आज सोशल मीडिया पर एक तस्वीर तेजी से साझा की जा रही है, जिसमें बकरीद के अवसर पर पशु बलि की जगह कद्दू काटने का संदेश दिया गया है। तस्वीर में यह तर्क भी दिया गया है कि यदि पशुओं की कुर्बानी कम होगी तो लाखों लीटर रक्त और करोड़ों लीटर पानी की बर्बादी भी रुकेगी। यह केवल एक धार्मिक विषय नहीं, बल्कि पर्यावरण, संवेदनशीलता और समाज की दोहरी मानसिकता पर भी चर्चा का विषय बन चुका है।
क्या केवल त्योहारों पर ही जागती है पशु-प्रेम की भावना?
भारत सहित दुनिया भर में प्रतिदिन करोड़ों पशु भोजन उद्योग, चमड़ा उद्योग और अन्य व्यावसायिक कारणों से काटे जाते हैं। लेकिन जब किसी विशेष धार्मिक पर्व पर पशु बलि की बात आती है, तब अचानक सोशल मीडिया पर “पशु प्रेम” का ज्वार उमड़ पड़ता है। प्रश्न यह है कि क्या पशुओं के प्रति संवेदनशीलता केवल कुछ विशेष अवसरों तक सीमित रहनी चाहिए?

यदि वास्तव में पशु अधिकारों की चिंता है, तो यह आवाज हर प्रकार की हिंसा, अवैध बूचड़खानों और क्रूर पशु व्यापार के विरुद्ध समान रूप से उठनी चाहिए। चयनात्मक विरोध कहीं न कहीं इस बहस की निष्पक्षता पर प्रश्न खड़ा करता है।
पर्यावरण का मुद्दा कितना गंभीर?
तस्वीर में जल संरक्षण का जो संदेश दिया गया है, वह महत्वपूर्ण है। यह सत्य है कि बड़े पैमाने पर पशु वध और उसकी सफाई में भारी मात्रा में पानी खर्च होता है। आज जब देश के अनेक हिस्से जल संकट से जूझ रहे हैं, तब हर समाज और हर समुदाय को पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी निभानी चाहिए।
हालांकि केवल एक पर्व को पर्यावरण संकट का कारण बताना भी उचित नहीं होगा। उद्योगों से निकलने वाला प्रदूषण, नदियों में बहता रासायनिक कचरा और प्लास्टिक का बढ़ता उपयोग कहीं अधिक गंभीर समस्याएँ हैं। इसलिए समाधान संतुलित सोच और सामूहिक जिम्मेदारी में है।
एनीमल लवर्स की चुप्पी पर सवाल
समाज में कई स्वयंभू सेकुलर “एनीमल लवर्स” दिखाई देते हैं, जो हिन्दू धर्म के त्यौहार विशेषकर होली, दिवाली आदि पर सोशल मीडिया पर भावनात्मक पोस्ट डालते हैं, लेकिन बाकरी ईद के दौरान अवैध पशु तस्करी, गोवंश एवं बकरे की हत्या के मामलों में अक्सर मौन रहते हैं। क्या पशु प्रेम केवल इंटरनेट तक सीमित रह गया है?
यदि पशुओं के प्रति सच्ची करुणा है, तो वह हर परिस्थिति में दिखाई देनी चाहिए— चाहे वह किसी त्योहार का मामला हो या रोजमर्रा की क्रूरता का। केवल चुनिंदा मुद्दों पर सक्रियता दिखाना समाज में अविश्वास पैदा करता है।
PETA की भूमिका पर भी उठते हैं प्रश्न
पशु अधिकारों की बात करने वाली संस्थाओं में PETA का नाम प्रमुख है। लेकिन समय-समय पर इस संगठन पर भी आरोप लगते रहे हैं कि वह कुछ मुद्दों पर अत्यधिक सक्रिय रहता है, जबकि अन्य गंभीर पशु क्रूरता के मामलों में अपेक्षाकृत शांत दिखाई देता है। कई लोग यह भी पूछते हैं कि क्या PETA का दृष्टिकोण पूरी तरह संतुलित और व्यावहारिक है, या फिर वह केवल प्रचार आधारित अभियानों तक सीमित हो जाता है।
विशेकर बकरी ईद के समय PETA कहीं दिखाई नहीं देती और न हीं पशु क्रूरता को लेकर अपील करती है, किसी भी संस्था की विश्वसनीयता तभी मजबूत होती है जब उसका
दृष्टिकोण निष्पक्ष और सार्वभौमिक हो।
समाज को कट्टरता नहीं, संवेदनशीलता और संतुलन की आवश्यकता है। धार्मिक आस्थाओं का सम्मान करते हुए पर्यावरण संरक्षण और पशु कल्याण पर गंभीर संवाद होना चाहिए। साथ ही, पशु प्रेम और पर्यावरण की चिंता केवल सोशल मीडिया अभियान या चयनात्मक विरोध तक सीमित न रहे, बल्कि वह जीवन के हर क्षेत्र में दिखाई दे— तभी उसका वास्तविक अर्थ सिद्ध होगा।

