वर्ष 1975 से लेकर वर्ष 1995 तक मैं खेल विज्ञान से संबंधित कुछ ऐसी शोध परियोजनाओं से जुड़ा रहा जिनकी वजह से मुझे देश के उस समय के कुछ अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ियों से बातचीत के मौके मिले। आज मैं यहां सिर्फ उन खिलाड़ियों की चर्चा करूंगा जो उस दौरान दौड़ से जुड़े हुए थे। इनमें शिवनाथ सिंह, श्रीराम सिंह, गोपाल सेनी, आदिल सुमरिवाला, पी टी ऊषा और गीता जुत्सी के नाम उल्लेखनीय हैं।
इनमें दो ऐसे खिलाड़ी हैं जिनसे मेरी तब व्यक्तिगत बातचीत हुई जब वे पल्मोनरी फंक्शन टेस्टिंग यानी फेफड़ों की क्षमता की जांच के लिए मेरे पास आए थे। इनमें पहला नाम भारतीय सेना के लंबी दूरी के धावक स्वर्गीय श्री शिवनाथ सिंह ( 1946 – 2003 ) का है।
बिहार के बक्सर जिले में जन्मे शिवनाथ सिंह बीसवीं सदी के आठवें दशक में एशियाई और ओलिंपिक खेलों में 5000 और 10,000 मीटर की दौड़ में भारत का प्रतिनिधित्व करते रहे। उन्होंने मैराथन में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया। बहरहाल, जहां तक मुझे याद है वर्ष 1975 में दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल में आयोजित एशियन एथलैटिक्स चैंपियनशिप्स में भाग लेने से पहले वे हमारी प्रयोगशाला रक्षा शरीरक्रिया एवं संबद्ध विज्ञान संस्थान ( डिफेन्स इंस्टिट्यूट ऑफ फिजियोलॉजी एंड अलाइड साइंसेज ) में अपने फेफड़ों की क्षमता की जांच के लिए आये थे। उस दौरान रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) की यह प्रयोगशाला दिल्ली कैंट में स्थित थी और वर्ष 1997 में अपना स्थाई भवन बनने के बाद यह अब लखनऊ रोड, तिमारपुर, दिल्ली में अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन कर रही है।
खैर, बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि दिल्ली छावनी में वे रात जहां सोये थे, उस बैरक में रात भर उन्हें मच्छरों से जूझना पड़ा। उल्लेखनीय है कि यद्यपि उन्हें सियोल में आयोजित 5000 और 10,000 मीटर की दौड़, दोनों दोड़ों में रजत पदक मिला था, मेरा मानना है कि ऐसे खिलाड़ी कई बार स्वर्ण पदक पाने अथवा अपने उत्कृष्ट खेल प्रदर्शन से इसलिए चूक जाते हैं क्योंकि उन्हें अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए विभिन्न कारणों से वे सुविधाएं और प्राथमिकताएं नहीं मिलती है जो मानसिक थकावट से बचाव में मदद करती है।


दूसरे खिलाड़ी हैं वर्ष 1948 में जन्में श्रीराम सिंह। उनका जन्म राजस्थान के जयपुर जिले की कोटपूतली तहसील के बड़नगर गांव में हुआ था। ओनोररी कैप्टेन श्रीराम सिंह शेखावत 1970 के दशक में भारत के मध्यम दूरी के बेहतरीन धावक रहे। वर्ष 1974 और 1978 के एशियाई खेलों में 800 मीटर दौड़ में स्वर्ण पदक जीत कर इन्होंने देश को गौरवान्वित किया।
श्रीराम सिंह 1968 में राजपूताना राइफल्स में शामिल हुएथे, जहां वे कोच इलियास बाबर के प्रभाव में आए। बाबर ने उन्हें 400 मीटर के बजाय 800 मीटर दौड़ पर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रेरित किया।
गौरतलब है कि मोहम्मद इलियास बाबर (1926 – 2002) भारत के एक महान और प्रसिद्ध एथलेटिक्स कोच थे। उनका जन्म गुलबर्ग (अब कलबुर्गी), कर्नाटक में हुआ था। उन्होंने उस्मानिया विश्वविद्यालय से वाणिज्य (कॉमर्स) में स्नातक किया था और पटियाला के नेताजी सुभाष राष्ट्रीय क्रीड़ा संस्थान से 1961 में कोचिंग का डिप्लोमा प्राप्त किया।
उनके प्रशिक्षण में श्रीराम सिंह (800 मीटर धावक), गीता जुत्शी, चार्ल्स बोरोमियो, जगमल सिंह और बगाचा सिंह जैसे दिग्गज एथलीट तैयार हुए। उनके शिष्यों ने एशियाई खेलों और एशियाई ट्रैक एवं फील्ड प्रतियोगिताओं में कुल 17 स्वर्ण पदक जीते।
वर्ष 1970 के बैंकॉक एशियाई खेलों में 800 मीटर दौड़ में वे बर्मा के जिमी क्रैम्पटन से पीछे रहकर दूसरे स्थान पर रहे। वर्ष 1972 के म्यूनिख ओलंपिक में वे हीट्स में ही बाहर हो गए, किंतु उनका समय 1:47.7 रहा, जो क्रैम्पटन के एशियाई रिकॉर्ड से बेहतर था। उल्लेखनीय है कि इस प्रतियोगिता से पहले उन्होंने कभी सिंथेटिक ट्रैक पर दौड़ नहीं लगाई थी। वर्ष 1974 के एशियाई खेलों में उन्होंने अपना समय सुधारकर 1:47.6 किया और स्वर्ण पदक जीता।
श्रीराम सिंह के खेल जीवन का सर्वोच्च क्षण वर्ष 1976 के मॉन्ट्रियल ओलंपिक की 800 मीटर दौड़ थी। क्वालिफाइंग राउंड, सेमीफाइनल और फाइनल लगातार तीन दिनों में आयोजित हुए। पहली दौड़ में उन्होंने 1:45.86 का समय लेकर अपना ही एशियाई रिकॉर्ड तोड़ दिया। सेमीफाइनल में वे 1:46.42 के समय के साथ चौथे स्थान पर रहे।
फाइनल में श्रीराम सिंह ने 300 मीटर के बाद तीव्र गति से आगे बढ़ते हुए बढ़त बना ली। घंटी बजने के समय, अर्थात अंतिम 400 मीटर शेष रहते, उनका समय 50.85 सेकंड था, जबकि क्यूबा के अल्बर्टो जुआंतोरेना का समय 50.90 सेकंड था। लगभग 550 मीटर के आसपास जुआंतोरेना ने उन्हें पीछे छोड़ दिया और 1:43.50 के विश्व-रिकॉर्ड समय के साथ स्वर्ण पदक जीता। श्रीराम सिंह अंतिम सीधे हिस्से में गति बनाए नहीं रख सके और 1:45.77 के समय के साथ सातवें स्थान पर रहे। बाद में जुआंतोरेना ने कहा कि उनका विश्व रिकॉर्ड श्रीराम सिंह की आक्रामक अग्रणी दौड़ के कारण संभव हुआ। श्रीराम सिंह का समय 1994 तक एशियाई रिकॉर्ड बना रहा, जब इसे ली जिन इल ने तोड़ा। भारत का राष्ट्रीय रिकॉर्ड भी यह 42 वर्षों तक बना रहा, जिसे जून 2018 में जिन्सन जॉनसन ने तोड़ा।
वर्ष 1973 में एथलेटिक्स में उनके असाधारण प्रदर्शन के लिए उन्हें प्रतिष्ठित अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया। अगले वर्ष खेल के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें भारत का प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्मश्री प्रदान किया गया।
उन्होंने 1978 के एशियाई खेलों में 1:48.80 के समय के साथ 800 मीटर का स्वर्ण पदक बरकरार रखा। हालाकि, मॉस्को ओलंपिक में इसी स्पर्धा के सेमीफाइनल में वे बाहर हो गए। उन्होंने 1973 की एशियाई एथलेटिक्स चैंपियनशिप में 800 मीटर का रजत पदक भी जीता। इसके अतिरिक्त, 1975 की एशियाई एथलेटिक्स चैंपियनशिप में उन्होंने 400 मीटर, 800 मीटर तथा 4×400 मीटर रिले, तीनों में स्वर्ण पदक अर्जित किए। सेवानिवृत्ति के बाद वे मुख्यतः युवा खिलाड़ियों को खेल के क्षेत्र में मार्गदर्शन और प्रशिक्षण देते रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि वर्ष 1978 के आठवें एशियाई खेल 9 दिसंबर से 20 दिसंबर के बीच बैंकाक, थाईलैण्ड में आयोजित किए गए थे। पाकिस्तान ने भारत और बांग्लादेश के साथ विवादों के चलते इन खेलों की मेजबानी स्थगित कर दी थी और वित्तीय कारणों के चलते सिंगापुर खेलों की मेजबानी करने से पीछे हट गया था।
बैंकाक के लिए रवाना होने से पूर्व वे हमारे संस्थान में आए थे। उन्हें गले में कुछ खराश महसूस हुई तो वे तब दिल्ली के आर्मी अस्पताल में कर्नल सोबती के पास गए। उनकी सलाह पर वे फिर अपने पल्मोनरी फंक्शन टेस्टिंग यानी फेफड़ों की क्षमता की जांच के लिए हमारे पास आए। मैंने जब उनके पल्मोनरी फंक्शन किए तो उनमें कोई ऐसी कमी देखने में नहीं आई जिनसे किसी तरह का संदेह हो सकता था। वे संयोगवश आयु में मेरे समकक्ष हैं, फलस्वरूप मैंने भी अपनी तरफ़ से उनका हौसला बढ़ाया और उनको अच्छे से यह समझा दिया कि उनके फेफड़े और गला इत्यादि सभी बेहतरीन हैं। बाद में बैंकाक से खबर आई कि उन्हें अपनी 800 मीटर की दौड़ में स्वर्ण पदक मिला है। दरअसल, उनके शरीर की बनावट ही मध्यम दूरी की दौड़ के अनुकूल है।
वर्षों बाद सन् 1993 – 94 के दौरान वे मुझे नई दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में मिले। उन दिनों वे “ स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया “ में कोच थे और वे शायद 2008 तक इस कार्य से जुड़े रहे।
महत्त्वपूर्ण बात यह है कि जब मेरी इस महान खिलाड़ी से मुलाक़ात हुई, उस वक्त वे एक अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी थे। इसके बावजूद उनका व्यवहार बेहद शालीन था।
– सुभाष चंद्र लखेड़ा
