यह एक हाइपोथेटिकल लेकिन बहुत चर्चित सवाल है, खासकर हाल के दिनों में जब ईरान ने पर्सियन गल्फ (स्ट्रेट ऑफ होर्मुज) और रेड सी में केबल्स काटने की धमकी दी थी, हालांकि ये धमकियाँ आधिकारिक रूप से पुष्टि नहीं हुई हैं।
समुद्री केबल्स दुनिया के 95-99% अंतरराष्ट्रीय इंटरनेट ट्रैफिक को ले जाते हैं। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और रेड सी में कई महत्वपूर्ण केबल्स (जैसे 2Africa, SEA-ME-WE, FALCON आदि) गुजरते हैं, जो यूरोप-एशिया-अफ्रीका के बीच डेटा ले जाते हैं। अगर ये काट दिए जाएँ तो पूरी दुनिया का इंटरनेट बंद नहीं होगा, लेकिन यूरोप, मध्य पूर्व, भारत, पाकिस्तान, अफ्रीका आदि में स्पीड बहुत गिर जाएगी, लेटेंसी बढ़ेगी, फाइनेंशियल ट्रांजेक्शन, क्लाउड सर्विसेज और वीडियो स्ट्रीमिंग प्रभावित होंगी। ट्रांस-अटलांटिक और ट्रांस-पैसिफिक केबल्स (जो ईरान से दूर हैं) सुरक्षित रहेंगे।

यहाँ दुनिया के मुख्य विकल्प हैं (तुरंत से लेकर लंबे समय तक):
1. ट्रैफिक को अन्य समुद्री केबल्स के जरिए री-रूट करना (सबसे तेज और मुख्य विकल्प)
दुनिया में सैकड़ों केबल्स हैं और रूट्स रिडंडेंट (दोहरे) हैं।
प्रभावित ट्रैफिक को अफ्रीका के चारों ओर (केप ऑफ गुड होप), या अन्य लंबे रूट्स से भेजा जा सकता है।
पहले भी रेड सी में हूती हमलों से केबल कटने पर यही हुआ था — स्पीड घटी लेकिन इंटरनेट चला।
सीमा: भीड़ बढ़ जाएगी, लेटेंसी 50-100 ms बढ़ सकती है।
सैटेलाइट इंटरनेट (Starlink, Kuiper, OneWeb आदि) — सबसे तेज बैकअप
LEO (Low Earth Orbit) सैटेलाइट्स जैसे Starlink, OneWeb, Amazon Kuiper: कम लेटेंसी (20-50 ms), तेज डिप्लॉयमेंट।
MEO/GEO सैटेलाइट्स भी मदद कर सकते हैं।
NATO का HEIST प्रोजेक्ट: खासतौर पर इसी के लिए बनाया गया है। यह सॉफ्टवेयर से केबल कटने का पता लगाकर (1 मीटर एक्यूरेसी) तुरंत क्रिटिकल ट्रैफिक (मिलिट्री, बैंकिंग, गवर्नमेंट) को सैटेलाइट पर स्विच कर देता है। 2025 में टेस्ट हो चुके हैं।
सीमा: क्षमता कम है। एक केबल 200+ टेराबिट्स/सेकंड ले जा सकती है, जबकि एक सैटेलाइट सिर्फ 20-200 Gbps। पूरी दुनिया का ट्रैफिक नहीं संभाल सकता, लेकिन जरूरी सेवाएँ चला सकता है।89aacf

3. स्थलीय (Terrestrial) फाइबर केबल्स
भारत-यूरोप के बीच लैंड-बेस्ड रूट्स (कजाकिस्तान, रूस, चीन, मध्य एशिया से होकर)।
अफ्रीका और मध्य पूर्व में भी बैकअप लैंड लिंक्स हैं।
फायदा: आसानी से मरम्मत, समुद्र से सुरक्षित।633c2b
4. केबल्स की मरम्मत
स्पेशल शिप्स (Cable Repair Ships) 2-4 हफ्ते में केबल जोड़ सकती हैं।
लेकिन युद्ध के समय में शिप्स को खतरा होगा, इसलिए देरी हो सकती है।
5. लंबे समय के विकल्प (भविष्य की तैयारी)
और ज्यादा डाइवर्स रूट्स वाली नई केबल्स बनाना (जैसे Arctic रूट्स या और terrestrial लिंक्स)।
सैटेलाइट क्षमता बढ़ाना (Starlink V3, Kuiper आदि) + लेजर कम्युनिकेशन।
हाई एल्टीट्यूड प्लेटफॉर्म्स (HAPS) या अन्य नई टेक्नोलॉजीज।इंटरनेट पूरी तरह से “बंद” नहीं होगा — दुनिया रिडंडेंसी और सैटेलाइट्स पर निर्भर कर लेगी। लेकिन प्रभावित इलाकों (भारत सहित) में इंटरनेट धीमा, महंगा और अनस्टेबल हो जाएगा। NATO, US, EU जैसे देश पहले से HEIST जैसे प्लान तैयार कर रहे हैं।
भारत की तैयारी समुद्री इंटरनेट केबल कटने के मामले में काफी मजबूत और बहु-स्तरीय है, लेकिन पूरी तरह से चिंता-मुक्त नहीं। भारत दुनिया का सबसे बड़ा इंटरनेट यूजर है और उसकी यूरोप-मध्य पूर्व कनेक्टिविटी रेड सी/होर्मुज चोकपॉइंट पर निर्भर है, इसलिए सरकार, TRAI, DoT, NCIIPC और निजी ऑपरेटर्स (Tata, Reliance, Airtel आदि) ने रिडंडेंसी पर जोर दिया है।
1. ट्रैफिक री-रूटिंग और रिडंडेंट रूट्स (सबसे तुरंत काम आने वाला)
– भारत के पास कई वैकल्पिक समुद्री केबल रूट्स हैं: पूर्व की ओर सिंगापुर-जापान-USA से होकर (ट्रांस-पैसिफिक) और अफ्रीका के चारों ओर (केप ऑफ गुड होप) घुमाकर।
– लैंड-बेस्ड टेर्रेस्ट्रियल फाइबर: मध्य एशिया, रूस, चीन या ईरान-अफगानिस्तान रूट्स (हालांकि कुछ राजनीतिक रूप से संवेदनशील)।
– 2025-26 में नई केबल्स (India-Europe-Xpress, Blue-Raman, 2Africa आदि) क्षमता बढ़ा रही हैं, लेकिन कुछ गल्फ से गुजरती हैं। पुरानी घटनाओं (2025 रेड सी कट) में ट्रैफिक सफलतापूर्वक री-रूट हो गया था— स्पीड घटी लेकिन सर्विस चली।
2.सैटेलाइट इंटरनेट बैकअप (LEO — सबसे महत्वपूर्ण नया विकल्प)
Starlink: 2025 में DoT और IN-SPACe से पूर्ण अनुमति मिल चुकी है। 2026 से कमर्शियल लॉन्च की तैयारी, Jio और Airtel के साथ पार्टनरशिप। भारत में 9+ गेटवे स्टेशन प्लान्ड (मुंबई, नोएडा आदि)। डेटा लोकलाइजेशन और सिक्योरिटी नियमों का पालन अनिवार्य।
OneWeb (Bharti Airtel) और Jio Satellite पहले से सक्रिय।
– ये LEO सैटेलाइट्स कम लेटेंसी (20-50 ms) देते हैं और रिमोट/क्रिटिकल एरिया में बैकअप के रूप में इस्तेमाल होंगे। हालांकि पूरी क्षमता (टेराबिट्स) नहीं संभाल सकते, लेकिन बैंकिंग, गवर्नमेंट, AI/क्लाउड के जरूरी ट्रैफिक को चला सकते हैं।– ISRO भी अपना LEO सैटेलाइट सिस्टम विकसित कर रहा है।
3. नीतिगत और संस्थागत तैयारी

NCIIPC (National Critical Information Infrastructure Protection Centre): समुद्री केबल्स को क्रिटिकल इंफ्रास्ट्रक्चर घोषित करने की सिफारिशें। फॉल्ट डिटेक्शन, रीयल-टाइम मॉनिटरिंग और प्रोटेक्शन फ्रेमवर्क।
TRAI की सिफारिशें: भारतीय कंपनियों को अपने पानी में केबल का ओनरशिप दिखाना जरूरी। भारतीय फ्लैग वाली केबल रिपेयर शिप्स के लिए फाइनेंशियल मॉडल। रूट डाइवर्सिटी, लो-रिस्क एरिया में केबल बिछाना, रिडंडेंट रूट्स।
QUAD और इंटरनेशनल कोऑपरेशन: ऑस्ट्रेलिया-भारत साइबर पार्टनरशिप से केबल सप्लाई चेन और प्रोटेक्शन पर काम। QUAD के तहत जॉइंट पैट्रोलिंग और केबल सिक्योरिटी। IDSA जैसे थिंक टैंक्स रीजनल फ्रेमवर्क बनाने की सलाह दे रहे हैं।
नेशनल सबमरीन केबल सिक्योरिटी फ्रेमवर्क: नेवी, कोस्ट गार्ड और प्राइवेट ऑपरेटर्स के साथ। EEZ में केबल एक्टिविटी रेगुलेट करने के लिए कानून मजबूत करने की बात।
4. अन्य तैयारी

डेटा सेंटर और लोकलाइजेशन: गल्फ में भारतीय क्लाउड/AI इंफ्रा बढ़ रहा है, लेकिन डोमेस्टिक क्षमता भी बढ़ रही है ताकि विदेशी निर्भरता कम हो।
रिपेयर कैपेबिलिटी: स्पेशल शिप्स और इंटरनेशनल कोऑपरेशन से 2-4 हफ्ते में रिपेयर।
पिछली घटनाओं से सीख: 2025 रेड सी कट में भारत में लेटेंसी बढ़ी, लेकिन बड़ा ब्रेकडाउन नहीं हुआ— इससे रिडंडेंसी प्लान और मजबूत हुए।
कमजोरियां अभी भी हैं, केवल 14-17 CLS (Cable Landing Stations) vs दुनिया के 1600+। गल्फ-बेस्ड डेटा सेंटर पर निर्भरता। अगर कई केबल्स एक साथ कटें तो स्पीड/लेटेंसी बहुत प्रभावित होगी (AI, फिनटेक, क्लाउड पर असर)। सैटेलाइट पूरी क्षमता नहीं ले पाएगा।
भारत “रिडंडेंसी + सैटेलाइट + इंटरनेशनल कोऑपरेशन” की रणनीति पर चल रहा है। Starlink जैसे ऑप्शन्स 2026 से बड़े पैमाने पर मदद करेंगे। सरकार Digital India और India AI Mission के तहत इसे प्राथमिकता दे रही है। पूरी दुनिया की तरह भारत भी पूरी तरह “इम्यून” नहीं, लेकिन इंटरनेट बंद नहीं होगा,सिर्फ धीमा और महंगा हो सकता है।

