हिंदी विवेक
  • Login
  • परिचय
  • संपादकीय
  • पूर्वांक
  • ग्रंथ
  • पुस्तक
  • संघ
  • देश-विदेश
  • पर्यावरण
  • संपर्क
  • पंजीकरण
No Result
View All Result
  • परिचय
  • संपादकीय
  • पूर्वांक
  • ग्रंथ
  • पुस्तक
  • संघ
  • देश-विदेश
  • पर्यावरण
  • संपर्क
  • पंजीकरण
No Result
View All Result
हिंदी विवेक
No Result
View All Result
4 जुलाई: सहकारिता दिवस विशेष

4 जुलाई: सहकारिता दिवस विशेष

विश्व को सहकारिता का मार्ग दिखाने वाला भारत

by हिंदी विवेक
in दिनविशेष
0

भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि एक ऐसी जीवन दृष्टि है जिसने मानव समाज को साथ मिलकर जीने की कला सिखाई है। भारतीय चिंतन में व्यक्ति की उन्नति समाज से अलग नहीं, बल्कि समाज के साथ जुड़कर मानी गई है। इसलिए यहां प्रतिस्पर्धा से अधिक सहयोग, संघर्ष से अधिक समन्वय और स्वार्थ से अधिक लोकमंगल को महत्व दिया गया। जब विश्व की अनेक सभ्यताएं शक्ति, विस्तार और वर्चस्व की ओर अग्रसर थीं, तब भारत के ऋषि वेदों में ‘संगच्छध्वं संवदध्वं’ का मंत्र देकर मानवता को साथ चलने, साथ सोचने और साथ मिलकर सृजन करने का संदेश दे रहे थे।

सहकारिता का सबसे प्राचीन और सुव्यवस्थित दर्शन भारत ने विश्व को दिया, तो यह केवल भावनात्मक कथन नहीं, बल्कि वैदिक साहित्य से प्रमाणित तथ्य है। भारतीय मनीषियों ने हजारों वर्ष पूर्व ही यह समझ लिया था कि व्यक्ति, समाज और राष्ट्र की उन्नति अलग-अलग प्रयासों से नहीं, बल्कि सामूहिक सहभागिता और समन्वय से संभव है।

यही कारण है कि वेदों और उपनिषदों में बार-बार एक साथ चलने, एक साथ विचार करने और एक दूसरे के कल्याण के लिए कार्य करने का संदेश मिलता है। ऋग्वेद के दसवें मंडल का प्रसिद्ध मंत्र इस भावना की सबसे सशक्त अभिव्यक्ति है।

सङ्गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
देवा भागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते॥ (ऋग्वेद 10.191.2)

अर्थात तुम सब मिलकर चलो, मिलकर विचार करो और तुम्हारे मन एक समान हों, जैसे प्राचीन काल के देवता परस्पर सहयोग से अपने कर्तव्यों का पालन करते थे।

हिंदी समाचार, हिंदी न्यूज़, ताजा ख़बरें

यह मंत्र केवल धार्मिक अनुष्ठानों का भाग नहीं है। यह समाज विज्ञान, शासन व्यवस्था और सामुदायिक जीवन का एक मौलिक सिद्धांत प्रस्तुत करता है। इसमें सहकारिता का आधार केवल कार्य विभाजन नहीं, बल्कि विचारों की एकता और साझा उत्तरदायित्व है। आधुनिक लोकतंत्र, सहभागी शासन और सहकारी संस्थाओं का मूल दर्शन भी इसी भावना पर आधारित दिखाई देता है कि सामूहिक निर्णय और साझा प्रयास व्यक्तिगत प्रयासों की तुलना में अधिक प्रभावी होते हैं। इसी सूक्त का अगला मंत्र इस विचार को और अधिक स्पष्ट करता है।

समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति॥ (ऋग्वेद 10.191.4)

अर्थात, तुम्हारा संकल्प एक हो, तुम्हारे हृदय एक हों और तुम्हारे मन समान हों, जिससे तुम परस्पर मिलकर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर सको।
यहां केवल संगठन की बात नहीं की गई है, बल्कि मानसिक और भावनात्मक एकता पर भी बल दिया गया है। किसी भी सहकारी व्यवस्था की सफलता केवल नियमों से नहीं, बल्कि विश्वास, पारदर्शिता और साझा उद्देश्य से सुनिश्चित होती है। यही कारण है कि आज भी सफल सहकारी संस्थाओं का आधार आपसी विश्वास और सामूहिक निर्णय को माना जाता है।

भारतीय संस्कृति में सहकारिता का विस्तार केवल परिवार या ग्राम तक सीमित नहीं रहा। उपनिषदों ने इसे समस्त मानवता तक विस्तृत कर दिया। महोपनिषद का प्रसिद्ध वाक्य विश्व बंधुत्व की ऐसी घोषणा है, जिसकी प्रासंगिकता आज पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है।

अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥

अर्थात, यह अपना है और यह पराया है, ऐसा विचार संकीर्ण मन वालों का होता है। उदार हृदय वाले लोगों के लिए तो पूरी पृथ्वी ही एक परिवार है।
यह केवल एक नैतिक उपदेश नहीं, बल्कि वैश्विक सहकारिता का भारतीय दर्शन है। आज जलवायु परिवर्तन, महामारी, ऊर्जा संकट, खाद्य सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय शांति जैसे विषय किसी एक राष्ट्र की सीमा में नहीं सिमटते। इन चुनौतियों का समाधान तभी संभव है जब विश्व एक परिवार की भावना से मिलकर कार्य करे। भारत द्वारा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बार-बार “वसुधैव कुटुम्बकम्” का उल्लेख इसी सांस्कृतिक विरासत का आधुनिक रूप है। इसी प्रकार तैत्तिरीय उपनिषद का प्रसिद्ध शांति मंत्र सहकारिता को शिक्षा और ज्ञान के क्षेत्र में स्थापित करता है।

सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥

अर्थात, हम दोनों की साथ-साथ रक्षा हो, हमारा साथ-साथ पालन हो, हम मिलकर परिश्रम करें, हमारा अध्ययन तेजस्वी बने और हमारे बीच कभी द्वेष उत्पन्न न हो।

इस मंत्र की भावना किसी भी साझेदारी की सफलता के मूल सिद्धांत प्रस्तुत करती है। संरक्षण, सहभागिता, संयुक्त परिश्रम और परस्पर सम्मान, ये चारों तत्व किसी भी सहकारी संगठन, संस्था या राष्ट्र के स्थायी विकास के लिए अनिवार्य हैं। भारतीय प्रार्थना परंपरा में एक और अत्यंत प्रसिद्ध मंगलकामना है, जो समस्त प्राणिमात्र के कल्याण की भावना व्यक्त करती है।

सर्वे भवन्तु सुखिनः। सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु। मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥

अर्थात, सभी सुखी हों, सभी निरोग हों, सभी का कल्याण हो और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े।

यह प्रार्थना भारतीय चिंतन की उस व्यापक दृष्टि को व्यक्त करती है जिसमें किसी एक वर्ग, जाति, राष्ट्र या समुदाय के कल्याण की नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता और समस्त जीव जगत के मंगल की कामना की गई है। सहकारिता का सर्वोच्च आदर्श भी यही है कि विकास और समृद्धि कुछ लोगों तक सीमित न रहे, बल्कि उसका लाभ सभी तक पहुंचे।

इन वैदिक और उपनिषदिक मंत्रों से स्पष्ट होता है कि भारत में सहकारिता केवल आर्थिक व्यवस्था का साधन नहीं रही, बल्कि यह एक जीवन मूल्य, सामाजिक अनुशासन और आध्यात्मिक दर्शन का अभिन्न अंग रही है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में सहकारिता की परंपरा परिवार से लेकर ग्राम, ग्राम से लेकर जनपद और जनपद से लेकर संपूर्ण विश्व तक विस्तृत दिखाई देती है। आधुनिक सहकारी आंदोलन ने जिस सिद्धांत को उन्नीसवीं शताब्दी में संस्थागत रूप दिया, उसका वैचारिक बीजारोपण भारतीय मनीषा हजारों वर्ष पहले ही कर चुकी थी।

वैदिक काल के बाद भी भारतीय समाज ने सहकार के सिद्धांत को व्यावहारिक जीवन में उतारा। प्राचीन भारत में श्रेणी व्यवस्था प्रचलित थी, जो आज के सहकारी समितियों जैसी संस्था थी। कारीगर, व्यापारी और किसान अपनी-अपनी श्रेणियाँ बनाकर सामूहिक रूप से उत्पादन, व्यापार और वितरण का कार्य करते थे। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में इन श्रेणियों के नियमन और संरक्षण का विस्तृत वर्णन मिलता है।

गाँवों में पंचायत व्यवस्था स्वयं सहकारिता का सजीव उदाहरण थी, जहाँ जल प्रबंधन, भूमि उपयोग और विवाद निवारण सामूहिक निर्णय से होता था। तालाबों और सिंचाई व्यवस्था का निर्माण और रखरखाव भी सामुदायिक श्रम से होता था, जिसे आज हम श्रमदान के रूप में जानते हैं।

भारत की सहकारिता की भावना किसी राजनीतिक रणनीति से नहीं उपजी, बल्कि यह उसकी सांस्कृतिक चेतना का स्वाभाविक विस्तार है। ऋग्वेद के सङ्गच्छध्वं से लेकर महोपनिषद के वसुधैव कुटुम्बकम तक, और तैत्तिरीय उपनिषद के सह नाववतु से लेकर आज के अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन तक, एक ही धारा प्रवाहित होती दिखाई देती है।

– आचार्य ललित मुनि

Share this:

  • Share on X (Opens in new window) X
  • Share on Facebook (Opens in new window) Facebook
  • Share on LinkedIn (Opens in new window) LinkedIn
  • Share on Telegram (Opens in new window) Telegram
  • Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp

हिंदी विवेक

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

हिंदी विवेक पंजीयन : यहां आप हिंदी विवेक पत्रिका का पंजीयन शुल्क ऑनलाइन अदा कर सकते हैं..

Facebook Youtube Instagram

समाचार

  • मुख्य खबरे
  • मुख्य खबरे
  • राष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • क्राइम

लोकसभा चुनाव

  • मुख्य खबरे
  • मुख्य खबरे
  • राष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • क्राइम

लाइफ स्टाइल

  • मुख्य खबरे
  • मुख्य खबरे
  • राष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • क्राइम

ज्योतिष

  • मुख्य खबरे
  • मुख्य खबरे
  • राष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • क्राइम

Copyright 2024, hindivivek.com

Facebook X-twitter Instagram Youtube Whatsapp
  • परिचय
  • संपादकीय
  • पूर्वाक
  • देश-विदेश
  • पर्यावरण
  • संपर्क
  • पंजीकरण
  • Privacy Policy
  • Terms and Conditions
  • Disclaimer
  • Shipping Policy
  • Refund and Cancellation Policy

copyright @ hindivivek.org by Hindustan Prakashan Sanstha

Welcome Back!

Login to your account below

Forgotten Password?

Retrieve your password

Please enter your username or email address to reset your password.

Log In

Add New Playlist

No Result
View All Result
  • परिचय
  • संपादकीय
  • पूर्वांक
  • ग्रंथ
  • पुस्तक
  • संघ
  • देश-विदेश
  • पर्यावरण
  • संपर्क
  • पंजीकरण

© 2024, Vivek Samuh - All Rights Reserved

0