एसी
एसी, तुम ने तो जिंदगी की
कर दी ऐसी की तैसी।
माना पहले गर्मी में
छूटता था पसीना
लेकिन, जान पर इतना
खतरा था ना।
तुम गर्मी में देते
ठंढी का एहसास
लेकिन, इस ठंढी ने
छीनी कितनों की साँस ।
लोगों को तुमसे
चाहिए, ज्यादा ठंडक।
इसके लिए, वो निज
प्राणों को रखते बंधक।
एसी यूँ ही नहीं
देता शीतल बयार।
यह बाहर की हवा का
चुराता प्यार।
अंदर की ठंढक
बाहर करे उष्मा का प्रसार ।
इस उष्मा से सूखे
बाहर की नमीं।
आस-पास के पौधे
झेलते ये कमी ।
वो जल्दी मुरझात ।
वो झूम कर नहीं गाते ।
हमने अपनी ठंढक के लिए
बाहर की नमीं है चुरायी।
अब हम ही कर रहे
इसकी भरपायी।
अक्सर, एसी से लग रही आग।
जान दे कर चुका रहे,
एसी से जो रखा इतना अनुराग ।
कृत्रिम ठंढक ओजोन लेयर में कर रही छेद ।
फिर, भी हम नही समझ रहे ये भेद ।
तनिक सुख के लिए,
सुरक्षा करते दरकिनार
और जब शॉट – सर्किट हो
तो, जिंदा जले पूरा परिवार ।
समय रहते गर,
हम न हुए सचेत ।
तो, काल के ग्रास में
समाएंगे अचेत ।
परिणीता स्वयंसिद्धा
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