फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स, यूट्यूब, थ्रेड्स, व्हाट्सएप और स्नैपचैट जैसे प्लेटफॉर्म धीरे-धीरे हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा बन गए हैं। यदि सही तरीके से उनका उपयोग किया, तो वे समाज को जोड़ने और आगे बढ़ाने का माध्यम बनेंगे, अन्यथा वे विभाजन और भ्रम के साधन भी बन सकते हैं।
भारत में आज लगभग 35 करोड़ से अधिक लोग सोशल मीडिया का उपयोग कर रहे हैं और यह संख्या निरंतर बढ़ रही है। औसतन एक व्यक्ति प्रतिदिन 2 से 3 घंटे इस आभासी दुनिया में बिताता है। यह केवल समय का व्यय नहीं है, यह वह समय है जिसमें हमारी सोच बनती है, हमारी प्रतिक्रियाएं तय होती हैं और कई बार हमारे निर्णय भी प्रभावित होते हैं। यही कारण है कि सोशल मीडिया अब केवल एक तकनीकी सुविधा नहीं, बल्कि एक सामाजिक शक्ति बन चुका है।
यहीं से एक आवश्यक प्रश्न जन्म लेता है क्या इस शक्ति की कोई जवाबदेही है? यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति को जितना आसान बनाया है, उतना ही अनियंत्रित भी कर दिया है। कोई भी व्यक्ति बिना प्रमाण किसी पर आरोप लगा सकता है, किसी की छवि को क्षति पहुंचा सकता है और यह सब कुछ कुछ ही क्षणों में लाखों लोगों तक पहुंच जाता है।
बाद में सत्य सामने भी आ जाए, तो भी जो नुकसान होना होता है, वह हो चुका होता है। महाराष्ट्र के मुख्य मंत्री देवेंद्र फडणवीस ने जब यह कहा कि सोशल मीडिया पर फैल रही मानहानि और चरित्रहनन की प्रवृत्तियों पर रोक लगाने के लिए पुलिस महानिदेशक के नेतृत्व में एक समिति बनाई जाएगी, तो यह केवल एक प्रशासनिक घोषणा नहीं थी, बल्कि यह मान लेना था कि समस्या अब अनदेखी करने लायक नहीं रहे।

पिछले कुछ वर्षों में यह बहुत सामान्य हो गया है कि किसी के बारे में बिना किसी ठोस आधार के बातें फैला दी जाती हैं। कभी आरोप के रूप में, कभी वीडियो के रूप में, तो कभी किसी कथित ‘सूत्र’ के हवाले से। और यह सब इतनी तेजी से फैलता है कि सच सामने आने तक नुकसान हो चुका होता है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ यह है कि किसी की प्रतिष्ठा को इस तरह दांव पर लगा दिया जाए?
लोकतंत्र में बोलने का अधिकार निस्संदेह आवश्यक है, लेकिन उतना ही आवश्यक यह भी है कि उस अधिकार के साथ जिम्मेदारी जुड़ी रहे। यदि स्वतंत्रता का उपयोग किसी को अपमानित करने या बदनाम करने के लिए होने लगे, तो फिर उस पर विचार करना ही पड़ेगा। मुख्य मंत्री फडणवीस की यह पहल उसी दिशा में एक संकेत है कि अब सोशल मीडिया को पूरी तरह खुला मैदान मानकर नहीं छोड़ा जा सकता, वहां भी कुछ सीमाएं और उत्तरदायित्व तय करने होंगे।
राज्यसभा में मिलिंद देवड़ा ने जो बात उठाई, उन्होंने सीधे-सीधे यह सवाल उठाया कि क्या सोशल मीडिया कम्पनियां केवल मंच भर हैं, या फिर उनकी भी कोई जिम्मेदारी बनती है विशेषतौर पर तब, जब उसका असर बच्चों और किशोरों पर पड़ रहा हो। उन्होंने गाजियाबाद की उस घटना की चर्चा भी की, जिसमें तीन किशोर बहनों ने आत्महत्या कर ली। ऐस सनाचार पढ़ते समय हम अधिकतर आगे बढ़ जाते हैं, लेकिन जब कोई जनप्रतिनिधि उसे सदन में उठाता है, तो लगता है कि यह केवल एक घटना नहीं, बल्कि एक संकेत है-कुछ ठीक नहीं चल रहा है।
ऑनलाइन खेलों की लत, मोबाइल पर लगातार बने रहना, आभासी दुनिया में अपनी पहचान ढूंढना ये सब मिलकर बच्चों के भीतर एक ऐसा दबाव बना रहे हैं, जिसे वे समझ भी नहीं पा रहे और कह भी नहीं पा रहे हैं। मिलिंद देवड़ा ने यह भी कहा कि आज बड़ी संख्या में किशोर ऐसे हैं, जिनमें सोशल मीडिया की लत साफ दिखाई देती है। यह बात कोई आंकड़ा पढ़कर समझने वाली नहीं है, यह हम प्रतिदिन अपने आसपास देख सकते हैं बात करते हुए भी ध्यान फोन पर, पढ़ते हुए भी मन भटका हुआ, और थोड़ी सी तुलना से ही खुद को कमतर अनुभव करना।
पढ़ाई पर असर पड़ रहा है, आत्मविश्वास कमजोर हो रहा है, और एक तरह की बेचैनी भीतर बसती जा रही है। उन्होंने एक सर्वे का हवाला देते हुए कहा कि बड़े शहरों में करीब 33 प्रतिशत बच्चे साइबर उत्पीड़न झेल रहे हैं। यह सोचकर ही असहजता होती है कि जिस आयु में बच्चों को सुरक्षित और सहज अनुभव करना चाहिए, उसी उम्र में वे अदृश्य दबाव और डर के बीच जी रहे हैं। राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो के आंकड़े भी उन्होंने रखे। 2016 में किशोरों से जुड़े हिंसक अपराध 32 प्रतिशत थे, जो 2022 तक बढ़कर लगभग 50 प्रतिशत हो गए।
यह बढ़ोतरी अचानक नहीं होती, इसके पीछे लम्बे समय से चल रहा बदलाव होता है। उन्होंने यह भी बताया कि फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया जैसे देश इस दिशा में कदम उठा चुके हैं, और कुछ अन्य देश भी सोच रहे हैं कि बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग को कैसे सीमित किया जाए। भारत में भी अभिभावकों की सहमति जैसी बातें नियमों में हैं, लेकिन उन्होंने साफ कहा कि केवल कागज पर नियम बना देने से कुछ नहीं बदलेगा, जब तक कम्पनियां खुद अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेंगी।

हाल के वर्षों में डीपफेक जैसी तकनीकों का दुरुपयोग देखा है। 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान अमित शाह और नरेंद्र मोदी से जुड़े नकली वीडियो प्रसारित हुए। यह केवल तकनीकी प्रयोग नहीं था, बल्कि यह इस बात का संकेत था कि आने वाले समय में सत्य और असत्य के बीच अंतर करना कितना कठिन हो सकता है।
अब इस पूरी स्थिति में कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने एक नई जटिलता जोड़ दी है। फरवरी 2026 में आयोजित ‘इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट’ में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट कहा कि यह समय तकनीक के उपयोग की दिशा तय करने का है। एआई अब केवल सुविधा नहीं, बल्कि शक्ति बन चुका है। यदि इसका उपयोग सही दिशा में किया जाए, तो यह मानव जीवन को बेहतर बना सकता है; लेकिन यदि यह अनियंत्रित रहा, तो इसके परिणाम गम्भीर हो सकते हैं।
वैश्विक स्तर पर भी इस समस्या को समझा जा रहा है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा पर चिंता व्यक्त करते हुए सोशल मीडिया उपयोग को सीमित करने की बात कही है। ऑस्ट्रेलिया ने 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्रतिबंध लागू किया है। यूरोप में डिजिटल सर्विसेज एक्ट जैसे कानून प्लेटफॉर्म को उनकी सामग्री के लिए जिम्मेदार बना रहे हैं। भारत में भी सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021 और डिजिटल डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 लागू किए गए हैं, जिनके अंतर्गत आपत्तिजनक सामग्री हटाने और डेटा सुरक्षा सुनिश्चित करने के प्रावधान हैं।
केवल विधि-निर्माण से ही समस्या का समाधान संभव नहीं है। सोशल मीडिया की प्रकृति ही ऐसी है कि वह अंततः समाज के सामूहिक व्यवहार का प्रतिबिंब बन जाती है। यदि हमारे भीतर संयम, विवेक और उत्तरदायित्व का भाव नहीं होगा, तो कोई भी मंच स्वयं संयमित नहीं रह सकता। यह समझना आवश्यक है कि प्रत्येक पोस्ट, प्रत्येक टिप्पणी और प्रत्येक साझा की गई सामग्री मात्र सूचना नहीं होती, वह किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा, मनःस्थिति और जीवन पर प्रत्यक्ष प्रभाव डाल सकती है।
भारतीय चिंतन में वाणी के संयम को सदैव अत्यंत महत्त्व दिया गया है। सत्यं ब्रूयात्, प्रियं ब्रूयात् यह केवल शास्त्रों का महावाक्य नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन को संतुलित रखने का मूल सिद्धांत है। यदि यही दृष्टि हमारे डिजिटल व्यवहार में उतर आए, तो निश्चय ही सोशल मीडिया का स्वरूप अधिक स्वस्थ, संवेदनशील और मानवीय बन सकता है। यह प्रश्न तकनीक का नहीं, मनुष्य का है। सोशल मीडिया और एआई दोनों ही साधन हैं।
– दीपक कुमार द्विवेदी

