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कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विस्तार से बढ़ती पर्यावरणीय चिंता

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विस्तार से बढ़ती पर्यावरणीय चिंता

by हिंदी विवेक
in पर्यावरण
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कृत्रिम बुद्धिमत्ता आज मानव जीवन के लगभग हर क्षेत्र में तेजी से प्रवेश कर रही है। शिक्षा, स्वास्थ्य, बैंकिंग, कृषि, उद्योग, प्रशासन, रक्षा और संचार से लेकर मनोरंजन तक इसके उपयोग का विस्तार हो रहा है। लेकिन कृत्रिम बुद्धिमत्ता की इस तेज रफ्तार के पीछे एक विशाल भौतिक ढांचा काम करता है, जिसे आंकड़ा केंद्र कहा जाता है। इन्हीं केंद्रों में बड़ी संख्या में संगणक, सर्वर और अन्य उपकरण चौबीसों घंटे चलते हैं, जहां विशाल मात्रा में आंकड़ों का संग्रह, प्रसंस्करण और आदान प्रदान होता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते उपयोग के साथ दुनिया भर में ऐसे केंद्रों की संख्या और क्षमता तेजी से बढ़ रही है। इसके साथ ही भूमि, बिजली, पानी और पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर वैश्विक बहस भी तेज हो गई है।

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भारत इस बदलाव का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनकर उभर रहा है। देश में आंकड़ा केंद्रों की स्थापित क्षमता वर्ष 2020 में लगभग 520 मेगावाट थी, जो वर्ष 2025 के मध्य तक लगभग 1.5 गीगावाट पहुंच गई। विभिन्न आकलनों के अनुसार वर्ष 2030 तक यह क्षमता लगभग 4.5 से 6.5 गीगावाट तक पहुंच सकती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल सेवाओं के विस्तार और देश में आंकड़ों को सुरक्षित रखने की बढ़ती आवश्यकता इसके प्रमुख कारण हैं। ऊर्जा, पर्यावरण और जल परिषद के एक अध्ययन के अनुसार भारत में आंकड़ा केंद्रों में वर्ष 2025 के दौरान लगभग 150 अरब लीटर पानी के वार्षिक उपयोग का अनुमान है और वर्ष 2030 तक यह मात्रा दोगुने से अधिक हो सकती है।

आंकड़ा केंद्रों के विस्तार का एक महत्वपूर्ण पहलू भूमि की आवश्यकता है। बड़े कृत्रिम बुद्धिमत्ता केंद्रों के लिए विशाल भवनों, विद्युत उपकेंद्रों, शीतलन प्रणालियों और सहायक सुविधाओं की जरूरत होती है। इसका अर्थ है कि ऐसे केंद्रों के लिए पर्याप्त भूमि का चयन करना होगा। भूमि यदि पहले से विकसित औद्योगिक क्षेत्रों में उपलब्ध हो तो समस्या कुछ कम हो सकती है, लेकिन जब कृषि भूमि, जलस्रोतों के आसपास के क्षेत्र या ग्रामीण इलाकों का उपयोग किया जाता है तो स्थानीय लोगों की आजीविका और पर्यावरण से जुड़े प्रश्न सामने आते हैं। भारत में कुछ प्रस्तावित परियोजनाओं को लेकर भूमि अधिग्रहण और संसाधनों पर संभावित दबाव की चिंताएं सामने आ चुकी हैं।

पानी इस बहस का सबसे संवेदनशील पक्ष बनता जा रहा है। आंकड़ा केंद्रों में बड़ी संख्या में उपकरण लगातार काम करते हैं और उनसे अत्यधिक ऊष्मा उत्पन्न होती है। उपकरणों को सुरक्षित तापमान पर रखने के लिए शीतलन व्यवस्था आवश्यक होती है। कुछ शीतलन प्रणालियों में पानी की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ऐसे में जिस क्षेत्र में पहले से ही जल संकट हो, वहां विशाल आंकड़ा केंद्र स्थापित करने से स्थानीय जल उपलब्धता पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। भारत में स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश के अनेक हिस्से पहले से भूजल के गिरते स्तर और अनियमित वर्षा जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। विश्व संसाधन संस्थान के अनुसार भारत के आधे से अधिक आंकड़ा केंद्र ऐसे क्षेत्रों में स्थित हैं जहां जल संकट का स्तर चिंताजनक है।

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यह स्थिति केवल भारत की समस्या नहीं है। दुनिया के अनेक देशों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित आंकड़ा केंद्रों के लिए बिजली और पानी की मांग तेजी से बढ़ रही है। संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय से जुड़े शोध के आधार पर प्रकाशित विश्लेषणों में अनुमान लगाया गया है कि वर्ष 2030 तक कृत्रिम बुद्धिमत्ता से संबंधित आंकड़ा केंद्रों की बिजली और पानी की खपत वर्तमान स्तर की तुलना में काफी बढ़ सकती है। अध्ययन यह भी रेखांकित करता है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के पर्यावरणीय प्रभाव को केवल कार्बन उत्सर्जन के आधार पर नहीं समझा जा सकता। भूमि और जल की खपत को भी समान महत्व देना आवश्यक है।

बिजली की मांग भी इस पूरी व्यवस्था की बड़ी चुनौती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के लिए सामान्य डिजिटल सेवाओं की तुलना में कहीं अधिक संगणन क्षमता की आवश्यकता हो सकती है। हजारों उपकरणों को लगातार चलाने और उन्हें ठंडा रखने के लिए भारी मात्रा में बिजली चाहिए। यदि यह बिजली कोयला या अन्य जीवाश्म ईंधन आधारित स्रोतों से आती है तो आंकड़ा केंद्रों का अप्रत्यक्ष कार्बन उत्सर्जन बढ़ सकता है। इसलिए दुनिया में अब यह चर्चा तेज हो रही है कि आंकड़ा केंद्रों को अधिक से अधिक नवीकरणीय ऊर्जा से जोड़ा जाए। भारत के संदर्भ में भी सौर और पवन ऊर्जा के साथ ऊर्जा भंडारण व्यवस्था को जोड़कर आंकड़ा केंद्रों की बढ़ती मांग पूरी करने की संभावना पर विचार किया जा रहा है।

यूरोप ने इस दिशा में पारदर्शिता बढ़ाने का प्रयास शुरू किया है। यूरोपीय आयोग ने ऐसे आंकड़ा केंद्रों के लिए ऊर्जा और जल दक्षता से संबंधित जानकारी सार्वजनिक करने के नए नियम प्रस्तावित किए हैं जिनकी क्षमता कम से कम 500 किलोवाट है। प्रस्ताव का उद्देश्य यह जानना है कि कोई केंद्र कितनी ऊर्जा और पानी का उपयोग करता है तथा उसका स्थानीय जल संकट से क्या संबंध है। यूरोप में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विस्तार के कारण आंकड़ा केंद्रों की क्षमता में बड़ी वृद्धि की योजना है। इसलिए वहां संसाधनों के उपयोग की निगरानी को विकास की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।

भारत में भी सरकार ने इस विषय पर संसद में स्थिति स्पष्ट की है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अनुसार कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित आंकड़ा केंद्रों को अपने आप में पर्यावरणीय स्वीकृति की आवश्यकता नहीं होती, लेकिन यदि कोई परियोजना निर्धारित आकार वाले भवन एवं निर्माण अथवा बड़े क्षेत्र विकास की श्रेणी में आती है तो उसे पूर्व पर्यावरणीय स्वीकृति लेनी पड़ सकती है। ऐसी परियोजनाओं की जांच में विशेष रूप से जल की उपलब्धता, जल संकट वाले क्षेत्रों की स्थिति, जल संतुलन, उपयोग किए गए पानी से निकलने वाले अपशिष्ट जल और उसके पुनर्चक्रण जैसे पहलुओं पर विचार किया जाता है।

भारत के लिए चुनौती यह है कि डिजिटल विकास की जरूरत और प्राकृतिक संसाधनों की सीमाओं के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। आंकड़ा केंद्रों से निवेश आता है, रोजगार के अवसर पैदा होते हैं, डिजिटल सेवाओं का विस्तार होता है और देश की तकनीकी क्षमता मजबूत होती है। देश में आंकड़ों को सुरक्षित रखने से राष्ट्रीय डिजिटल स्वायत्तता को भी बल मिलता है।

इसलिए आंकड़ा केंद्रों के विस्तार को केवल पर्यावरणीय समस्या के रूप में देखना उचित नहीं होगा। दूसरी ओर, केवल निवेश और तकनीकी विकास को प्राथमिकता देकर भूमि, पानी और बिजली की वास्तविक सीमाओं की अनदेखी करना भी दीर्घकाल में नुकसानदेह हो सकता है।

सबसे आवश्यक है कि आंकड़ा केंद्र स्थापित करने से पहले स्थान का समग्र मूल्यांकन किया जाए। जहां जल संकट गंभीर हो वहां अत्यधिक पानी इस्तेमाल करने वाली शीतलन प्रणाली से बचना चाहिए। वर्षाजल संचयन, उपचारित जल का पुनः उपयोग और कम पानी वाली शीतलन तकनीकों को बढ़ावा दिया जा सकता है। इसी प्रकार ऐसी परियोजनाओं को उन क्षेत्रों में प्राथमिकता दी जा सकती है जहां नवीकरणीय ऊर्जा आसानी से उपलब्ध हो। भूमि चयन में कृषि भूमि और संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्रों की रक्षा के साथ स्थानीय समुदायों की भागीदारी भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।

नीतिगत स्तर पर केंद्र और राज्य सरकारों के बीच बेहतर समन्वय की भी आवश्यकता है। वर्तमान में भारत में आंकड़ा केंद्रों को आकर्षित करने के लिए कई राज्यों ने अपनी अलग नीतियां बनाई हैं। ऊर्जा, पर्यावरण और जल परिषद के अध्ययन के अनुसार 15 राज्यों ने आंकड़ा केंद्रों के लिए विशेष नीतियां या संबंधित औद्योगिक नीतियों का सहारा लिया है, लेकिन इनमें से केवल 5 राज्य नीतियों में स्थायित्व से जुड़े प्रावधान स्पष्ट रूप से शामिल हैं। इससे पता चलता है कि निवेश आकर्षित करने के साथ पर्यावरणीय मानकों को समान महत्व देने के लिए एक व्यापक राष्ट्रीय दृष्टिकोण की जरूरत है।

भविष्य की कृत्रिम बुद्धिमत्ता केवल अधिक शक्तिशाली संगणक बनाने की दौड़ नहीं होनी चाहिए। यह कम संसाधनों में अधिक काम करने वाली तकनीक विकसित करने की भी दौड़ होनी चाहिए। यदि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के लिए कम बिजली और कम पानी खर्च करने वाले उपकरण विकसित किए जाएं, शीतलन प्रणालियों को अधिक दक्ष बनाया जाए और नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग बढ़ाया जाए तो विकास और पर्यावरण के बीच बेहतर संतुलन संभव है।

आखिरकार आंकड़ा केंद्र आधुनिक डिजिटल व्यवस्था की आधारभूत संरचना हैं और आने वाले वर्षों में इनकी आवश्यकता बढ़ने वाली है। प्रश्न इनके निर्माण को रोकने का नहीं, बल्कि इन्हें किस स्थान पर, किस तकनीक से और किन पर्यावरणीय मानकों के साथ स्थापित किया जाए, इसका है। यदि भूमि, जल और ऊर्जा की उपलब्धता को ध्यान में रखकर योजनाएं बनाई गईं, स्थानीय लोगों की चिंताओं को सुना गया और संसाधनों के उपयोग में पारदर्शिता रखी गई तो कृत्रिम बुद्धिमत्ता भारत के आर्थिक और सामाजिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

लेकिन यदि तकनीकी विस्तार प्राकृतिक संसाधनों की कीमत पर हुआ तो आज की डिजिटल उपलब्धियां भविष्य की पर्यावरणीय चुनौतियों का कारण भी बन सकती हैं। इसलिए अब समय आ गया है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता की शक्ति के साथ प्रकृति की सीमाओं को भी समान गंभीरता से समझा जाए।

– महेन्द्र तिवारी

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