जब स्वाधीनता ने स्वयं को मानवीय स्वरूप में प्रकट करना चाहा, जब समता और समन्वय ने ‘योद्धा’ के रूप में खुद को ढालने की आरजू की, जब ‘वीरता और वैराग्य’ ने संयुक्त रूप से प्रस्फुटित होने का संकल्प लिया तब 09 मई 1540 को कुंभलगढ़ के किले में महाराणा प्रताप नामक आलोक का उदय हुआ। पराधीनता के घोर तिमिर में ‘भुवन भास्कर’ बन उदित होने वाला यह कालजई किरदार आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना आज से 500 वर्ष पूर्व था।
संभव है कि उनकी जयंती के अवसर पर फिर दुराग्रह और तुष्टीकरण की विष्ठा के आहार पर पल रहे कुछ बुद्धिजीवी मानवता के ‘प्रताप’ को लघुतर साबित करने का कुप्रयास करेंगे। तो मुल्क के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जैसे प्रखर राष्ट्रवादी अकबर नहीं महाराणा थे महान, कह कर उन छद्म कुपढ़ों का प्रतिकार करेंगे। किंतु यह दोनों बातें इस बहस को जन्म अवश्य देती हैं कि आखिर महाराणा में क्या महानता थी। या महाराणा और अकबर में कौन महान था।
वैसे महानता के अपने-अपने मापदंड हो सकते हैं। जैसे मेरा मानना है कि महान बनने के लिये किसी भी व्यक्ति अथवा शासक में मानवता का होना बुनियादी शर्त है। वह जितना अधिक मानवीय मूल्यों और जन पक्षधरता के निकट होगा, महानता से समीपता बढ़ती चली जायेगी। मानवीय मूल्य और जन पक्षधरता वाले निणर्यों की बुनियाद पर मैं महाराणा प्रताप को समकालीन इतिहास का महान शासक मानता हूं।
अब प्रश्न है कि आखिर महाराणा में महानता थी क्या?
महाराणा की महानता को जानने के लिये इंटरनेट की तरंगों पर मचल रही 21वीं सदी को थोड़ा पीछे मुड़ कर उस कालखंड की तरफ देखना पड़ेगा जब भारत का स्वर्ण काल बीत चुका था। इंद्रप्रस्थ का सिंहासन बन चुका था तख्त-ए-दिल्ली। चंगेज खान के फरजंद (उत्तराधिकारी) लूटने लगे थे इस देव भूमि को। जिन्हें कभी सूर्य और चंद्र के वशंज होने का अभिमान था वो क्षत्रिय, अब कुरनीस करने लगे थे जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर के दरबार में।
मुगलों के परचम तले भारतवर्ष के बड़े-बड़े राज्य अपना अस्तित्व खो रहे थे। जो कल तक राजा थे, वह आज मनसबदार बन कर खुद को महफूज समझ रहे थे। कहीं से बगावत की कोई आवाज नहीं आ रही थी। ‘सत्य’ ने ‘सत्ता’ के सम्मुख समर्पण कर दिया था। कहते हैं कि बहती धारा में कोई पेड़ उग नहीं पाता है। लेकिन कुछ हठीले दरख्त ऐसे भी होते हैं जिन्हे समय का सैलाब भी बहा नहीं पाता है। वह अविचल, अडिग खड़े रहते हैं प्रलयंकारी तूफानों में। धारा का तेज बहाव, समय की तपिश, तूफानों के रक्ताभ थपेड़े उनका बाल भी बांका नहीं कर पाते हैं।
उस वक्त, कुछ ऐसे ही मतवाले दरख्तों से लहलहा रही थी वीर मेवाड़ की धरती, जब अपने साम्राज्यवादी मंसूबों की कुत्सित पिपासा को मिटाने के लिये अकबर तेजी से मेवाड़ की ओर आगे बढ़ रहा था। और मेवाड़ मचल रहा था स्वाधीनता के अमर गायक महाराणा प्रताप की तान पर। वो महाराणा, जिसने वीरता के प्रतिमानों को ही बदल दिया। वो, महाराणा जिसने मृत्यु की नाद पर जीवन को थिरकना सिखाया। वो महाराणा, जिसकी रगों में महारानी पद्मनी का तेज, राणा सांगा का पराक्रम, माता पन्ना धाय का त्याग, संस्कार बन कर दौड़ रहा था। भला उसे अकबर नाम का अंधड़ क्या परेशान करता। लालच के पृष्ठ पर अपमान के अक्षरों से लिखे तमाम संधि प्रस्तावों पर स्वाभिमान की स्याही उड़ेलता रहा महाराणा। लिहाजा सज गई हल्दीघाटी। शायद हल्दीघाटी के हिस्से में भी वीरों की तपस्थली होने का गौरव आना था।

हल्दीघाटी की जय-पराजय तो अलग विषय है लेकिन अकबर को इस युद्ध के बाद यह ज्ञात हो गया कि आगे का मार्ग आसान नहीं है। उसके अविजित होने का दंभ हिल गया। सम्पूर्ण भारतवर्ष ने महाराणा में एक नई उम्मीद देखनी प्रारम्भ कर दी। अब प्रताप का संघर्ष हर उस व्यक्ति और समाज के लिये प्रेरणा बन चुका था, जो अपने अस्तित्व की रक्षा को अपना धर्म समझता था।
हल्दीघाटी मात्र एक युद्धभूमि नहीं थी, वह चेतना की कसौटी थी। वहां दो सेनाएं नहीं भिड़ीं, वहां दो दृष्टियों टकराईं… एक ओर विस्तार की भूख, दूसरी ओर अस्तित्व की रक्षा।
जब कोई महाशक्ति किसी देश की सांसें सैन्य/आर्थिक घेराबंदी से गिनने लगती है, जब वियतनाम, बलोचिस्तान और वेनेजुएला जैसी धरती अपने ही संसाधनों के बीच घुटन महसूस करती है, तब यह स्पष्ट हो जाता है कि हल्दीघाटी कोई स्थान नहीं थी, वह हर युग की एक स्थिति है। संघर्ष का रंग बदला है, आत्मा की परीक्षा वही है।
यह विडंबना ही है कि जन सामान्य और इतिहासकार, महज हल्दीघाटी के युद्ध तक ही सीमित कर देते हैं प्रताप को। जबकि सच तो यह है कि महाराणा अपने कालखंड के सबसे बड़े समाज सुधारक थे। अब देखिये न, जातीय जड़ता में जकड़े हुये मध्यकालीन युग में प्रताप ने अपनी सेना में अछूत समझे जाने वाले दलित धांगर बिरादरी के लोगों को न केवल शामिल किया था बल्कि उन्हें सेना की अगली कतार में चलने का गौरव भी प्रदान किया। यह किसी भी वंचित समुदाय को योद्धा बनाने की युगांतकारी पहल थी।

राणा प्रताप ने बाल्यकाल से ही भीलों को हमेशा सम्मान की दृष्टि से देखा और तात्कालीन समाज में व्याप्त अनेक जातीय शिष्टाचार को दरकिनार कर उनके साथ एक पंगत में बैठ भोजन करते थे राणा। यह स्वामी भक्त भीलों के शौर्य और राणा के समतामूलक विचारों का ही परिणाम है कि आज भी मेवाड़ राजवंश के प्रतीक चिह्न पर एक ओर क्षत्रिय खड़ा है तो दूसरी ओर भील। यही नहीं, अनेक अवरोधों के बावजूद सामाजिक समरसता में एक कदम आगे बढ़ते हुये अफगान पठान हकीम खां सूर के दल को अपने हरावल दस्ते की कमान सौंपी। भील, धांगर समेत अन्य वंचित समुदाय उनके लिए एक ही आग के अंगार थे।
जहां योग्यता थी, वहां भेदभाव की दीवार अपने आप गिर जाती थी। आज, जब समाज को फिर से PDA रूपी खांचों बांटने की कोशिशें तेज हैं, प्रताप की यह दृष्टि मरहम की तरह उतरती है।
महाराणा प्रताप प्रजा के हृदय पर शासन करने वाले शासक थे। उनकी एक आज्ञा हुई और विजयी सेना ने देखा कि उसकी विजय व्यर्थ है। चित्तौड़ भस्म हो गया, खेत उजड़ गये, कुएं भर दिये गये और ग्राम के लोग जंगल एवं पर्वतों में अपने समस्त पशु एवं सामग्री के साथ अदृश्य हो गये। दशकों तक मेवाड़ में अन्न का दाना नहीं उपजा। पूरा मेवाड़ युद्ध का मैदान बना हुआ था। सब तरफ भुखमरी और मार-काट थी, ऐसे में सब साथ छोड़ जाते हैं लेकिन मेवाड़ ने प्रताप का साथ कभी नहीं छोड़ा। मेवाड़ की जनता प्रताप के पीछे चट्टान की तरह खड़ी रही।
कभी कोई शिकवा नहीं किया। ऐसी स्वामीभक्ति और प्रतिबद्धता सिर्फ प्रताप जैसे अद्वितीय व्यक्तित्व का स्वामी ही कमा सकता है। निष्ठा का यह स्तर, किसी भी कालखंड के शासक की जन स्वीकार्यता को मापने की कसौटी है। मुझे नहीं लगता तब से अब तक इतनी बड़ी जन स्वीकार्यता किसी अन्य राजा को प्राप्त हुई हो। इसलिए सम्राट होकर भी अकबर, महाराणा प्रताप के जीतेजी मेवाड़ को ना जान सका, ना जीत सका और न कभी वो मेवाड़ जनजीवन की प्राणशक्ति ही बन सका। अकबर का शक्ति सागर, व्यर्थ ही इस अरावली के शिखर से टकराता रहा।

महाराणा प्रताप की अदम्य वीरता, दृढ़ साहस और कुशल सेनानायक की उज्वल कीर्ति के आलोक में अनेक ऐसे गुण, जो महाराणा के व्यक्तित्व को विभिन्न आयामों में विराटता प्रदान करते हैं, छिप कर रह गये हैं। विदित हो कि महाराणा प्रताप में अच्छे सेनानायक के गुणों के साथ-साथ अच्छे व्यवस्थापक की विशेषताएं भी थी। अपने शासनकाल में उन्होने युद्ध में उजड़े गांवों को पुन: व्यवस्थित किया। नवीन राजधानी चावण्ड को अधिक आकर्षक बनाने का श्रेय महाराणा प्रताप को जाता है। चावंड को चित्रकला का केंद्र बनाकर नई चित्र शैली मेवाड़ी शैली का प्रारम्भ करवाया।
महाराणा प्रताप को स्थापत्य, कला, भाषा और साहित्य से भी लगाव था। वे स्वयं विद्वान तथा कवि थे। उनके शासनकाल में अनेक विद्वानों एवं साहित्यकारों को आश्रय प्राप्त था। राजधानी के भवनों पर कुम्भाकालीन स्थापत्य की अमिट छाप देखने को मिलती है। पद्मिनी चरित्र की रचना तथा दुरसा आढा की कविताएं महाराणा प्रताप के युग को आज भी अमर बनाये हुए हैं। उनकी प्रेरणा से ही मथुरा के चक्रपाणी मिश्र ने विश्व वल्लभ नामक स्थापत्य तथा मुहूर्त माला नामक ज्योतिष ग्रंथ की रचना की। चांवड में चावंड माता के मंदिर का निर्माण भी राणा प्रताप ने ही करवाया था।
दीगर है कि अंग्रेजी हुकूमत से स्वाधीनता हेतु संघर्षरत अनेक महान क्रांतिकारियों के प्रेरणा स्रोत थे 500 वर्ष पूर्व जन्में महाराणा। वीर शिरोमणि चंद्रशेखर आजाद के लिये आदर्श थे राणा। क्रान्तिकारियों के लिए मेवाड़ की धरती, चित्तौड़गढ़ और हल्दीघाटी तीर्थस्थल बन चुके थे। वस्तुत: अंग्रेजों की दासता से मुक्ति दिलाने के लिए महाराणा प्रताप के नाम ने जादू का काम किया।
महाराणा का कुल इतिहास सहजीवन और सहअस्तित्व के आदर्श का प्राकट्य है। ढूंढने पर भी एक भी संदर्भ ऐसा नहीं प्राप्त होता है जिसमें राणा ने कभी किसी के साथ जाति, पंथ, रंग, लिंग की बुनियाद पर कोई भेदभाव किया हो। यह मानवता की सबसे बड़ी कसौटी है।
महाराणा प्रताप ऐसे मानव थे जो अपने अस्तित्व को तिरोहित नहीं होने देना चाहते थे। उनका संघर्ष, हर उस सच्चे और निष्ठावान मानव का संघर्ष है जो उसे मानव होने के लिए सिद्ध करना होता है।
प्रत्येक व्यक्ति और देश का अपना अस्तित्व है। जब किसी के अस्तित्व-बिम्ब को एक आंधी उखाड़ फेंकना चाहती है तब सहज महाराणा प्रताप की याद आने लगती है।
आज युद्ध का स्वरूप बदल चुका है। साम्राज्य अब तलवार नहीं उठाते, वे शर्तें रखते हैं, वे सेनाएं नहीं भेजते, वे दबाव भेजते हैं। वे सीमाएं नहीं लांघते, वे चेतना में प्रवेश करते हैं। जब किसी राष्ट्र या व्यक्ति से कहा जाता है कि थोड़ा झुको, बदले में सुरक्षा मिलेगी तब महाराणा प्रताप की स्मृति भीतर से आवाज देती है कि जो सुरक्षा झुककर मिलती है, वह अंततः दासता बन जाती है।
डीप स्टेट के अदृश्य तंत्र, प्रलोभनों की आंधियां और भीतर से राष्ट्र को खोखला करने वाली साजिशें इन सबके बीच महाराणा प्रताप दीप बनकर खड़े दिखाई देते हैं। वे याद दिलाते हैं कि पराधीनता पहले मन में उतरती है, सीमाओं पर बाद में। यदि चेतना सजग रहे, तो कोई भी जाल स्थायी नहीं हो सकता।
वस्तुत: वह हमारे दुर्धर संघर्ष, निष्ठा, समर्पण और पराक्रम की अपूर्व धरोहर हैं। वह ऐसा इतिहास हैं, जो कभी मर नहीं सकता। ऐसे भी अनेक प्रयास हुए हैं और आगे भी होते रहेंगे जो महाराणा प्रताप की गरिमा को सन्देह की शय्या पर सुलाना चाहेंगे।
लेकिन शायद ऐसा करने वाले यह भूल गये हैं कि महाराणा प्रताप का इतिहास मानव-जीवन का पर्याय है और कोई भी ऐतिहासिक दुराग्रह, उसे प्राप्त प्रतिष्ठा से अपदस्थ नहीं कर सकती। युगों-युगों तक पीढ़ियां स्वाधीनता के अमर हस्ताक्षर को स्मरण कर प्रेरणा प्राप्त करती रहेंगी।
– प्रणय विक्रम सिंह

