समाधान के रूप में पूर्वोत्तर में कनेक्टिविटी और हॉर्टिकल्चर, पश्चिम बंगाल में एमएसएमई पार्क और लॉजिस्टिक्स हब, तमिलनाडु में जल प्रबंधन और ग्लोबल वैल्यू चेन में एकीकरण पर ध्यान देना आवश्यक है। इन क्षेत्रीय विशेषताओं को समझते हुए लक्षित नीतियां और संघीय सहयोग ही सतत आर्थिक परिवर्तन लाने की कुंजी हैं।
हालिया विधानसभा चुनावों में पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में आई परिवर्तन की आंधी से पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत की आर्थिक प्रगति का मार्ग प्रशस्त होता प्रतीत हो रहा है। पूर्वोत्तर औद्योगिक पिछड़ापन, पलायन, जातीय संघर्ष, नार्को-आतंकवाद, उग्रवाद और वसूली जैसी समस्याओं से ग्रस्त रहा है। यहां की राजनीति और अर्थव्यवस्था एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं। दूसरी ओर, दक्षिण भारत की असली आर्थिक चुनौती यह है कि वह अपनी उच्च उत्पादकता और आर्थिक प्रगति को कैसे बचाए रखे? तमिलनाडु और केरल जैसे राज्य दैनिक खर्चों और पेंशन के लिए भारी कर्ज ले रहे हैं, जिससे उनकी भविष्य की निवेश क्षमता प्रभावित हो रही है।

भारत का औद्योगिक इंजन था पश्चिम बंगालः 1960 के दशक तक, भारत के कुल औद्योगिक उत्पादन में पश्चिम बंगाल की हिस्सेदारी 30% से अधिक थी। कोलकाता भारत की वित्तीय और औद्योगिक राजधानी हुआ करता था। हुगली नदी के किनारे दुनिया का सबसे बड़ा जूट उद्योग था। इसके अतिरिक्त चाय, कोयला, लोहा और इंजीनियरिंग सामानों में बंगाल का एकाधिकार था। औद्योगिक पतन के ऐतिहासिक कारणों में प्रमुख हैं- केंद्र की माल ढुलाई समतलीकरण नीति 1952, आक्रामक ट्रेड यूनियनवाद (1960 और 70 के दशक) तथा नंदीग्राम और सिंगूर का बवाल (2006-2008), जिसे आधुनिक बंगाल के इतिहास का सबसे काला अध्याय माना जाता है।
सिंगूर से टाटा का जाना राज्य के औद्योगिक भविष्य के लिए एक ’डेथ वारंट’ सिद्ध हुआ। ममता बनर्जी के सत्ता में आने के बाद भी स्थितियां वैसी नहीं सुधरीं, जैसी उम्मीद थी। राज्य का कर्ज- जीएसडीपी अनुपात लगभग 39% है, जो इसे देश के सबसे अधिक कर्जदार राज्यों में से एक बनाता है। राज्य का अधिकांश राजस्व ’मुफ्त योजनाओं’ और पुराने कर्ज का ब्याज चुकाने में खर्च हो रहा है।
बेरोजगारी: राज्य में बेरोजगारी दर आंकड़ों में भले ही कम दिखे, सच्चाई यह है कि अधिकांश कार्यबल कम वेतन वाली ’कैजुअल’ श्रेणियों या कृषि में संलग्न है, न कि स्थिर विनिर्माण नौकरियों में। आंकड़े बताते हैं कि पश्चिम बंगाल ने पिछले 7 वर्षों में अनौपचारिक क्षेत्र में 30 लाख नौकरियां खोई हैं, जो देश के किसी भी राज्य में सबसे अधिक है। आर्थिक और औद्योगिक गिरावट के कारण 2011 से 2021 के बीच राज्य से बाहर जाने वाले प्रवासियों की संख्या में 38.5% की वृद्धि हुई।
सिंडिकेट राज और कट मनीः पश्चिम बंगाल की राजनीति में ’सिंडिकेट राज’ और ’कट मनी’ लम्बे समय से विवाद के केंद्र में रहे हैं। ये शब्द राज्य में भ्रष्टाचार, जबरन वसूली और राजनीतिक संरक्षण के अंतर्गत चलने वाले अवैध तंत्र को दर्शाते हैं। ’सिंडिकेट’ सत्ताधारी दल के संरक्षण में स्थानीय युवाओं या समूहों का एक अनौपचारिक संगठन है। बिल्डरों और सामान्य नागरिकों को घर बनाने के लिए इन्हीं से घटिया गुणवत्ता वाली निर्माण सामग्री (सीमेंट, ईंट, रेत) बाजार भाव से अधिक कीमत पर खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है। ’कट मनी’ का तात्पर्य उस अवैध कमीशन से है जो राजनेता या स्थानीय कार्यकर्ता नागरिकों से सरकारी लाभ या अनुदान दिलाने के बदले वसूलते हैं।
पूर्वोत्तर भारत है कनेक्टिविटी हब: पूर्वोत्तर क्षेत्र भारत के ‘ऐक्ट ईस्ट पॉलिसी’ का केंद्र है। पूर्वोत्तर भारत को शेष भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया से जोड़ने में उत्तर बंगाल, एक रणनीतिक प्रवेश द्वार है। कोलकाता और हल्दिया बंदरगाह और प्रस्तावित ताजपुर पोर्ट पूर्वोत्तर के लिए लाइफलाइन बन सकते हैं। पूर्वोत्तर में जलविद्युत, जैविक खेती और पर्यटन की अपार सम्भावनाएं हैं, जिन्हें बंगाल के औद्योगिक और वित्तीय पारिस्थितिकी तंत्र के साथ जोड़कर एक विशाल ’ईस्टर्न इकोनॉमिक कॉरिडोर’ बनाया जा सकता है। कोलकाता को केवल एक क्षेत्रीय शहर नहीं बल्कि दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए निर्यात और सेवाओं का प्रवेश द्वार बनाना होगा। पुराने और अप्रचलित नियमों (जैसे अर्बन लैंड सीलिंग) को हटाकर
एक ऐसा ईकोसिस्टम बनाना होगा जहां पश्चिम बंगाल के शिक्षित युवा पलायन के बजाए यहीं निवेश और स्टार्टअप शुरू करें।
आर्थिक परिदृश्य को बदलने वाले कॉरिडोरः केंद्रीय बजट 2026-27 में घोषित दो महत्वाकांक्षी परियोजनाएं पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर के आर्थिक परिदृश्य को बदलने की क्षमता रखती हैं। पहला है, डंकुनी-सूरत डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर। इसका उद्देश्य है पूर्वी भारत के खनिज सम्पन्न क्षेत्रों (झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़) को पश्चिमी भारत के बंदरगाहों (सूरत, मुंद्रा, जेएनपीटी) से सीधे जोड़ना। यह गलियारा पश्चिम बंगाल (डंकुनी), झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और गुजरात (सूरत) से होकर गुजरेगा। दूसरा, वाराणसी-सिलीगुड़ी हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर है। यह पूर्वी भारत का पहला ’बुलेट ट्रेन’ मार्ग होगा, जिसे बजट 2026 में मंजूरी मिली है। यह कॉरिडोर उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल को जोड़ेगा।
दुर्लभ पृथ्वी कॉरिडोरः केंद्रीय बजट 2026-27 में तमिलनाडु और केरल के लिए एक समर्पित दुर्लभ पृथ्वी कॉरिडोर की घोषणा की गई है। यह कॉरिडोर दुर्लभ पृथ्वी स्थाई चुंबक के उत्पादन में भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए महत्वपूर्ण है, जिसका उपयोग इलेक्ट्रिक वाहनों और रक्षा प्रणालियों में होता है।
हाई-स्पीड रेल (बुलेट ट्रेन) कॉरिडोरः बजट 2026 में घोषित चेन्नई-बेंगलुरु और हैदराबाद-चेन्नई कॉरिडोर बन जाने के बाद प्रमुख आईटी और विनिर्माण हब के बीच कनेक्टिविटी में क्रांतिकारी बदलाव आएगा।
ब्लू इकॉनमी और समुद्री विकासः ताजपुर गहरे समुद्री बंदरगाह (पश्चिम बंगाल) की तर्ज पर दक्षिण में भी बंदरगाहों का आधुनिकीकरण किया जा रहा है। तमिलनाडु में लम्बी तटरेखा का उपयोग कर ’ब्लू इकॉनमी’ को बढ़ावा दिया जा रहा है। पश्चिमी घाट के पोधिगई मलाई में स्थाई पर्वतीय मार्ग और पुलिकट झील के किनारे पक्षी अवलोकन मार्ग विकसित किए जा रहे हैं।
तमिलनाडु वर्तमान में भारत की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। थलपति विजय की अल्पमत सरकार से जनता में सुशासन की आशा जगी है। वहीं, पश्चिम बंगाल के लिए डबल इंजन की सरकार में शुभेंदु अधिकारी शुभ सिद्ध होंगे, माना यही जा रहा है।
भारत के तीन महत्वपूर्ण क्षेत्रों – पूर्वोत्तर, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु – की आर्थिक संरचनाएं ऐतिहासिक, भौगोलिक और औद्योगिक दृष्टि से विषम हैं, जो अलग-अलग चुनौतियाँ पेश करती हैं।
रामेंद्र सिन्हा
