राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में मिलने वाले संस्कार केवल शाखा के मैदान तक सीमित नहीं रहते। प्रार्थना, व्यायाम, खेल, बौद्धिक और अनुशासन के माध्यम से पैदा होने वाला स्नेह स्वयंसेवकों के मन में जीवनभर बना रहता है। समय आगे बढ़ता है, लोग अलग-अलग दिशाओं में चले जाते हैं, उनका निवास स्थान बदल जाता है; लेकिन संघ से जुड़े दिल कभी अलग नहीं होते। अंधेरी पूर्व के पुराने स्वयंसेवकों का हाल ही में कोकण में हुआ स्नेह मिलन संघ संस्कारों का ऐसा ही सुंदर और हृदयस्पर्शी उदाहरण बन गया।
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अंधेरी पूर्व, विशेष रूप से सहार क्षेत्र में संघ कार्य बढ़ाने में चार वरिष्ठ स्वयंसेवकों का बड़ा योगदान रहा है, श्री अशोक तेंडोलकर, श्री गणपत रहाटे, श्री केशवराव काजरेकर और श्री सुधाकर बारसोडे। उनके सान्निध्य और मार्गदर्शन में सहार क्षेत्र के सैकड़ों स्वयंसेवक संघ से जुड़े, तैयार हुए और समाज जीवन में सकारात्मक योगदान देने लगे।


इनमें से एक मार्गदर्शक व्यक्ति अशोक तेंडोलकर लगभग बीस वर्ष पहले कोकण के अपने गांव तेंडोली में जाकर बस गए। वृद्ध मां का साथ देने और उनकी सेवा करने के साथ-साथ उन्होंने पुश्तैनी सुपारी की बाग संभालने की जिम्मेदारी भी स्वीकार की। वे मुंबई से दूर चले गए, लेकिन अंधेरी के पुराने स्वयंसेवकों के मन से वे कभी दूर नहीं हुए।
समय के साथ अंधेरी छोड़कर कई स्वयंसेवक अलग-अलग स्थानों पर जाकर बस गए। लेकिन पुरानी यादों ने उन्हें फिर एक साथ ला दिया। दो वर्ष पहले सहार क्षेत्र के स्वयंसेवकों का स्नेह सम्मेलन हुआ था। उस समय कई वर्षों बाद एक-दूसरे से मिलने की खुशी हर किसी के चेहरे पर दिखाई दे रही थी। पुरानी यादों और लंबी बातचीत के बीच बार-बार एक नाम सामने आ रहा था… अशोकजी तेंडोलकर।

अशोकजी की बीमार मां को छोड़कर मुंबई आना संभव नहीं था। इसलिए उन्हें मिलने के लिए हम स्वयंसेवक ही कोकण जाएं, यह विचार सामने आया। लेकिन काम की व्यस्तता के कारण यह योजना कुछ समय के लिए टल गई। इसके बाद दो और स्नेह सम्मेलन हुए। हर बार अशोकजी की याद आई और
कोकण जाने की बात हुई। आखिरकार वह अवसर आ ही गया।
उमेश राणे और मिलिंद जोशी एक बार नरेश खराडे के तारकर्ली स्थित घर पर मिलने गए थे। उसी समय अशोकजी के तेंडोली स्थित घर जाने का तय हुआ। लगभग 35 किलोमीटर का सफर करके उनसे मिलने पहुंचे। प्राकृतिक सुंदरता से भरा उनका घर, उनका सरल जीवन और हमें देखते ही उनके चेहरे पर आई खुशी, इन सबने मन को भर दिया।
उस मुलाकात में तीनों के मन में एक विचार आया, यदि हम तीन लोग जाकर अशोकजी से मिल सकते हैं, तो जिन स्वयंसेवकों ने वर्षों तक उनके साथ संघ कार्य किया है, वे सभी एक साथ आएं तो अशोकजी को कितना आनंद होगा! और यह विचार धीरे-धीरे वास्तविक रूप लेने लगा।
“अंधेरी पुराने स्वयंसेवक” नाम के स्वयंसेवकों के व्हॉट्सऐप समूह में कोकण में स्नेह मिलन का संदेश दिया गया। गणपत रहाटे, केशवराव काजरेकर, सुधाकरराव बारसोडे और वरिष्ठ प्रचारक रमेश देसाई की उपस्थिति में 21 से 23 अगस्त के बीच यह स्नेह यात्रा करने का तय हुआ। संदेश जाते ही अनेक स्वयंसेवकों ने उत्साहपूर्वक अपनी सहमति दी। मुंबई से 16 लोग और पुणे से किशोर बडेकर तथा रमेश देसाई, इस प्रकार कुल 18 स्वयंसेवक इस यात्रा में शामिल हुए।

21 अगस्त की सुबह 6.30 बजे अंधेरी की आशीर्वाद बिल्डिंग के नीचे सभी लोग जमा होने लगे। कई वर्षों बाद स्वयंसेवक एक-दूसरे से मिल रहे थे। एक-दूसरे से मिलते समय ऐसा लग रहा था जैसे वर्षों की दूरी कुछ ही क्षणों में समाप्त हो गई हो। विशेष बात यह थी कि स्वास्थ्य ठीक नहीं होने के बावजूद केशवराव काजरेकर इतने लंबे सफर के लिए आए थे। सभी के मन में एक ही उत्सुकता थी, अशोकजी से कब मिलेंगे! “गणपति बाप्पा मोरया” के जयघोष के साथ कोकण यात्रा शुरू हुई।

यात्रा में कुछ बाधाएं भी आईं।
वडखल-नागोठणे क्षेत्र में बस का टायर फट गया। टायर बदलने और स्टेपनी की व्यवस्था करने में लगभग तीन घंटे लग गए। इसके बाद फिर एक बार टायर की समस्या आई। इसलिए निर्धारित समय से काफी देर हो गई। लेकिन इस देरी से यात्रा का उत्साह कम नहीं हुआ। उलटे हाईवे पर उतरकर सभी ने बातचीत, पुरानी यादों और मजाक-मस्ती में उस घटना को भी स्नेह का हिस्सा बना दिया।
चिपलून-आरवली के पास पार्ले के पुराने सहयोगी उदय बोडस को फोन किया गया। जब उन्हें पता चला कि हम अशोकजी से मिलने जा रहे हैं, तो पैर में चोट होने के कारण परेशानी के बावजूद वे अण्णा बेलवलकर को साथ लेकर कार से बस से आगे निकल गए और अशोक तेंडोलकर से मिलने पहुंच गए। आखिर यह कौन-सा संबंध था, जो इतने वर्षों बाद भी सभी को एक-दूसरे की ओर खींच रहा था? वह संबंध था संघ संस्कारों का… संघ के भाईचारे का।
रात लगभग बारह बजे सभी नरेश खराडे के गांव उनके घर तारकर्ली पहुंचे। अशोकजी बेसब्री से हमारी प्रतीक्षा करते हुए दरवाजे पर खड़े थे। मुलाकात होते ही कई लोगों ने उन्हें गले से लगा लिया। इतने वर्षों की दूरी उस एक आलिंगन में जैसे समाप्त हो गई। और अपनी हमेशा की आदत के अनुसार अशोकजी तुरंत सभी की व्यवस्था में लग गए।

अगले दिन सुबह तारकर्ली समुद्र तट पर प्रभात शाखा लगी। व्यायाम, योग, खेल और प्रार्थना से पूरा वातावरण आनंदमय हो गया। शाखा शुरू होने के दौरान अचानक आई बारिश की फुहारों ने सभी के भीतर का बचपन फिर से जगा दिया। स्वयंसेवकों ने समुद्र किनारे वही पुराने संघ के खेल खेले और गोल घेरा बनाकर नाचे। उस समय उम्र की सारी सीमाएं जैसे समाप्त हो गई थीं।
इसके बाद मालवण के राजकोट जाकर छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा का दर्शन किया गया। ज्योतिर्भास्कर जयंत साळगावकर द्वारा निर्मित स्वर्ण गणपति मंदिर के भी दर्शन किए गए।
अगले दिन तेंडोली में अशोकजी के घर जाने का अवसर मिला। प्रकृति की गोद में बसा उनका घर सादगी, अपनापन और ग्रामीण जीवन का सुंदर अनुभव दे रहा था। अशोकजी ने गांव की महिलाओं को बुलाकर कोकणी वड़े और भोजन की तैयारी करवाई थी। भाभी भी भोजन की व्यवस्था में व्यस्त थीं।
सभी पंगत में बैठे। भोजन मंत्र हुआ और अशोकजी स्वयं प्रत्येक व्यक्ति को प्रेम से भोजन परोसने लगे। उस भोजन में केवल अन्न नहीं था; उसमें वर्षों पुराने स्नेह का स्वाद था। विदा लेते समय अशोकजी ने सभी को गांव की याद के रूप में नारियल की बर्फी दी। उपहार छोटा था, लेकिन उसके पीछे की भावना अमूल्य थी।
वापसी के रास्ते में जांभवडे गांव में काजरेकर परिवार के लगभग ढाई सौ वर्ष पुराने घर पर भी गए। वहां परिवार के बुजुर्ग भाई-भाभी से प्रेमपूर्वक मुलाकात हुई। पुराने घर की दीवारों में इतिहास था और उस घर के अपनत्व में संघ जीवन का वही स्नेह महसूस हो रहा था। पूरी यात्रा को देखते हुए महसूस होता है कि यह केवल “पुराने मित्रों की यात्रा” नहीं थी। यह कृतज्ञता की यात्रा थी। यह यादों से फिर मिलने की यात्रा थी। यह संस्कारों को नमन करने की यात्रा थी।
संघ की शाखा में वर्षों पहले हुई मित्रता समय, दूरी और परिस्थितियों से आगे बढ़कर आज भी कायम थी। अशोकराव तेंडोलकर जैसे वरिष्ठ स्वयंसेवकों ने एक पीढ़ी को तैयार किया और उस पीढ़ी ने उन्हें कभी भुलाया नहीं। बल्कि उनके कार्य को मन में याद रखते हुए उनसे मिलने के लिए सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा की।
संघ कार्य की वास्तविक सफलता शायद इसी में है। शाखा समाप्त हो जाती है, लेकिन संस्कार समाप्त नहीं होते; स्वयंसेवक दूर चला जाता है, लेकिन स्नेह दूर नहीं होता; समय बदलता है, लेकिन संघ भावना मन में हमेशा बनी रहती है।
अंधेरी से शुरू होकर नरेश खराडे के घर तारकर्ली और वहां से तेंडोली तक हुई यह यात्रा केवल भौगोलिक यात्रा नहीं थी। यह संघ संस्कारों की सुगंध से भरी यात्रा थी। एक पीढ़ी द्वारा दूसरी पीढ़ी को दिए गए संस्कारों, कृतज्ञता और रिश्तों को संभालकर रखने की भारतीय स्नेह परंपरा की यह यात्रा थी।
आने वाले समय में अनेक स्वयंसेवक अलग-अलग स्थानों पर जाएंगे, नई पीढ़ी संघ कार्य करेगी; लेकिन ऐसे स्नेह मिलनों के माध्यम से एक संदेश निश्चित रूप से आगे जाता रहेगा, “लोग दूर चले जाते हैं, शाखाएं बदल जाती हैं, समय बदल जाता है; लेकिन संस्कारों से जुड़े दिल कभी दूर नहीं होते।”
| यात्रा में सहभागी स्वयंसेवक
श्री. केशव काजरेकर |
:-उमेश राणे
