ था। परंतु इजरायल के साथ मजबूती से खड़ा था। डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल में ईरान और अमेरिका के बीच संघर्ष अधिक तीव्र हुआ।

प्रत्येक युद्ध के लिए कोई ना कोई कारण होता है। वैसे ही इस युद्ध के लिए भी कारण है। अमेरिका का कारण यह है कि ईरान का अणुशक्ति संपन्न होना, विश्व शांति के लिए खतरा है। इसलिए ईरान ने यह कार्यक्रम बंद कर देना चाहिए। परंतु ईरान यह मानने को राजी नहीं है। इसलिए अमेरिका ने यूएनओ के साथ मिलकर ईरान पर प्रचंड आर्थिक प्रतिबंध लगाए। फिर भी ईरान झुकने को तैयार नहीं हुआ।

Q&A: An Energy Take on the Current State of the Iran-Israel-US Conflict -  Center on Global Energy Policy at Columbia University SIPA | CGEP %

अमेरिका के लिए दूसरा कारण यह है की, ईरान की शिया इस्लामी सत्ता आतंकवाद को प्रोत्साहन देने वाली है। ईरान आतंकवाद को समर्थन देने वाला देश हो गया है। गाजा पट्टी और लेबनान के क्षेत्र में ईरान ने हमास और हिजबुल्ला इन आतंकवादी संगठनों को ड्रोन और मिसाइल देकर उनकी मारक क्षमता को अधिक बढ़ाया है। यदि अभी ईरान को नहीं रोका गया तो हो सकता है की आगे चलकर ईरान अमेरिका पर आक्रमण करने की स्थिति में भी आ जाए।

इजराइल का सोचना यह है की, ईरान का अणुशक्ति कार्यक्रम भविष्य में इजराइल के विनाश का कारण हो सकता है। इजरायल की समाप्ति यह ईरान का लक्ष्य है। उसके लिए ईरान ने अंतरखंडिय मिसाइलों और ड्रोन का निर्माण किया है।

इससे इजराइल के अस्तित्व को प्रचंड खतरा निर्माण हो गया है। इसलिए इसराइल ने ईरान के अणुप्रकल्पों पर हमला किया है। ईरान के अणु वैज्ञानिकों पर चुन चुन कर हमला कर उनकी हत्या कर दी है। ईरान ने समृद्ध यूरेनियम (अणु बम के लिए आवश्यक खनिज) बनाने की शुरुआत कर दी है। ईरान की इस शक्ति को पूर्ण रूपेण नष्ट करने के लिए यह युद्ध हो रहा है।

Did Trump approve Israel's attack on Iran, and is the US preparing for war?  | US-Israel war on Iran News | Al Jazeera

इस युद्ध के तीन चेहरे हैं। आयतुल्ला खामेनी( जिनकी हत्या कर दी गई है), दूसरा डोनाल्ड ट्रंप और तीसरा बेंजामिन नेतन्याहू। इनमें से ईरान की महत्वाकांक्षा मुस्लिम विश्व का नेतृत्व करने की है। कुरान और शरीयत के आधार पर ईरान में खामेनी ने इस्लामी सत्ता स्थापित की है। लड़कियों की शादी की उम्र 9 साल कर दी गई है। स्त्रियों को बुरखा डालना अनिवार्य कर दिया है।

नेत्यांनाहू ज्यू धर्म के हैं, डोनाल्ड ट्रंप क्रिश्चियन है और ईरान शिया मुस्लिम है। ऐसा भी कहा जा सकता है कि ये तीनों धर्म अब्राह्मिक धर्म हैं। अर्थात तीनों धर्मों का उद्गम स्थान एक ही है परंतु वे अत्यंत असहिश्णु हैं। मेरा धर्म श्रेष्ठ और अन्य लोगों ने उसको स्वीकार करना चाहिए ऐसी उनकी मानसिकता है। इस दृष्टि से
ज्यू अब विस्तारवादी नहीं है। परंतु वह अत्यंत आक्रामक और असहिष्णु है। फिलिस्तीन में इजरायल देश बनने के बाद वहां के अरब मुसलमानों को भगाने का काम बड़े प्रमाण पर हुआ।

Iran war updates: IEA to release oil reserves; ships hit in Hormuz Strait

यह युद्ध न तो भूमि जीतने के लिए है या ईरान के तेल भंडार पर कब्जा करने के लिए है। यह कारण दूसरे महायुद्ध के थे। प्राकृतिक साधन संपत्ति पर कब्जा करने के लिए या भूमि जीतने के लिए, ये युद्ध के कारण अब नहीं रहे। यह युद्ध वर्चस्व की लड़ाई का है। अमेरिका का यह उद्देश्य है कि ईरान एक सीमा से अधिक शक्तिशाली ना हो और इजराइल को यह देखना है की, ईरान समर्थित आतंकवाद की कमर टूट जाए।

इस युद्ध की जड़ में एक कारण है वह याने असीमित असहिष्णुता! मैं ही जिंदा रहूंगा और तुम्हें यदि जीवित रहना हो तो मेरे इशारों पर चलना होगा। यह भूमिका ईरान की है, अमेरिका की है, इजरायल की है और अमेरिका का समर्थन करने वाले सभी यूरोपीय देशों की है। यह मानसिकता मानवता के लिए घातक है। उस पर स्वामी विवेकानंद ने अत्यंत कठोर शब्दों में अपने विचार व्यक्त किए हैं। शिकागो में 11 सितंबर 1893 को सर्वधर्म परिषद में स्वामी विवेकानंद का अजरामर भाषण हुआ था। उन्होंने कहा,
” सांप्रदायिकता, कट्टरता, कर्मठता और धर्मांधता ने बहुत समय से पृथ्वी को अपने पंजों में जकड़ कर रखा है। इन सबने पृथ्वी को हिंसाचार से भर दिया है। कई बार यह पृथ्वी रक्त से लाल हो गई है। कई संस्कृतियों का विनाश हो गया है। कई देश नष्ट हो गए हैं। यदि यह भयानक राक्षस नहीं होते तो मानव समाज आज बहुत प्रगति कर गया होता। ट्रंप, खामिनी और नेतान्याहू इनको अपने-अपने राष्ट्र का प्रमुख कहना चाहिए या राक्षस इसका निर्णय पाठक स्वयं करें!

स्वागत पर प्रतिक्रिया (11 सितंबर, 1893) – स्वामी विवेकानंद

इसी भाषण में स्वामी विवेकानंद ने और एक विषय रखा। वह उनकी भाषा में इस प्रकार है, ” मुझे अभिमान है कि, मैं ऐसे धर्म से हूं, जिसने विश्व को सहिष्णुता तथा सर्वसमावेशकता का संदेश दिया। हम केवल सर्वसमावेशकता और सहिष्णुता पर विश्वास रखते हैं ऐसा नहीं तो विश्व के प्रत्येक धर्म को सत्य समझ कर हम उसका स्वीकार करते हैं।”

स्वामी विवेकानंद का शिकागो में दिया गया भाषण वैश्विक एकता के शंखनाद की  दिलाता है याद : PM मोदी - Amrit Vichar

विश्व को युद्ध मुक्त करने की भारत की ऐतिहासिक जिम्मेदारी है। हिंदू धर्म की यह ऐतिहासिक जवाबदारी है, ऐसा विवेकानंद का संदेश है। उसके लिए हम सक्षम हैं क्या? यह प्रश्न है। आज भी अनेक मत मतांतरों, जात पात के कीचड़ में फंसा हुआ यह समाज, सार्वत्रिक बंधु भावना के अभाव का यह समाज, ऐसी हमारी स्थिति है। गत सौ वर्षो से इस स्थिति से बाहर निकल कर सबल और समर्थ होने के प्रयास संपूर्ण देश में हो रहे हैं। इसकी सफलता लक्षणीय होते हुए भी इसका प्रभाव संपूर्ण वैश्विक स्थिति पर पड़ेगा ऐसा सामर्थ्य हमें प्राप्त नहीं हुआ है। ” विश्व को युद्ध नही बुद्ध चाहिए”, यह वाक्य अच्छा है, परंतु यदि प्रत्यक्ष में इसे उतारना है तो भौतिक और आध्यात्मिक सामर्थ्य से समाज शक्तिमान होना बहुत आवश्यक है। इन दोनों मोर्चों पर आने वाले समय में हम कितनी प्रगति करेंगे, इस पर विश्व में चलने वाले युद्ध रुकेंगे या नहीं इसका उत्तर अवलंबित है।

–रमेश पतंगे

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Tags: #IranIsraelWar #WorldWar3 #MiddleEastConflict #IranVsIsrael #GlobalPolitics #USIranTension #Geopolitics #BreakingNews #InternationalRelations #WarAnalysis

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