| डॉ. मुखर्जी ने हमें न केवल एक भौगोलिक प्रदेश दिया बल्कि हमारी अस्मिता और गौरव की रक्षा की। इस युगपुरुष का ऋण बंगाल और समूचा भारत कभी नहीं चुका सकता, जिन्होंने विभाजन की राख से एक सुरक्षित और गौरवशाली पश्चिम बंगाल का पुनर्जन्म सुनिश्चित किया और भारत में जम्मू-कश्मीर के पूर्ण विलिनीकरण के संघर्ष का सूत्रपात किया। |
‘कांग्रेस ने भारत का विभाजन स्वीकार किया, जबकि मैंने पाकिस्तान का विभाजन सुनिश्चित किया’, डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के इस ऐतिहासिक कथन में न केवल उनके अद्वितीय राजनीतिक साहस की प्रतिध्वनि है बल्कि यह उस सत्य का प्रमाण भी है जिसके कारण आज हम भारत के मानचित्र पर पश्चिम बंगाल को देख पा रहे हैं। यह वक्तव्य उनके उस वैचारिक और व्यावहारिक संघर्ष को रेखांकित करता है,

जिसे उन्होंने 1947 में उस समय अपनाया था जब भारत का नेतृत्व विभाजन की विभीषिका के सामने घुटने टेक चुका था। इतिहासकार दिनेश चंद्र सिन्हा और अशोक कुमार मजूमदार जैसे विद्वानों के शोध तथा तथागत रॉय द्वारा लिखित उनकी जीवनी के संदर्भों में यह स्पष्ट है कि यह केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं थी बल्कि एक ऐसी रणनीतिक घोषणा थी जिसने जिन्ना के ’अखंड पाकिस्तान’ के मंसूबों को खंडित कर दिया था।
उस कालखंड में जब कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व विभाजन को नियति मानकर चुपचाप उसे स्वीकार कर रहा था, तब डॉ. मुखर्जी ने अडिग होकर यह कहा था कि यदि विभाजन अपरिहार्य है तो फिर मुस्लिम लीग की तुष्टीकरण नीति के अंतर्गत पूरे बंगाल को पाकिस्तान में नहीं जाने दिया जाएगा। इसी दृढ़ता ने बंगाल के उन हिंदू बहुल क्षेत्रों को बचा लिया, जो आज पश्चिम बंगाल के नाम से भारत की सांस्कृतिक और आर्थिक रीढ़ हैं।

इतिहास के उस निर्णायक मोड़ पर जब मोहम्मद अली जिन्ना और तत्कालीन बंगाल के मुख्य मंत्री सुहरावर्दी ’संयुक्त और स्वतंत्र बंगाल’ का छद्म जाल बुन रहे थे, तब उनकी मंशा स्पष्ट थी। उनका ’शरत-सुहरावर्दी फॉर्मूला’ ऊपरी तौर पर बंगाली अस्मिता का मुखौटा पहने हुए था, किंतु उसका वास्तविक उद्देश्य पूरे बंगाल को पूर्वी पाकिस्तान का हिस्सा बनाकर हिंदुओं के लिए एक ’हिंदू होमलैंड’ की सम्भावना को ही समाप्त करना था। अगस्त 1946 के ’डायरेक्ट एक्शन डे’ ने पहले ही यह दिखा दिया था कि भविष्य में हिंदुओं का अस्तित्व किस भीषण संकट में होगा।
ऐसे समय में जब बंगाल का भविष्य अंधकार में था, डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने मोर्चा सम्भाला। उन्होंने कांग्रेस की उस नीति का पुरजोर विरोध किया, जो बंगाल को बिना शर्त पाकिस्तान में समाहित होते हुए देख रही थी। डॉ. मुखर्जी ने अपनी तर्कशक्ति से यह सिद्ध किया कि यदि भारत का विभाजन धार्मिक आधार पर हो रहा है तो बंगाल का भी बंटवारा उसी धार्मिक आधार पर होना चाहिए ताकि हिंदू बहुल पश्चिमी बंगाल भारत संघ का हिस्सा रह सके।
डॉ. मुखर्जी ने केवल भाषण नहीं दिए बल्कि उन्होंने धरातल पर एक प्रचंड जन-आंदोलन खड़ा किया। बंगाल प्रांतीय हिंदू महासभा के माध्यम से उन्होंने बुद्धिजीवियों, किसानों और सामान्य नागरिकों को इस बात के लिए प्रेरित किया कि हमारी सांस्कृतिक धरोहर, हमारे मंदिर, हमारे विश्वविद्यालय और हमारा उद्योग तभी सुरक्षित रह सकते हैं जब हम एक ऐसे ’हिंदू होमलैंड’ का निर्माण करें जो भारत के साथ हो।
अप्रैल 1947 के ऐतिहासिक तारकेश्वर सम्मेलन ने इस मांग को एक जनांदोलन का स्वरूप दे दिया। उनके इसी अथक परिश्रम और राजनीतिक कौशल का परिणाम था कि लॉर्ड माउंटबेटन को विभाजन योजना में बंगाल के विभाजन को शामिल करना पड़ा। 20 जून 1947 का दिन उस संघर्ष की विजय की पराकाष्ठा थी, जब बंगाल विधान परिषद में हिंदू बहुल जिलों के विधायकों ने बहुमत से यह प्रस्ताव पारित किया कि बंगाल का विभाजन होना चाहिए और पश्चिमी हिस्सा भारत में शामिल होगा। यही वह क्षण था जिसने 58 बनाम 21 मतों से कलकत्ता और आसपास के समृद्ध जिलों को पाकिस्तान में जाने से बचा लिया।

आज जब हम 20 जून को ’पश्चिम बंग दिवस’ के रूप में मनाते हैं तो यह केवल एक प्रशासनिक स्थापना नहीं बल्कि उस विजय का उत्सव है जिसे डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने अपने जीवन की सबसे बड़ी बाजी लगाकर प्राप्त किया था। यदि आज रवींद्रनाथ की कविताएं, विवेकानंद का दर्शन और मां काली की उपासना स्थली भारत की सीमाओं के भीतर सुरक्षित है तो यह डॉ. मुखर्जी के उस ’हिंदू होमलैंड’ के दृष्टिकोण के कारण ही है, जिसके अंतर्गत उन्होंने पाकिस्तान के सम्भावित क्षेत्रफल को आधा कर दिया था। उनका योगदान मात्र एक राज्य के निर्माण तक सीमित नहीं था बल्कि उन्होंने शरणार्थियों की एक पूरी पीढ़ी को आश्रय दिया और भारत को पूर्वी सीमा पर एक रणनीतिक सुरक्षा कवच प्रदान किया।

डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी का राष्ट्रवाद केवल बंगाल की सीमाओं तक सीमित नहीं था बल्कि कश्मीर के भारत में पूर्ण विलीनीकरण के लिए उनका संघर्ष स्वतंत्र भारत के इतिहास का सबसे स्वर्णिम और साहसिक अध्याय है। स्वतंत्रता के बाद तत्कालीन नेहरू सरकार की नीतियों के कारण जम्मू-कश्मीर को अनुच्छेद 370 के अंतर्गत एक विशेष दर्जा दिया गया था, जिसमें राज्य का अपना अलग संविधान, अलग झंडा और अपना एक अलग प्रधान मंत्री (वज़ीर-ए-आज़म) होता था। इतना ही नहीं, भारत के किसी भी नागरिक को कश्मीर में प्रवेश करने के लिए एक विशेष सरकारी अनुमति (परमिट) लेनी पड़ती थी। डॉ. मुखर्जी ने भारत की सम्प्रभुता के साथ हो रहे इस खिलवाड़ को भांप लिया और इसके विरुद्ध एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन छेड़ते हुए नारा दिया- एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे।
इस संवैधानिक विसंगति को समाप्त करने और कश्मीर को भारत का वास्तविक अभिन्न अंग बनाने के लिए वे मई 1953 में बिना परमिट के कश्मीर की सीमा में प्रवेश कर गए, जहां शेख अब्दुल्ला की सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। नजरबंदी के दौरान ही 23 जून 1953 को रहस्यमय परिस्थितियों में इस महान राष्ट्रवादी नेता का निधन हो गया, जो कि वास्तव में अखंड भारत के लिए स्वाधीनता के पश्चात किसी राष्ट्रीय नेता का प्रथम बलिदान था। कुछ लोगों के अनुसार डॉ. मुखर्जी की हत्या की गई थी, पर उनका यह बलिदान व्यर्थ नहीं गया, उनके इसी आंदोलन के दबाव में आगे चलकर नेहरू सरकार को परमिट व्यवस्था समाप्त करनी पड़ी और अंततः दशकों बाद नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा धारा 370 हटाने के बाद देश ने कश्मीर के पूर्ण एकीकरण के उनके उस अधूरे सपने को साकार होते देखा।
विप्लव विकास
#DrShyamaPrasadMukherjee #WestBengalDay #KashmirIntegration #Article370 #IndianHistory #NationalistUnification #AkhandBharat #BengalPartition1947 #HistoricalOpEd #BiplabBikash

