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West Bengal Elections 2026, Mamata Banerjee, Narendra Modi, BJP vs TMC, Nationalism, Vote Bank Politics, Infiltration, Indian Democracy, Political Analysis, Amol Pednekar, पश्चिम बंगाल चुनाव, राष्ट्रवाद, तुष्टीकरण की राजनीति, विपक्षी दल

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‘राष्ट्र’ हो राजनीति का केंद्र

by अमोल पेडणेकर
in जुलाई 2026, देश-विदेश
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देश की जनता अब ‘राष्ट्र प्रथम’ और ‘राष्ट्र सर्वोपरि’ के साथ धर्मनिष्ठ संस्कृति के अनुरूप विकास एवं राष्ट्र केंद्रित राजनीति की अपेक्षा करती है। मुस्लिम तुष्टीकरण, वोट बैंक व राष्ट्रविरोधी राजनीति करनेवाली विपक्षी पार्टियां यदि अब भी नहीं चेती तो उनके समक्ष अस्तित्व का संकट खड़ा हो जाएगा।

प्रधान मंत्री बनने और नरेंद्र मोदी को टक्कर देने की इच्छा रखने वाली ममता बनर्जी को पश्चिम बंगाल के चुनाव में वहां की जनता ने पूरी तरह क्यों नकार दिया? इस चुनाव में पश्चिम बंगाल की जनता ने केवल भाजपा को नहीं जिताया है बल्कि ममता बनर्जी को हराया है।

व्यक्तिगत अत्याचार, गुंडागर्दी, राष्ट्रवाद के विरोध में बांग्लादेशी घुसपैठियों का समर्थन और उनका संवर्धन, हिंदू नीति एवं परम्पराओं का विरोध, इन सभी बातों का ममता बनर्जी ने अपने कार्यकाल में जनता के हितों के विरुद्ध उपयोग किया। ‘मां, माटी और मानुष’ के विकास का नारा लेकर साम्यवाद के विरुद्ध संघर्ष करते हुए जिन्होंने पश्चिम बंगाल की जनता के मन में अपना स्थान बनाया था, उन्हें जनता ने दो बार सम्मानपूर्वक सत्ता पर बिठाया, परंतु 2026 के चुनाव में उसी जनता ने ममता बनर्जी के साथ खेला कर दिया।

यदि भविष्य में चाहे सत्ता में रहकर या विपक्ष में रहकर राजनीति करनी है तो जनता के हितों, राष्ट्रवाद, सनातन भारत के गौरव और परम्पराओं की अवमानना करके नहीं की जा सकेगी। राजनीति करने वाले देश के नेताओं को इस परिवर्तन को गम्भीरता से समझना होगा। पश्चिम बंगाल के चुनाव के माध्यम से जनता ने यही सीधा संदेश दिया है।
Mamata Banerjee loyalists seek separate room, speaking time in Assembly |  Kolkata News - The Indian Express

राजनीति राष्ट्र का भाग्य-विधाता तंत्र होती है। राजनीति यह केवल सत्ता प्राप्ति और शासन संचालन का माध्यम नहीं बल्कि समाज की सामूहिक चेतना, राष्ट्रीय आकांक्षाओं और भविष्य की दिशा का निर्धारण करने वाली शक्ति है। यदि राजनीति अपने मूल उद्देश्य से भटक जाए तो राष्ट्र दिशाहीन हो जाता है और यदि राजनीति दूरदृष्टि, नैतिकता तथा राष्ट्रधर्म से संचालित हो तो वही राष्ट्र विश्व का नेतृत्व करने लगता है।

आज भारत एक ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है जहां उसे अपने गौरवशाली अतीत, जटिल वर्तमान और सम्भावनाओं से भरे भविष्य के बीच संतुलन स्थापित करना है। राजनीति केवल चुनाव जीतने और सरकार बनाने का माध्यम नहीं है। राजनीति का वास्तविक उद्देश्य राष्ट्र का निर्माण, समाज का उत्थान और आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहतर व्यवस्था तैयार करना है। इसलिए यह प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है कि हमारे सत्ताधारी पक्ष और विपक्ष का वर्तमान और भविष्य की राजनीति का केंद्र-बिंदु क्या होना चाहिए?

 

हमारे इतिहास को देखें तो स्पष्ट दिखाई देता है कि भारत तब सबसे अधिक शक्तिशाली रहा जब शासन व्यवस्था में नैतिकता, राष्ट्रहित और जनकल्याण को सर्वोच्च स्थान मिला। भगवान राम के राजधर्म से लेकर चाणक्य की राजनीतिक दृष्टि, सम्राट अशोक की लोककल्याणकारी नीतियों और छत्रपति शिवाजी महाराज के सुशासन तक, भारतीय राजनीति का मूल आधार समाज और राष्ट्र का हित रहा है। वहीं जब स्वार्थ, विभाजन और सत्ता संघर्ष राजनीति का केंद्र बने, तब देश को अनेक कठिनाइयों एवं संकट का सामना करना पड़ा। इसलिए इतिहास हमें सिखाता है कि राज्यकर्ता और विपक्ष दोनों की राजनीति का उद्देश्य केवल शासन करना नहीं बल्कि राष्ट्र, समाज एवं व्यक्ति को दिशा देना है।

वर्तमान भारत में पिछले एक दशक के दौरान राजनीति में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिले हैं। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश ने आधारभूत संरचना, डिजिटल तकनीक, वैश्विक प्रतिष्ठा और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है। सड़कों, रेलमार्गों, हवाई अड्डों और डिजिटल सेवाओं का विस्तार हुआ है। भारत की अंतरराष्ट्रीय पहचान पहले की तुलना में अधिक मजबूत हुई है। गरीबों और वंचित वर्गों के लिए अनेक योजनाएं लागू की गई हैं जिनका लाभ बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंचा है।

हालांकि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में केवल उपलब्धियों का उल्लेख पर्याप्त नहीं होता। रोजगार सृजन, कृषि क्षेत्र की चुनौतियां, शिक्षा की गुणवत्ता, सामाजिक ध्रुवीकरण तथा लोकतांत्रिक संवाद जैसे विषय आज भी गम्भीर चर्चा की अपेक्षा रखते हैं। विकास के साथ-साथ यह भी आवश्यक है कि समाज के विभिन्न वर्गों में विश्वास और संवाद का वातावरण मजबूत हो। सरकारों का मूल्यांकन उनकी सफलताओं के साथ-साथ उन क्षेत्रों के आधार पर भी होना चाहिए जहां अभी सुधार की आवश्यकता है।

लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है जितनी सत्ता पक्ष की। विपक्ष का कार्य केवल सरकार का विरोध करना नहीं बल्कि जनता के सामने बेहतर विकल्प प्रस्तुत करना है। स्वस्थ लोकतंत्र वही है जहां विपक्ष जनहित के प्रश्न उठाए, सरकार की कमियों को रचनात्मक रूप से सामने लाए और राष्ट्रीय मुद्दों पर सहयोग की भावना रखे। यदि विपक्ष केवल विरोध तक सीमित रह जाए तो लोकतंत्र कमजोर होता है और यदि वह सकारात्मक विकल्प प्रस्तुत करे तो लोकतंत्र मजबूत होता है।

इसी प्रकार सत्ता पक्ष का भी दायित्व केवल चुनाव जीतने तक सीमित नहीं है। जनादेश जनता की ओर से दिया गया विश्वास होता है। लोकतंत्र में आलोचना को शत्रुता नहीं बल्कि सुधार का अवसर समझा जाना चाहिए। जो सरकारें आलोचना सुनती हैं और उससे सीखती हैं, वे अधिक प्रभावी और सफल सिद्ध होती हैं।

सत्ता के अहंकार में राष्ट्रनीति, समाजनीति और राज्य के विकास की उपेक्षा करने वाली ममता बनर्जी को हराकर पश्चिम बंगाल की जनता ने देश के सभी विपक्षी नेताओं और कार्यकर्ताओं को एक स्पष्ट संदेश दिया है कि यदि आपके पास राष्ट्रनीति केंद्रित राजनीति नहीं होगी, तो आपका भी खेला होगा।
आज देश भर के अधिकांश विपक्षी दलों की राजनीतिक नाव डगमगा रही है। ऐसा क्यों हो रहा है? लगभग सभी विपक्षी संगठन धीरे-धीरे समाप्ति के कगार पर पहुंचते दिखाई दे रहे हैं। एक-एक कर सभी विपक्षी दल पराजय का अनुभव कर रहे हैं।
Congress-Allies Rift Raises Questions Over INDIA's Future - Frontline

यही स्थिति देश के अधिकांश विपक्षी संगठनों की है। कांग्रेस, शिवसेना, साम्यवादी विचारधारा से जुड़े दल, आम आदमी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस सहित सभी विपक्षी दलों की स्थिति चिंताजनक दिखाई दे रही है।
जनता ने सभी विपक्षी दलों को एक नई दृष्टि देने का प्रयास किया है। देश की जनता चाहती है कि राष्ट्रनीति के विरोध की राजनीति अब बंद हो। पर्यावरण, रोजगार, युवाओं का भविष्य, मजदूरों का हित तथा राष्ट्र को सशक्त बनाने के लिए जो भी आवश्यक विषय हैं, उनसे जुड़ी राष्ट्र-केंद्रित राजनीति की भारतीय जनता अपेक्षा रखती है।

वर्तमान समय में भारत के सामने दो प्रमुख चुनौतियां दिखाई देती हैं- राष्ट्र विरोधी कट्टरता और अवैध घुसपैठ। राष्ट्र विरोधी अथवा धार्मिक कट्टरता किसी भी रूप में हो, वह समाज को विभाजित करती है। आज मुस्लिम कट्टरता पूरे विश्व में सर दर्द बनी हुई है। जब व्यक्ति या समुदाय अपने धर्म, जाति, विचारधारा या पहचान को ही अंतिम सत्य मान लेता है और दूसरों के प्रति असहिष्णु हो जाता है, तब सामाजिक और राष्ट्रीय समस्या उत्पन्न हो जाती है।

यदि राष्ट्रीय सुरक्षा, घुसपैठियों का देशभर के सभी शहरो-तहसिलों तक फैलना, मजहबी समस्या और सीमा प्रबंधन जैसे विषय वोट बैंक की राजनीति के शिकार हो जाएं तो समस्या का समाधान और कठिन हो जाता है। सत्ता और विपक्ष दोनों को राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखकर कार्य करना चाहिए।

वर्तमान और भविष्य की राजनीति का केंद्र सत्ता नहीं बल्कि राष्ट्रहित होना चाहिए। राजनीतिक दल बदलते रहेंगे, सरकारें आती-जाती रहेंगी, पर राष्ट्र स्थाई है। इसलिए सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, दोनों का लक्ष्य ऐसा समर्थ भारत बनाना होना चाहिए जो आर्थिक रूप से समृद्ध, सामाजिक रूप से समरस, सांस्कृतिक रूप से जागृत, तकनीकी रूप से सक्षम और नैतिक रूप से मजबूत हो।

आज आवश्यकता ऐसी राजनीति की है जो लोगों को बांटे नहीं, जो केवल चुनावों के बारे में न सोचे बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के बारे में भी चिंतन करें। घुसपैठियों और राष्ट्र विरोधी तत्वों के प्रति कोई उदारता की भावना न रखें। कहा जा सकता है कि किसी भी राष्ट्र का भविष्य सुरक्षा, स्वतंत्रता, अनुशासन, मानवता और राष्ट्रीय हित, इन सभी के संतुलन पर निर्भर करता है।

भारत यदि इस संतुलन को बनाए रखने में सफल होता है तो वह न केवल अपनी एकता और अखंडता को सुरक्षित रखेगा बल्कि विश्व के सामने लोकतांत्रिक सह-अस्तित्व का एक आदर्श उदाहरण भी प्रस्तुत करेगा। जब राजनीति का केंद्र व्यक्ति, परिवार या दल न होकर राष्ट्र और समाज का कल्याण बनेगा, तभी भारत अपनी पूर्ण क्षमता के साथ विश्व में नेतृत्वकारी भूमिका निभा सकेगा। यही वर्तमान का संदेश, भविष्य की आवश्यकता और राजनीति का वास्तविक धर्म है।

पश्चिम बंगाल के चुनाव ने देश के सभी राजनीतिक दलों को एक मजबूत संदेश दिया है। यदि कोई राजनीतिक दल अपने व्यक्तिगत या पारिवारिक हितों से जुड़े मुद्दों को राजनीति का आधार बनाना चाहता है तो देश की जनता अब ऐसे मुद्दों से जुड़ना नहीं चाहती। इसका कारण यह है कि देश की जनता अब ‘राष्ट्रहित सर्वोपरि’ की राजनीति को समझने लगी है। देश का युवा अब राजनीति की गहराइयों पर विचार करने लगा है। इस बात को पुन: दोहराना चाहता हूं कि पश्चिम बंगाल में केवल भाजपा की विजय नहीं हुई है बल्कि अहंकारी, राष्ट्रविरोधी और राष्ट्रनीति के विरुद्ध सत्ता का दुरुपयोग करने वाली ममता बनर्जी की पराजय हुई है। पश्चिम बंगाल की जनता ने उन्हें पराजित किया है।

देश में राजनीति का प्रवाह किस दिशा में होना चाहिए, इसका संकेत भी अब जनता ने दिया है। देश की जनता अब राष्ट्र-केंद्रित राजनीति की अपेक्षा रखती है। राजनीति करने वाले सभी लोगों को इस महत्वपूर्ण परिवर्तन पर गम्भीरता से विचार करना चाहिए। यदि वे नहीं सोचेंगे और नहीं सुधरेंगे तो देश की जनता उनके राजनीतिक संगठन के टायर की हवा निकाल देगी और उसे पंचर कर देगी। कांग्रेस, शिवसेना, साम्यवादी विचारधारा से जुड़े दल और तृणमूल कांग्रेस अपने राजनीतिक संगठनों की शक्ति खोकर कमजोर स्थिति में पहुंच गए हैं।

Mamata Banerjee removed as party chief by Ritabrata-led rebels in shocking  TMC coup

पश्चिम बंगाल के चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस के सांसदों, विधायकों और कार्यकर्ताओं का जिस प्रकार जनता विरोध कर रही है, उस विरोध प्रदर्शन में कहीं भी भारतीय जनता पार्टी जिंदाबाद, नरेंद्र मोदी जिंदाबाद या अमित शाह जिंदाबाद जैसे नारे नहीं सुनाई दे रहे थे। तृणमूल कांग्रेस के नेताओं का विरोध करने के दौरान पश्चिम बंगाल की जनता के मुख से जो नारे निकल रहे थे, वे थे- ‘भारत माता की जय’ और ‘जय श्रीराम’। इन नारों में राष्ट्रभाव, धार्मिक आस्था और सामाजिक प्रतिष्ठा का भाव दिखाई देता है। राजनीति करने बैठे लोगों को विनम्रता, पारदर्शिता एवं उत्तरदायित्व और राष्ट्र नीति के साथ कार्य करना चाहिए।
समझ जाओगे तो सुधर जाओगे वर्ना अपनी गति पाओगे।

 

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अमोल पेडणेकर

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