नदियों से महासागरों तक ‘एक एकीकृत जल प्रबंधन दृष्टिकोण’ केवल एक वैज्ञानिक अवधारणा नहीं है बल्कि यह एक उत्तरदायित्व है। यदि हम महासागरों को बचाना चाहते हैं, तो हमें अपनी छोटी-बड़ी नदियों व जल धाराओं की सफाई से शुरुआत करनी होगी। स्वस्थ नदियां ही एक स्वस्थ महासागर की नींव हैं।
विश्व महासागर दिवस प्रत्येक वर्ष 8 जून को मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा आधिकारिक रूप से मान्यता प्राप्त इस दिन का मुख्य उद्देश्य हमारे महासागरों के महत्व के प्रति जागरूकता बढ़ाना और उनके संरक्षण के लिए एकजुट होना है। लक्ष्य 3030 अंतर्गत 2030 तक दुनिया के 30% महासागरों को संरक्षित करने का संकल्प लिया गया है। महासागर सुरक्षित, तो भविष्य सुरक्षित। इस वर्ष का आधिकारिक विषय ‘हमारे नीले ग्रह के लिए मजबूत समुद्री संरक्षित क्षेत्र‘ है। जिसका प्रमुख उद्देश्य लोगों को यह समझाना है कि –
जिस तरह जमीन पर नेशनल पार्क होते हैं, वैसे ही समुद्र के कुछ हिस्सों को मानवीय हस्तक्षेप से बचाना क्यों आवश्यक है।
* कैसे प्लास्टिक समुद्री जीवन से होता हुआ हमारे भोजन चक्र में वापस आ रहा है।
* समुद्र में छोड़े गए पुराने मछली पकड़ने के जाल, जो अनजाने में हजारों समुद्री जीवों की मृत्यु का कारण बनते हैं।
* समुद्र से आवश्यकता से अधिक मछलियां निकालने के परिणाम विनाशकारी होते हैं।
* मैंग्रोव और समुद्री घास कैसे जमीनी जंगलों की तुलना में कहीं तेजी से कार्बन सोखते हैं।
* समुद्र के बढ़ते तापमान और एसिडिटी के कारण मूंगा चट्टानें (उेीरश्र ठशशषी) नष्ट हो रही हैं।
नदियों से महासागरों तक का दृष्टिकोण इस वैश्विक सत्य पर आधारित है कि
भूमि पर होने वाली हर गतिविधि, चाहे वह कृषि हो, औद्योगिक उत्सर्जन हो या अपशिष्ट प्रबंधन, अंततः जलधाराओं के माध्यम से महासागरों के स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। परम्परागत रूप से हम ताजे पानी (नदियों, झीलों) और समुद्री जल (महासागरों) के प्रबंधन को अलग-अलग श्रेणियों में देखते आए हैं, परंतु ’सोर्स टू सी’ दृष्टिकोण यह मानता है कि स्थल, मीठा पानी, डेल्टा, तटीय क्षेत्र और महासागर एक ही पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा हैं। विश्व का लगभग 80% समुद्री प्रदूषण सीधे तौर पर भूमि-आधारित गतिविधियों से आता है।
एक अध्ययन (नेचर कम्युनिकेशन 2017) के अनुसार विश्व की मात्र 20 नदियां समुद्र में जाने वाले कुल प्लास्टिक कचरे का 67% हिस्सा प्रवाहित करती हैं। हर वर्ष लगभग 8 से 11 मिलियन मीट्रिक टन प्लास्टिक समुद्र में प्रवेश करता है। (द ओशन क्लिनअप एडवांसेज 2021) की रिपोर्ट बताती है कि 1000 नदियां 80% प्लास्टिक उत्सर्जन करती हैं। प्लास्टिक का सबसे बड़ा स्रोत दक्षिण-पूर्व एशिया और दक्षिण एशिया की नदियां हैं।
यूनेस्को और वर्ल्ड रिर्सोसेज इस्टीट्युट (डब्ल्यूआरआई) की रिपोर्ट के अनुसार कृषि में उपयोग होने वाले उर्वरक (नाइट्रोजन और फास्फोरस) बारिश के पानी के साथ बहकर नदियों के माध्यम से समुद्र में पहुंचते हैं। इन रसायनों के कारण समुद्र में शैवाल की अत्यधिक वृद्धि होती है, जिससे पानी में ऑक्सीजन समाप्त हो जाती है, इसे ’यूट्रोफिकेशन’ कहते हैं। वर्तमान में दुनिया भर में 500 से अधिक ’डेड जोन’ हैं, जिनका कुल क्षेत्रफल लगभग 245,000 वर्ग किमी है।
यूएन-वॉटर (वर्ल्ड वॉटर डेवलपमेंट रिपोर्ट- 2017) के अनुसार भारी धातुएं (पारा, सीसा) और अनुपचारित सीवेज सीधे जलीय जीवन को प्रभावित करते हैं। दुनिया भर में उत्पन्न होने वाले सीवेज का लगभग 80% बिना किसी उपचार के पर्यावरण में छोड़ दिया जाता है।
‘सोर्स टू सी’ के प्रमुख स्तम्भ हायड्रोलॉजी
जल विज्ञान (हाइड्रोलॉजी): बांधों और जल निकासी के कारण नदियों के प्राकृतिक प्रवाह में बदलाव आता है। यह डेल्टाओं तक पहुंचने वाली तलछट (सेडीमेंट) को रोकता है, जिससे तटीय कटाव बढ़ता है।
तलछट प्रबंधन: वैश्विक स्तर पर बांधों ने समुद्र तक पहुंचने वाली प्राकृतिक तलछट के प्रवाह को 25-30% तक कम कर दिया है, जिससे समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बिगड़ गया है।
जैव विविधता: नदियों और समुद्रों के बीच प्रवास करने वाली मछलियां (जैसे सैल्मन एवं हिल्सा) इन दो पारिस्थितिकी तंत्रों के बीच महत्वपूर्ण कड़ी हैं। ये अपना अधिकांश जीवन खारे पानी (समुद्र) में बिताती हैं, पर अंडे देने के लिए मीठे पानी की नदियों की ओर प्रवास करती हैं।
भारत के संदर्भ में प्रासंगिकता
भारत के लिए यह दृष्टिकोण अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि हमारी अधिकांश बड़ी नदियां (गंगा, ब्रह्मपुत्र, सिंधु) घनी जनसंख्या वाले क्षेत्रों से होकर गुजरती हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार गंगा के किनारे स्थित शहर हर दिन सैकड़ों टन कचरा नदी में डालते हैं, जो बंगाल की खाड़ी तक पहुंचता है। ’नमामि गंगे’ और ’स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण 2.0)’ अब धीरे-धीरे ’सोर्स टू सी’ की दिशा में बढ़ रहे हैं, जहां ठोस और तरल अपशिष्ट प्रबंधन पर जोर दिया जा रहा है।
समाधान और भविष्य की राह: जल प्रबंधन की नीतियों को नदी बेसिन स्तर पर लागू करना। प्लास्टिक और रसायनों का पुनर्चक्रण आवश्यक है ताकि वे जल प्रणालियों में प्रवेश ही न करें। नदियों के किनारे और तटों पर मैंग्रोव और वेटलैंड्स (आर्द्रभूमि) का संरक्षण करना, जो प्राकृतिक फिल्टर के रूप में कार्य करते हैं चूंकि नदियां और समुद्र सीमाओं को नहीं मानते, इसलिए देशों के बीच डेटा साझाकरण और संयुक्त सफाई अभियान (जैसे- ‘स्वच्छ समुद्र अभियान’) आवश्यक हैं।
सजल श्रीवास्तव
