हिंदी विवेक
  • Login
  • परिचय
  • संपादकीय
  • पूर्वांक
  • ग्रंथ
  • पुस्तक
  • संघ
  • देश-विदेश
  • पर्यावरण
  • संपर्क
  • पंजीकरण
No Result
View All Result
  • परिचय
  • संपादकीय
  • पूर्वांक
  • ग्रंथ
  • पुस्तक
  • संघ
  • देश-विदेश
  • पर्यावरण
  • संपर्क
  • पंजीकरण
No Result
View All Result
हिंदी विवेक
No Result
View All Result
संघ के पंच परिवर्तन अभियान से होगा ‘सज्जन शक्ति जागरण’

संघ के पंच परिवर्तन अभियान से होगा ‘सज्जन शक्ति जागरण’

संघ का पंच परिवर्तन यानी भारत के भारतपन का संकल्प

by हिंदी विवेक
in संघ
0

भारतीय दृष्टि के अनुसार एक ही चैतन्य विभिन्न रूपों में अभिव्यक्त हुआ है। इसलिए भारत विविधता को भेद के रूप में नहीं देखता, बल्कि विविध रूपों के भीतर विद्यमान एकता को अनुभव करता है। यहाँ प्रत्येक व्यक्ति-स्त्री और पुरुष-में सुप्त दिव्यत्व (ईशत्व) विद्यमान है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का पंच परिवर्तन राष्ट्र के इस स्थाई भाव को बनाने और बढ़ाने का संकल्प है.
— डॉ. मनमोहन वैद्य, सदस्य, अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल, रा.स्व.संघ

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर संघ द्वारा समाज से व्यापक संपर्क के लिए अनेक कार्यक्रम प्रारंभ किए गए हैं। इन कार्यक्रमों में समाज-परिवर्तन के उद्देश्य से पाँच विषयों को लेकर समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुँच बनाकर उनकी सक्रिय सहभागिता बढ़ाना एक महत्वपूर्ण प्रयास है। इस अभियान को ‘सज्जन शक्ति जागरण’ कहा गया है। इसके अंतर्गत पंच-परिवर्तन के पाँच विषय निर्धारित किए गए हैं— कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समरसता, लोक (नागरिक) कर्तव्य और

स्वदेशी जीवन-शैली।
स्वदेशी जीवन-शैली के संदर्भ में सामान्यतः जिन बातों पर जोर दिया जाता है, उनमें बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उत्पादों के स्थान पर स्वदेशी उत्पादकों द्वारा निर्मित वस्तुओं का उपयोग, मातृभाषा में संवाद का अभ्यास, पर्व-त्योहारों पर पारंपरिक भारतीय वेश-भूषा धारण करना, भारतीय पारंपरिक भोजन को अपनाना, अपने इष्टदेवता का भजन, भवन के साज-सज्जा में भारतीयता का प्रभाव तथा परिवार के साथ तीर्थों और ऐतिहासिक स्थलों का भ्रमण शामिल है।

स्व का बोध से पर्यावरण संरक्षण तक: भारत निर्माण की दिशा - Newsexpres

परंतु स्वदेशी जीवन-शैली का एक गहरा और व्यापक अर्थ भी है। इसे समझने के लिए सबसे पहले ‘स्वदेशी’ शब्द में निहित ‘स्व’ को समझना आवश्यक है। भारत के इस ‘स्व’ के तीन ऐसे मूल पहलू हैं, जिन्होंने भारत को एक विशिष्ट पहचान और व्यक्तित्व प्रदान किया है।
जब ये तीनों पहलू हमारे व्यक्तिगत, पारिवारिक, व्यावसायिक, सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन में स्वाभाविक रूप से अभिव्यक्त होते हैं, तभी उस जीवन-पद्धति को सही अर्थों में ‘स्वदेशी जीवन-शैली’ कहा जा सकता है। तो प्रश्न यह है कि भारत के ‘स्व’ के वे तीन प्रमुख पहलू कौन-से हैं?

पहला पहलू : अध्यात्म
भारत का पहला और मूल ‘स्व’ उसका अध्यात्म है। भारतीय जीवन-दृष्टि अध्यात्म पर आधारित होने के कारण एकात्म और सर्वांगीण है। भारत संपूर्ण सृष्टि को परस्पर जुड़ा हुआ मानता है, इसी अनुभूति से ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का विचार और व्यवहार विकसित हुआ है।

भारतीय दृष्टि के अनुसार एक ही चैतन्य विभिन्न रूपों में अभिव्यक्त हुआ है। इसलिए भारत विविधता को भेद के रूप में नहीं देखता, बल्कि विविध रूपों के भीतर विद्यमान एकता को अनुभव करता है और विविधता का उत्सव मनाता है। यहाँ प्रत्येक व्यक्ति—स्त्री और पुरुष— में सुप्त दिव्यत्व (ईशत्व) विद्यमान है। मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य अपने अंतस् और बाह्य प्रकृति का संयमपूर्वक नियमन करते हुए इस दिव्यत्व को प्रकट करना और मोक्ष प्राप्त करना है।

इस चराचर सृष्टि में व्याप्त चेतना के साथ एकाकार हो जाना, उसी में विलीन हो जाना ही मोक्ष है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग और राजयोग— इनमें से कोई एक, दो, तीन या चारों का साधन किया जा सकता है। प्रत्येक व्यक्ति की प्रकृति, रुचि और संस्कार के अनुसार इनका (सम्मिश्रण) संयोजन भिन्न-भिन्न होगा। इसी व्यक्तिगत

साधना-पद्धति को उपासना (रिलीजन) कहा गया है।
भारत में उपासना का मार्ग पूर्णतः व्यक्तिगत है। उसे चुनने का प्रत्येक व्यक्ति को स्वातंत्र्य है। भारत में उपासना उतनी ही व्यक्तिगत मानी गई है, जितनी किसी की अपनी निजी वस्तु। यहाँ आध्यात्मिक लोकतंत्र की परंपरा रही है। यह उपासना स्वयं धर्म नहीं है। उपासना धर्म तक पहुँचने का साधन है, धर्म का पर्याय नहीं।

राज्य और राष्ट्र की भारतीय अवधारणा
पश्चिमी देशों में राष्ट्र की संकल्पना राज्य-आधारित रही है। इसके विपरीत भारत में समाज ही राष्ट्र है, राज्य नहीं। भारत में राष्ट्र ने अपनी सुविधा और व्यवस्था के लिए राज्य की रचना की है। इसी कारण स्वतंत्रता के बाद जब संविधान का निर्माण हुआ, तो उसकी भूमिका ही ‘हम भारत के लोग’ से आरंभ होती है। समाज के सभी वर्गों का जीवन सुव्यवस्थित और सुचारू रूप से चले, इसके लिए हम भारत के लोगों ने मिलकर कुछ नियम बनाए हैं।

इन नियमों का पालन करना हमारा नैतिक दायित्व और प्रतिबद्धता है। इसके लिए हर बात में राज्य या सरकारी एजेंसियों पर निर्भर रहना आवश्यक नहीं होना चाहिए। जो नियम हमारे समाज के लिए हमने स्वयं बनाए हैं, उनका पालन कर्तव्यबोध से स्वयं करना— यही स्वदेशी जीवन-शैली का महत्वपूर्ण स्वरूप है। अपने ही समाज द्वारा निर्मित राज्य पर हर छोटे-बड़े विषय में निर्भर रहना स्वदेशी भाव नहीं है।

दूसरा पहलू : समाज-आधारित राष्ट्र
भारत का राष्ट्र कभी भी राज्य-आधारित नहीं रहा। ‘वेलफेयर स्टेट’ की अवधारणा पश्चिमी है, भारतीय नहीं। अपने प्रसिद्ध निबंध ‘स्वदेशी समाज’ में गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर लिखते हैं कि परंपरागत भारत में न्याय, आंतरिक एवं बाह्य सुरक्षा तथा विदेश नीति जैसे विषय ही राज्य के अधीन होते थे। शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग, व्यापार, कला, संगीत, नाटक, यात्रा, तीर्थ-व्यवस्था आदि सभी जीवनोपयोगी व्यवस्थाएँ समाज द्वारा संचालित होती थीं। इन कार्यों के लिए धन राज्य से नहीं आता था; समाज स्वयं वहन करता था। रवींद्रनाथ ठाकुर के शब्दों में— ‘जो समाज अपनी आवश्यकताओं के लिए राज्य पर न्यूनतम निर्भर रहता है, वही स्वदेशी समाज है।’

तीसरा पहलू : जीवन की पूर्णता का दृष्टिकोण
भारतीय जीवन-दर्शन में भौतिक समृद्धि (अभ्युदय) और आध्यात्मिक उन्नति (मोक्ष)— दोनों को साथ-साथ साधना ही जीवन की पूर्णता मानी गई है। केवल भौतिक सुख या केवल त्याग— इनमें से किसी एक को ही साधना अपूर्णता मानी गई है। इसी भाव को धर्म की एक प्रसिद्ध परिभाषा में व्यक्त किया गया है— ‘यतो अभ्युदय निःश्रेयस सिद्धिः स धर्मः’ अर्थात् जो भौतिक उन्नति और आत्मिक कल्याण— दोनों की सिद्धि कराए, वही धर्म है।

समरसता : भारत के ‘स्व’ का स्वाभाविक स्वरूप
भारतीय आध्यात्मिक चिंतन यह मानता है कि एक ही चैतन्य सम्पूर्ण चराचर सृष्टि में व्याप्त है। इसलिए समाज में कोई भी कार्य करने वाला मेरा भाई या बहन हो— उसमें वही चैतन्य विद्यमान है जो मुझमें है। यदि ऐसा है, तो फिर जाति के आधार पर ऊँच-नीच की भावना कहाँ से आई? यह भारत के ‘स्व’ की अभिव्यक्ति नहीं है। जीविका के लिए समाज में अनेक प्रकार के कार्य करने पड़ते हैं और हर कार्य समाज के लिए आवश्यक है। कोई कार्य छोटा या बड़ा नहीं होता। पैसा कमाने के साधन अलग-अलग हो सकते हैं, परंतु मनुष्य का मूल्य उसके कर्म या व्यवसाय से तय नहीं किया जा सकता। ऊँच-नीच की यह मानसिकता हमारी नहीं है; यह भारत की परंपरा का हिस्सा नहीं है।

हमारा मूल भाव है- ‘हिंदवा: सहोदराः सर्वे’ यानी सभी हिंदू भारत माता की संतान हैं, सभी समान हैं। इसलिए स्वदेशी जीवन-शैली का अर्थ है— सभी प्रकार के भेद भूलकर समाज में अपनेपन, आत्मीयता और समरसता का व्यवहार करना। हमारे परिवार, मित्र-मंडली और सामाजिक जीवन में सभी जातियों, वर्गों और सभी प्रकार के व्यवसाय करने वाले लोगों का सहज और स्वाभाविक समावेश होना चाहिए। यही सच्ची स्वदेशी जीवन-शैली है।

संत परंपरा में समरसता के उदाहरण
जगद्गुरु आदि शंकराचार्य के जीवन की एक प्रसिद्ध घटना है। काशी में गंगा स्नान के बाद वे घाट से ऊपर चढ़ रहे थे। सामने से एक चांडाल, जिसे उस समय अस्पृश्य माना जाता था, नदी के घाट की ओर उतर रहा था। शंकराचार्य ने उससे कहा, ‘अपसर, अपसर’ (दूर हटो)। चांडाल ने प्रश्न किया— ‘आप किसे हटने के लिए कह रहे हैं?’ मेरे शरीर को? तो मेरा और आपका शरीर एक ही पंचमहाभूतों से बना है। या मेरे भीतर स्थित आत्मा को? तो आपके और मेरे भीतर वही एक आत्मा विद्यमान है। यह सुनते ही शंकराचार्य समझ गए कि यह कोई सामान्य व्यक्ति नहीं, बल्कि साक्षात् भगवान विश्वनाथ हैं। उन्होंने तुरंत उस चांडाल को दण्डवत प्रणाम किया। यह घटना भारतीय अध्यात्म की एकात्म दृष्टि का सजीव उदाहरण है।

इसी प्रकार दक्षिण भारत के महान संत श्री रामानुजाचार्य के जीवन में भी एक प्रेरक प्रसंग मिलता है। वृद्धावस्था में वे प्रतिदिन कावेरी नदी में स्नान करने जाते समय दो ब्राह्मण शिष्यों के कंधों का सहारा लेकर नदी में उतरते थे। लेकिन स्नान के बाद लौटते समय वे मल्लार जाति के— तत्कालीन समाज में अस्पृश्य माने जाने वाले—एक बंधु का हाथ पकड़कर ऊपर चढ़ते थे। जब एक शिष्य ने इसका कारण पूछा, तो रामानुजाचार्य ने उत्तर दिया— ”नदी में स्नान करके मैं अपने शरीर को शुद्ध करता हूँ, और लौटते समय इन बंधुओं के सहारे चलकर अपने मन को शुद्ध करता हूँ।”
ऐसे अनेक उदाहरण हमारे इतिहास में हैं। उनका स्मरण करते हुए हमें अपने जीवन की स्वदेशी रचना करनी चाहिए, सभी के प्रति समान आत्मीयता और समरस व्यवहार अपनाना चाहिए।

पर्यावरण और भारत का ‘स्व’ भाव
हमारी परंपरा कहती है— ‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।’ यह पृथ्वी मेरी माता है और मैं इसका पुत्र हूँ। यही भारत का ‘स्व’ भाव है। परंतु पश्चिमी विकास मॉडल की अंधी नकल करते हुए हमने पर्यावरणीय असंतुलन का गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। यह सृष्टि हमारी माता है। इसलिए इसका उपयोग (दोहन) आवश्यकता पूर्ति के लिए होना चाहिए, शोषण के लिए नहीं।

पर्यावरण संरक्षण

एक प्रतीकात्मक कथा
एक बार चुनाव की घोषणा हुई। चार उम्मीदवार मैदान में उतरे— जल-प्रदूषण, वायु-प्रदूषण, भू-प्रदूषण और अन्न-प्रदूषण। चारों ने चुनाव-चिह्न के रूप में ‘मनुष्य’ की माँग की। चुनाव अधिकारी ने कहा— ”यह चिह्न किसी एक को ही मिलेगा। जो सबसे ठोस कारण बताए कि उसे ही यह चिह्न क्यों मिलना चाहिए।” एक-एक कर सभी उम्मीदवारों ने एक ही बात कही— ”मनुष्य ने ही हमें जन्म दिया है। मनुष्य ने ही हमें पाला-पोसा है। आज हम इतने बड़े हो गए हैं कि चुनाव लड़ने योग्य बन गए हैं, यह सब मनुष्य की देन है।” यह कथा हमें सोचने पर विवश करती है कि यदि हमने समय रहते अपना व्यवहार नहीं बदला, तो हमारी ही बनाई समस्याएँ हमारे सामने खड़ी हो जाएँगी।

The Theosophical Society Telugu Federation – Theososphy ...

इस कथा के माध्यम से उस छात्र ने अत्यंत सटीक और तीखा व्यंग्य प्रस्तुत किया है। जिन समस्याओं का प्रतीकात्मक उल्लेख किया गया है, उन्हें जन्म देने वाला ‘मनुष्य’ कोई पिछड़ा, निर्धन या अविकसित समाज नहीं है। वास्तव में यह तथाकथित विकसित, समृद्ध और प्रगत कहलाने वाला मानव समूह ही है, जिसके पिछले लगभग पाँच सौ वर्ष के तथाकथित विकास-मॉडल ने आज जल, वायु, भूमि और अन्न जैसे जीवनाधारों को संकट में डाल दिया है। इसके विपरीत, भारत का राष्ट्र-जीवन कम से कम बीस हजार वर्ष से भी अधिक पुराना रहा है— और वह भी प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखते हुए। इसलिए पर्यावरण की रक्षा और उसके संतुलन का संरक्षण करना हमारी स्वदेशी जीवन-शैली का अविभाज्य अंग है।

इसका अर्थ है, केवल विचार नहीं, बल्कि नित्य व्यवहार भी आवश्यक है— जल का अनावश्यक दुरुपयोग न करना, सिंगल-यूज प्लास्टिक से बचना, अधिकाधिक वृक्ष लगाना तथा उनका संरक्षण और संवर्धन करना— ये सभी स्वदेशी जीवन-शैली के सहज आचरण हैं।

‘मैं’ से ‘हम’ की यात्रा: कुटुंब का महत्व
पश्चिमी चिंतन व्यक्ति को अधिक व्यक्तिवादी और भौतिकतावादी बनाता है। इसके विपरीत भारतीय चिंतन मानता है कि समाज की सबसे छोटी इकाई व्यक्ति नहीं, बल्कि कुटुंब है। कुटुंब की रचना के लिए व्यक्ति के ‘मैं’ को ‘हम’ में विलीन होना पड़ता है। यही भारत की आध्यात्मिक यात्रा का आरंभ है— ‘मैं’ से ‘हम’ की यात्रा। यह यात्रा कुटुंब से प्रारंभ होकर क्रमशः परिजन, ग्राम या नगर, राज्य, राष्ट्र, संपूर्ण मानवता और अंततः सम्पूर्ण चराचर सृष्टि तक विस्तार पाती है। इस विस्तारित ‘हम’ में विद्यमान उस परम चैतन्य के साथ एकाकार होना ही मानव जीवन का अंतिम उद्देश्य है, जिसे हम मोक्ष कहते हैं।

Portrait of happy indian family in traditional wear sitting on sofa indoor | Premium Photo

इसी क्रम को भारतीय दर्शन में— व्यष्टि, समष्टि, सृष्टि और परमेष्टि के सोपान कहा गया है। इस दीर्घ आध्यात्मिक यात्रा का प्रारंभ-बिंदु कुटुंब है। इसलिए चार आश्रमों में गृहस्थाश्रम को विशेष महत्व दिया गया है।

भारत का वैश्विक दायित्व और कुटुंब की भूमिका
आज तकनीक के कारण दुनिया सिमट गई है। विभिन्न उपासनाएँ, भाषाएँ, नस्लीय विविधताएँ और सीमित संसाधनों के बीच सम्पूर्ण मानवता कैसे समृद्ध, सामंजस्यपूर्ण और शांतिपूर्ण जीवन जी सकती है— इसका तत्वज्ञान भारत के पास है। यह ज्ञान भारत के अध्यात्म-आधारित जीवन-चिंतन से उपजा है और भारत के पास इसका दीर्घ ऐतिहासिक अनुभव भी है। इसलिए मानव कल्याण के लिए यह आवश्यक है कि भारत एक संपन्न, समर्थ और आत्मविश्वासी राष्ट्र के रूप में खड़ा रहे— और भारत अपना भारतपन बनाए रखे।
भारत का विचार महान है, परंतु यदि उस विचार को जीने वाला समाज नहीं होगा, तो यह ज्ञान केवल पुस्तकों और विद्वानों की चर्चाओं तक सीमित रह जाएगा। भारत के विचार को आचरण में उतारने वाला समाज कुटुंब व्यवस्था से ही तैयार होगा।

चामुंडा स्वामी जी | आध्यात्मिक उपचार केंद्र, न्यूयॉर्क

कुटुंब में जन्म लेने वाले बालक-बालिकाओं को यह वैचारिक और सांस्कृतिक धरोहर संवाद के माध्यम से देना— यह कुटुंब की प्राथमिक जिम्मेदारी है। विद्यालय और समाज की भूमिका इसके बाद आती है। कुटुंब की निरंतरता के लिए नई पीढ़ी का पर्याप्त होना भी आवश्यक है। सामान्यतः प्रति परिवार 2.1 अर्थात तीन संतानों से कुटुंब की निरंतरता बनी रहती है। यदि कुटुंब के सभी सदस्य साप्ताहिक रूप से एकत्र बैठें, संवाद करें, तो सामाजिक, वैचारिक और सांस्कृतिक निरंतरता सहज रूप से बनी रहेगी।
इसी आधार पर भारत अपनी वैश्विक भूमिका निभाने के लिए सक्षम, सक्रिय और समर्थ रहेगा। यह सब भारत के ‘स्व’ का प्रकटीकरण है और स्वदेशी जीवन-शैली का ही अभिन्न अंग है। यह दायित्व राष्ट्र अर्थात समाज का है। राज्य इसमें सहायक हो सकता है, पर मूल उत्तरदायित्व समाज का है और उस समाज को गढ़ने में कुटुंब की भूमिका सबसे बुनियादी और निर्णायक है। इसी कारण कुटुंब प्रबोधन का विशेष और अनिवार्य महत्व है।

हाइलाइटर 1
भारतीय जीवन-दर्शन में भौतिक समृद्धि (अभ्युदय) और आध्यात्मिक उन्नति (मोक्ष)— दोनों को साथ-साथ साधना ही जीवन की पूर्णता मानी गई है। केवल भौतिक सुख या केवल त्याग— इनमें से किसी एक को ही साधना अपूर्णता मानी गई है। इसी भाव को धर्म की एक प्रसिद्ध परिभाषा में व्यक्त किया गया है— ‘यतो अभ्युदय निःश्रेयस सिद्धिः स धर्मः’ अर्थात् जो भौतिक उन्नति और आत्मिक कल्याण— दोनों की सिद्धि कराए, वही धर्म है।
हाइलाइटर 2
भारत का विचार महान है, परंतु यदि उस विचार को जीने वाला समाज नहीं होगा, तो यह ज्ञान केवल पुस्तकों और विद्वानों की चर्चाओं तक सीमित रह जाएगा। भारत के विचार को आचरण में उतारने वाला समाज कुटुंब व्यवस्था से ही तैयार होगा। कुटुंब में जन्म लेने वाले बालक-बालिकाओं को यह वैचारिक और सांस्कृतिक धरोहर संवाद के माध्यम से देना— यह कुटुंब की प्राथमिक जिम्मेदारी है। विद्यालय और समाज की भूमिका इसके बाद आती है।

-विचार विनिमय न्यास

Share this:

  • Share on X (Opens in new window) X
  • Share on Facebook (Opens in new window) Facebook
  • Share on LinkedIn (Opens in new window) LinkedIn
  • Share on Telegram (Opens in new window) Telegram
  • Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp
Tags: #PanchParivartan #TransformationJourney #ChangeMakers #Empowerment #SocialChange #CommunityDevelopment #Inspiration #PositiveImpact #SustainableGrowth #CollectiveAction

हिंदी विवेक

Next Post
hanuman jaynti

हनुमान जयंती विशेष

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

हिंदी विवेक पंजीयन : यहां आप हिंदी विवेक पत्रिका का पंजीयन शुल्क ऑनलाइन अदा कर सकते हैं..

Facebook Youtube Instagram

समाचार

  • मुख्य खबरे
  • मुख्य खबरे
  • राष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • क्राइम

लोकसभा चुनाव

  • मुख्य खबरे
  • मुख्य खबरे
  • राष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • क्राइम

लाइफ स्टाइल

  • मुख्य खबरे
  • मुख्य खबरे
  • राष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • क्राइम

ज्योतिष

  • मुख्य खबरे
  • मुख्य खबरे
  • राष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • क्राइम

Copyright 2024, hindivivek.com

Facebook X-twitter Instagram Youtube Whatsapp
  • परिचय
  • संपादकीय
  • पूर्वाक
  • देश-विदेश
  • पर्यावरण
  • संपर्क
  • पंजीकरण
  • Privacy Policy
  • Terms and Conditions
  • Disclaimer
  • Shipping Policy
  • Refund and Cancellation Policy

copyright @ hindivivek.org by Hindustan Prakashan Sanstha

Welcome Back!

Login to your account below

Forgotten Password?

Retrieve your password

Please enter your username or email address to reset your password.

Log In

Add New Playlist

No Result
View All Result
  • परिचय
  • संपादकीय
  • पूर्वांक
  • ग्रंथ
  • पुस्तक
  • संघ
  • देश-विदेश
  • पर्यावरण
  • संपर्क
  • पंजीकरण

© 2024, Vivek Samuh - All Rights Reserved

0