कभी एक डॉलर कुछ ही रुपए के बराबर हुआ करता था, लेकिन आज उसकी कीमत 95 रुपए से अधिक पहुंच चुकी है। रुपए की गिरावट का दुष्परिणाम केवल मुद्रा बाजार में ही नहीं बल्कि देश की अर्थव्यवस्था, महंगाई, व्यापार और आम नागरिक की जेब पर भी पड़ रहा है।
वर्तमान समय में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़े तनाव तथा होर्मुज जलडमरूमध्य में पैदा हुए संकट ने वैश्विक तेल बाजार को प्रभावित किया। यह समुद्री मार्ग दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल व्यापार का प्रमुख रास्ता है। ईरान द्वारा इस मार्ग पर दबाव बढ़ने से तेल आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ी और कच्चे तेल की कीमतें लगभग 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं। इसका सीधा प्रभाव भारत पर पड़ा क्योंकि भारत को अधिक महंगे दामों पर तेल खरीदने के लिए अधिक डॉलर खर्च करने पड़े। जब किसी देश से अधिक डॉलर बाहर जाते हैं और पर्याप्त डॉलर वापस नहीं आते, तब डॉलर महंगा होता है और रुपया कमजोर होने लगता है।
रुपए पर दबाव बढ़ने का दूसरा बड़ा कारण विदेशी निवेशकों की निकासी है। पिछले कुछ वर्षों में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से अरबों डॉलर निकाले हैं। जब विदेशी निवेशक अपने भारतीय शेयर बेचकर बाहर जाते हैं, तब वे अपने निवेश को डॉलर में बदलते हैं। इससे डॉलर की मांग और बढ़ जाती है। दूसरी ओर भारत में एसआईपी और म्यूचुअल फंड में निवेश तेजी से बढ़ा है। प्रत्येक महीने लाखों भारतीय नियमित रूप से शेयर बाजार में पैसा लगा रहे हैं। यही पैसा बाजार को गिरने से बचा रहा है, किंतु कई अर्थविशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि भारतीयों का यही पैसा विदेशी निवेशकों को ऊंचे दामों पर शेयर बेचकर बाहर निकलने का अवसर दे रहा है।

अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या एक डॉलर और एक रुपया बराबर हो सकते हैं? व्यवहारिक रूप से यह अत्यंत कठिन है। मुद्रा का मूल्य केवल नोट छापने से तय नहीं होता। यह उस देश की उत्पादन क्षमता, वैश्विक व्यापार, तकनीकी शक्ति, विदेशी निवेश और अंतरराष्ट्रीय विश्वास पर निर्भर करता है। अमेरिका विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। विश्व व्यापार का बड़ा भाग डॉलर में होता है और अंतरराष्ट्रीय ऋण भी डॉलर में दिए जाते हैं।
इसलिए डॉलर की मांग हमेशा बनी रहती है। भारत ने कई बार अपनी मुद्रा का अवमूल्यन किया है। 1966 में एक डॉलर लगभग 4.76 रुपए के बराबर था, जिसे घटाकर लगभग 7.50 रुपए के आसपास कर दिया गया। इसके बाद 1991 में आर्थिक संकट के समय भारत के पास केवल कुछ सप्ताह का विदेशी मुद्रा भंडार बचा था। तब तत्कालीन वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और प्रधान मंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव की सरकार ने रुपए का अवमूल्यन किया ताकि निर्यात बढ़ सके और विदेशी निवेश आकर्षित हो।

आज गिरते रुपए का सबसे बड़ा प्रभाव आम आदमी पर पड़ रहा है। पेट्रोल-डीजल और परिवहन महंगा होता है, तब खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ती हैं और विदेशों में पढ़ाई करने वाले छात्रों का खर्च लाखों रुपए बढ़ जाता है। छोटे उद्योग, जो आयातित कच्चे माल पर निर्भर हैं, वे भी भारी दबाव में आ जाते हैं। भारत सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक रुपए को स्थिर रखने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं।
भारत का विदेशी मुद्रा भंडार वर्तमान में लगभग 697 अरब डॉलर के आसपास है। रिजर्व बैंक बाजार में डॉलर बेचकर रुपए को अत्यधिक गिरने से रोकने का प्रयास करता है। मेक इन इंडिया, आत्मनिर्भर भारत, हरित ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन और जैव ईंधन जैसी योजनाओं का उद्देश्य केवल विकास नहीं बल्कि डॉलर पर निर्भरता कम करना भी है। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा तेल की बचत और सोने की अनावश्यक खरीद कम करने की अपील भी इसी आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
आज दुनिया में डीडॉलराइजेशन अर्थात डॉलर पर निर्भरता कम करने की चर्चा तेज हो रही है। रूस पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों और उसके लगभग 300 अरब डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार को फ्रीज किए जाने के बाद अनेक देशों ने डॉलर आधारित व्यवस्था पर पुनर्विचार शुरू किया है। भारत भी स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने और यूपीआई जैसी डिजिटल भुगतान व्यवस्था को वैश्विक स्तर पर विस्तार देने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

इसी बीच गोल्ड स्टैंडर्ड की चर्चा भी फिर से बढ़ रही है। अमेरिका के पास लगभग 8,133 टन सोना है, जबकि भारत के पास लगभग 880 टन स्वर्ण भंडार है। अनेक विशेषज्ञ मानते हैं कि भविष्य में यदि दुनिया फिर से स्वर्ण आधारित मुद्रा व्यवस्था की ओर लौटती है तो मुद्रा छपाई पर नियंत्रण लगेगा, मुद्रास्फीति कम होगी और वैश्विक अर्थव्यवस्था में अधिक स्थिरता आ सकती है।
भारतीय परम्परा में सोना और चांदी केवल आभूषण नहीं बल्कि आर्थिक सुरक्षा के साधन रहे हैं। अनुमान है कि भारतीय घरों और मंदिरों में 25 से 30 हजार टन सोना उपस्थित है। यह केवल परम्परा नहीं बल्कि पीढ़ियों के अनुभव से विकसित आर्थिक समझ है। वास्तव में यह संघर्ष केवल रुपए और डॉलर का नहीं बल्कि उस वैश्विक आर्थिक व्यवस्था का है जिसमें दुनिया का अधिकांश व्यापार और भुगतान एक ही मुद्रा पर आधारित हो गया है। जब तक भारत उत्पादन, तकनीकी क्षमता, ऊर्जा आत्मनिर्भरता और निर्यात शक्ति में पर्याप्त वृद्धि नहीं करेगा, तब तक रुपए पर दबाव बना रह सकता है। मजबूत रुपया केवल सरकारी हस्तक्षेप से नहीं बल्कि मजबूत अर्थव्यवस्था, आत्मनिर्भर उत्पादन और वैश्विक विश्वास से निर्मित होगा।
-दीपक कुमार द्विवेदी

