शिकागो में स्वामी विवेकानंद का सर्वधर्म परिषद में ऐतिहासिक भाषण हुआ था। भारत में इस भाषण का परिणाम हिंदू समाज की चेतना जागृत होने के रूप में हुआ। न्यूयॉर्क के प्रसिद्ध मैडिसन स्क्वायर गार्डन स्थित इन्फोसिस थिएटर में आयोजित ‘युनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन’ और ‘वन वर्ल्ड, वन ह्युमॅनिटी’ परिषद के मंच से २९ अगस्त २०२६ को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पू. सरसंघचालक डॉ. मोहनजी भागवत ने भाषण दिया। उनका यह भाषण भी ऐतिहासिक साबित हुआ। विवेकानंद के भाषण से हिंदू चेतना जागृत हुई, तो मोहनजी के भाषण से विश्व मानव चेतना की यात्रा प्रारंभ हुई, ऐसा कहने में कोई हर्ज नहीं है। जब स्वामी विवेकानंद अमेरिका गए, तब भारत का हिंदू सोया हुआ था। मोहनजी भागवत जागृत हिंदू के प्रतिनिधि के रूप में अमेरिका गए।
विवेकानंद अकेले थे। मोहनजी भागवत विश्व की सबसे बड़ी स्वयंसेवी संस्था के सरसंघचालक हैं। वे एक शक्ति-स्थान पर हैं। उनका भाषण जहाँ एक व्यक्ति का भाषण है, वहीं वह एक शक्ति का प्रकटीकरण भी है।

मोहनजी का भाषण स्वामी विवेकानंद के १८९३ के भाषण का कालानुकूल विस्तार है। स्वामीजी ने अपने भाषण में सर्वधर्म समानता का एक विषय रखा और ‘महिम्न स्तोत्र’ के ‘रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिल नानापथजुषां नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव’ इस श्लोक को उद्धृत किया। मोहनजी ने भी अपने भाषण में यही श्लोक उद्धृत किया है। मोहनजी का भाषण कई दृष्टियों से ऐतिहासिक है। उनमें पहला विषय यह है कि उन्होंने विश्व मंच से भारत की जन्म-परंपरा (जन्मध्येय) पर विचार किया। प्रत्येक राष्ट्र का एक जीवन-लक्ष्य होता है। भारत का जीवन-लक्ष्य विश्वमानव को मानवधर्म की शिक्षा देना है। मोहनजी ने ‘भद्रं इच्छन्तः ऋषयः स्वर्विदः, तपो दीक्षां उपसेदुः अग्रे, ततो राष्ट्र बलं ओजश्च जातम्, तदस्मै देवा उपसं नमन्तु’ यह श्लोक उद्धृत किया। इसका भावार्थ यह है : ‘राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया तथा राष्ट्रीय सामर्थ्य और चैतन्य का प्रकटीकरण, सृष्टि के आरंभ में ही आत्मज्ञानी ऋषियों ने विश्व के कल्याण की उदात्त भावना से किए गए तपस्या से उत्पन्न हुआ है। इसलिए, प्रत्येक को नम्रता से इस राष्ट्र की सेवा करनी चाहिए।’
मोहनजी के भाषण के लिए अमेरिका के सभी धर्मों के नेता, संघ के स्वयंसेवक, उनके परिवार और स्थानीय नागरिक एकत्र हुए थे। वहाँ के अनिवासी भारतीयों को संबोधित करते हुए उन्होंने एक अत्यंत महत्वपूर्ण संदेश दिया। उन्होंने कहा कि आप सब की कर्मभूमि अमेरिका है। इसलिए आपको अमेरिका के हित का ही विचार करना चाहिए। भारत आपकी जन्मभूमि है और उसके प्रति आपके मन में आदर-भाव है, फिर भी आपको कर्मभूमि के प्रति एकनिष्ठ रहना चाहिए – उनके कथन का यही तात्पर्य था। भारत की आपसे यही अपेक्षा है। इस अपेक्षा को पूरा करने के लिए भारत का जीवन-लक्ष्य क्या है, यह जानना आवश्यक है।
भारत की विशेषता ‘विविधता में एकता’ है। भारत में हर प्रकार की विविधता है, किंतु अंतरिक एकता का सूत्र सबको एक बाँधे रखता है। हम इस विविधता को लेकर जीते हैं। विश्व में भी मानव-समूह हैं, उनमें भिन्नता है। परंतु मानव होने के नाते हम सब एक हैं। इसी विविधता के कारण एकता सुशोभित होती है। हम सबको इस भारतीय विचार को जीना चाहिए। सबके प्रति स्नेह रखना चाहिए। दुष्ट प्रवृत्ति के मनुष्य की दुष्ट प्रवृत्ति नष्ट हो, इसके लिए हम प्रार्थना करते हैं, मनुष्य नष्ट हो– ऐसी हमारी प्रवृत्ति नहीं है। एक भारतीय होने के नाते हमें इस विचार को व्यावहारिक जीवन में उतारना चाहिए। भारत की आपसे यही अपेक्षा है।
मोहनजी ने अपने भाषण में विश्वमानव के समक्ष मौजूद समस्याओं को छुआ। एक-दूसरे से द्वेष करके जीने में मानवता नहीं है। मनुष्य विचारशील प्राणी है, उसे उचित-अनुचित का ज्ञान है। मानवों के बीच एकता की खोज करना सही दिशा है। आपस में संघर्ष करते रहना गलत विचार है। हम कितनी संपत्ति अर्जित करते हैं, यह जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि हम कितना दान करते हैं। अपने करियर के बारे में सोचना ठीक है, पर करियर का मतलब केवल पैसा कमाना नहीं है। दूसरे के बारे में सोचना, दूसरे के सुख-दुख में भागीदार होना उतना ही महत्वपूर्ण है।
संघ के बारे में राजनीतिक स्वार्थ के लिए कई भ्रम फैलाए जाते हैं। उनमें एक भ्रम यह है कि संघ की शक्ति बढ़ने पर मुसलमान असुरक्षित हो जाएँगे। भारत में मोहनजी इस भ्रम का कई बार जवाब दे चुके हैं। न्यूयॉर्क के भाषण में भी उन्होंने कहा, “अगर किसी हिंदू को लगता है कि भारत में एक भी मुसलमान नहीं रहना चाहिए, तो वह व्यक्ति हिंदू नहीं हो सकता।

” मोहनजी का यह कथन संघ को गालियाँ देने वालों की नींद उड़ाने वाला है। उन्हें इसे पचाना बहुत कठिन है। इसलिए वे इसके व्यंग्यात्मक अर्थ निकालकर कथानक रचने का व्यवसाय बंद करेंगे, ऐसा नहीं है। भारत की सनातन वैचारिक भूमिका यह है कि मानव-जाति एक है। धर्म अलग-अलग हैं, किंतु अंतिम सत्य एक ही है और उस तक पहुँचने के मार्ग अलग-अलग हैं। सभी मार्ग सत्य हैं। स्वामी विवेकानंद की इस वाणी को मोहनजी ने आज के संदर्भ में पुनः उद्घाटित किया।
अमेरिका के स्वतंत्रता-घोषणापत्र में ‘जीवन, स्वतंत्रता और सुख की खोज’ शब्द हैं। प्रश्न यह उठता है कि सुख किसमें है? इंद्रियों के भोगों को पूरा करना ही सुख है या उससे परे भी कुछ सुख है? हमारा सनातन विचार भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति में चिरंतन सुख नहीं मानता। पसंदीदा पदार्थ खाकर उस क्षण तक सुख मिलता है, परंतु उस पदार्थ को खाने की इच्छा कभी समाप्त नहीं होती।
स्थायी सुख देने की शक्ति भौतिक पदार्थों में नहीं है। मानसिक सुख के लिए अध्यात्म की आवश्यकता है और इस आवश्यकता को भारत पूरा कर सकता है। अमेरिका को ‘भोगभूमि’ कहा जाता है। वहाँ भौतिक सुख की भरमार है। ऐसी भूमि में यह न समझें कि भौतिक सुख ही अंतिम सुख है, उससे परे मानव के साथ उसकी विविधता सहित एकरूप होना ही सच्चा सुख है– यह बात मोहनजी ने कही।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचार को लें तो ‘हिंदू राष्ट्र के जीवन-लक्ष्य का क्रमबद्ध विकास ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है’– ऐसी परिभाषा एक वरिष्ठ कार्यकर्ता ने दी। इस जीवन-लक्ष्य के क्रमबद्ध विकास-क्रम में न्यूयॉर्क का यह कार्यक्रम एक ऐतिहासिक पड़ाव है। पूजनीय डॉक्टर हेडगेवार ने जब संघ की स्थापना की, तब उन्होंने इस विचार का बीजारोपण किया। वह बीज आगे चलकर पौधा बना। धीरे-धीरे बढ़कर वह वृक्ष हुआ और उसकी शाखाएँ अब पूरी दुनिया में फैल गई हैं। भारतीय समाज-जीवन और समाज की मानसिकता में पर्याप्त परिवर्तन हुआ है।
विभिन्न कार्यों के माध्यम से विविधता का निर्वाह करते हुए मानव-एकता के विचार को जीते हुए लाखों कार्यकर्ता आज काम कर रहे हैं। यह उनकी तपस्या है। इस तपस्या से एक सामर्थ्य का निर्माण हो रहा है और उस सामर्थ्य का प्रतिनिधित्व आज मोहनजी भागवत कर रहे हैं। इसलिए उनके शब्द भारत के वैश्विक लक्ष्य का बोध कराने वाले शब्द हैं। भारत के जीवन-लक्ष्य की यात्रा स्वामी विवेकानंद से शुरू हुई, ऐसा मानें तो मोहनजी के रूप में यह यात्रा अब एक निश्चित दिशा लेकर आगे बढ़ी है, ऐसा कहने में कोई हर्ज नहीं है।
– रमेश पतंगे

