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संघ सतत व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्रहित के विविध रचनात्मक कार्यों में संलग्न है। संघ अपनी संगठन शक्ति से समाज और राष्ट्र को संगठित, जागरूक, कर्मठ, शक्तिशाली बनाने हेतु परिश्रम की पराकाष्ठा कर रहा है। ऐसे में समाज का भी दायित्व है कि वह संघ कार्यों से जुड़े और अपनी सहभागिता बढ़ाएं।
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विजयादशमी केवल विजय का पर्व नहीं बल्कि आत्ममंथन, संकल्प और नवप्रयास का पर्व है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष में इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। 100 वर्षों की यात्रा पूरी करने वाला संगठन जब पीछे मुड़कर देखता है तो उसके सामने केवल उपलब्धियों का लेखा-जोखा नहीं होता बल्कि यह प्रश्न भी खड़ा होता है कि आने वाले समय की चुनौतियों के लिए समाज को कैसे तैयार किया जाए। संघ शताब्दी वर्ष का मूल भाव इसी प्रश्न से जुड़ा है- 100 वर्षों से चल रहे संघकार्य को और अधिक व्यापक, गतिशील तथा समाजव्यापी कैसे बनाया जाए, इसी दृष्टि से शताब्दी वर्ष के कार्यक्रम केवल उत्सव नहीं बल्कि संघ की मूल कार्यपद्धति को समाज के व्यापक जीवन से जोड़ने का प्रयास बने हैं।
शक्ति का प्रकटीकरण और समाज में विश्वास
विजयादशमी से शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों की शुरुआत हुई। देशभर में स्वयंसेवक गणवेश में एकत्र हुए, सार्वजनिक कार्यक्रम हुए और अनेक स्थानों पर पथ-संचलन निकले। इसका उद्देश्य केवल शक्ति-प्रदर्शन नहीं था बल्कि समाज में यह विश्वास जगाना था कि संघ का कार्य देश के गांव, बस्ती और मोहल्ले तक निरंतर चल रहा है। इसके साथ संघ ने अपनी उपलब्ध संगठनात्मक शक्ति और स्वयंसेवकों की क्षमता का भी व्यापक आकलन किया। यह आकलन केवल संख्या जानने के लिए नहीं बल्कि आगे के समाजव्यापी कार्य की दिशा निर्धारित करने के लिए था।
गृह सम्पर्क : स्वयंसेवक से परिवार तक
इसके बाद शताब्दी वर्ष का व्यापक गृह सम्पर्क अभियान सामने आया। स्वयंसेवक घर-घर पहुंचे। संघ का परिचय, साहित्य और भारत माता का चित्र लेकर परिवारों से संवाद किया गया। यह सम्पर्क केवल संघ की जानकारी देने तक सीमित नहीं था। परिवार के सुख-दुःख, आपसी संवाद, भजन-कीर्तन, सामूहिक भोजन, संस्कार, पर्यावरण, तुलसी एवं वृक्ष-पौधों, पशु-पक्षियों के प्रति संवेदना और परिवार के वातावरण जैसे विषयों पर चर्चा हुई। पड़ोसियों के साथ सम्बंध, सामाजिक सौहार्द और परस्पर सहयोग की स्थिति को भी समझने का प्रयास किया गया। यहीं पंच परिवर्तन को व्यवहार से जोड़ने की चर्चा हुई- कुटुम्ब प्रबोधन, सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी तथा नागरिक कर्तव्य एवं सामाजिक जागरण।

हिंदू सम्मेलन : सम्पर्क से सहभागिता
गृह सम्पर्क के बाद अनेक स्थानों पर हिंदू सम्मेलन आयोजित हुए। घर-घर जाकर परिवारों को इन सम्मेलनों में सपरिवार आने का निमंत्रण दिया गया। सम्मेलनों में संत-महात्माओं, विभिन्न मत-पंथों के प्रतिनिधियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और समाज के विविध क्षेत्रों के लोगों ने सहभागिता की। सामूहिक भोजन, गीत-संगीत, सांस्कृतिक कार्यक्रम, प्रदर्शनियां तथा समाज में चल रहे सेवा और रचनात्मक कार्यों का परिचय हुआ। इन सम्मेलनों का संदेश था- समाज एक है, हम सब परस्पर जुड़े हैं और अपने समाज को संगठित, संस्कारित तथा समर्थ बनाने का दायित्व हम सबका है।
सामाजिक सद्भाव : विविधता में आत्मीयता
शताब्दी वर्ष में लगभग 9,884 स्थानों पर सामाजिक सद्भाव की गोष्ठियों का आयोजन किया गया। समाज के विभिन्न वर्गों और क्षेत्रों के प्रमुख लोगों ने अपने-अपने अनुभव और सामाजिक कार्य साझा किए। विचार केवल समस्याओं की चर्चा तक सीमित नहीं रहा। यह भी पूछा गया कि अपने गांव, बस्ती या नगर में हम सब मिलकर क्या कर सकते हैं? कौन-से अच्छे कार्य पहले से चल रहे हैं और उन्हें व्यापक कैसे बनाया जा सकता है? इसका उद्देश्य सामाजिक दूरी घटाना, संवाद बढ़ाना और समाज की विभिन्न शक्तियों को एक-दूसरे का सहभागी बनाना था।
प्रमुख जन गोष्ठियां : समाज की शक्तियों का समन्वय
इसके साथ निर्धारित लगभग 10,000 स्थानों पर इससे अधिक प्रमुख जन, युवा एवं महिला गोष्ठियों का आयोजन हुआ। डॉक्टर, वकील, शिक्षक, पत्रकार, व्यवसायी, उद्यमी, सामाजिक कार्यकर्ता, महिला नेतृत्व, विभिन्न जाति-बिरादरी और पेशागत समूहों के प्रमुख तथा समाज के अन्य प्रभावशाली व्यक्तित्व इसमें सहभागी हुए।
चर्चा का केंद्र था- समाज के प्रति हमारा कर्तव्य क्या है और अपनी-अपनी क्षमता से हम समाज के लिए क्या कर सकते हैं?
बेटी की शिक्षा और सुरक्षा, पर्यावरण, कुटुम्ब प्रबोधन, सामाजिक समरसता, सामाजिक सुरक्षा, अपराध नियंत्रण और परस्पर सम्मान जैसे विषयों पर विचार हुआ। उद्देश्य किसी एक संस्था का विस्तार नहीं बल्कि समाज की अपनी शक्तियों को समाज के हित में सक्रिय करना था।

युवा : भारत के भविष्य से संवाद
शताब्दी वर्ष में युवाओं को विशेष केंद्र में रखा गया। युवा सम्मेलन, खेलकूद, प्रतियोगिताएं, महाविद्यालयीन कार्यक्रम, संवाद और प्रबोधन आयोजित हुए। अपने-अपने क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य करने वाले चिकित्सक, प्रशासनिक एवं सुरक्षा अधिकारी, उद्यमी, सामाजिक कार्यकर्ता तथा अन्य प्रेरणादायी व्यक्तित्व युवाओं से संवाद करने पहुंचे। मूल प्रश्न था- युवा कैसा बनेगा, उसी से भारत का भविष्य निर्धारित होगा। इसलिए आत्मविश्वास, अनुशासन, जागरूकता, कर्तव्यबोध, राष्ट्रबोध और सामाजिक संवेदनशीलता को युवाओं के जीवन से जोड़ने का प्रयास हुआ।
शाखा विस्तार : शताब्दी के बाद की यात्रा
इन कार्यक्रमों का एक महत्वपूर्ण अगला चरण शाखा विस्तार है। अनेक स्थानों पर विशेष अभियान के माध्यम से मोहल्लों और गांवों तक शाखा पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है क्योंकि संघ की मूल शक्ति आज भी नित्य शाखा और व्यक्ति निर्माण है। शाखा केवल शारीरिक अभ्यास का स्थान नहीं। वह अनुशासन, समयबद्धता, नेतृत्व, सहयोग, दायित्व, आत्मीयता और राष्ट्रबोध की दैनिक साधना है। शाखा से संस्कार, संस्कार से व्यक्ति निर्माण, व्यक्ति से कार्यकर्ता और कार्यकर्ता से समाज संगठन की प्रक्रिया आगे बढ़ती है। यही कारण है कि दशकों तक स्वयंसेवक शाखा में आते रहते हैं। कार्यक्रम बदल सकते हैं, परिस्थितियां बदल सकती हैं, नेतृत्व की पीढ़ियां बदल सकती हैं, परंतु व्यक्ति निर्माण की साधना निरंतर चलती रहती है।
संघ की शक्ति : संगठन से अधिक, कार्यकर्ता निर्माण
संघ की वास्तविक शक्ति केवल उसकी शाखाओं, कार्यालयों या कार्यक्रमों की संख्या में नहीं है। उसकी सबसे बड़ी शक्ति है-कार्यकर्ता की श्रृंखला और पीढ़ी-दर-पीढ़ी संस्कार का हस्तांतरण।
वरिष्ठ कार्यकर्ता मार्गदर्शन करता है, वर्तमान पीढ़ी दायित्व निभाती है और युवा अगला दाायित्व सम्भालता है। इसीलिए नेतृत्व का परिवर्तन संघ के लिए कमजोरी नहीं बल्कि उसकी निरंतरता का प्रमाण बनता है।
आज मोबाइल और डिजिटल जीवन ने प्रत्यक्ष सामाजिक संवाद को चुनौती दी है। ऐसे समय में स्वयंसेवक का घर-घर सम्पर्क केवल सूचना का आदान-प्रदान नहीं बल्कि सम्बंध बनाने का माध्यम बनता है- अपरिचित को परिचित, परिचित को आत्मीय और आत्मीय को सहभागी बनाने की प्रक्रिया।
संघ से समाज की ओर
शताब्दी वर्ष की एक महत्वपूर्ण विशेषता कार्यपद्धति का यह विस्तार भी है कि पंच परिवर्तन को केवल स्वयंसेवकों तक सीमित न रखकर समाज की विभिन्न शक्तियों के साथ आगे बढ़ाया जाए। धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, शैक्षणिक, सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं तथा विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत नागरिक शक्तियों के साथ संवाद और सहभागिता बढ़ाना इसी दिशा का संकेत है। कुटुम्ब प्रबोधन हो या पर्यावरण, सामाजिक समरसता हो या स्वदेशी- इन विषयों को समाज का साझा अभियान बनाने की आवश्यकता है।
इसलिए शताब्दी वर्ष का सूत्र केवल सम्पर्क नहीं बल्कि सम्पर्क से सम्बंध, सम्बंध से संवाद, संवाद से सहभागिता और सहभागिता से सामाजिक परिवर्तन।
चुनौती : भविष्य के भारत का निर्माण
आज भारत तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सोशल मीडिया, वैश्वीकरण, बाजार, जनसांख्यिकीय परिवर्तन और बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों के दौर से गुजर रहा है। चुनौती केवल बाहरी विरोध की नहीं है। चुनौती यह भी है कि नई पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी रहे और आधुनिक विश्व की चुनौतियों का सामना करने में सक्षम बने। युवाओं की ऊर्जा, महिलाओं की सामाजिक सहभागिता, जनजातीय और ग्रामीण समाज की आकांक्षाएं, परिवार की मजबूती, पर्यावरण, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक समरसता- इन सभी विषयों पर समाज के साथ मिलकर काम करना होगा। इसलिए संघ के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं कि कौन उसका विरोध कर रहा है। प्रश्न यह है कि समाज के लिए हम क्या कर रहे हैं? क्या परिवार में संवाद बढ़ रहा है? क्या समाज में विश्वास बढ़ रहा है? क्या युवा दायित्व ले रहे हैं? क्या सामाजिक दूरी कम हो रही है? क्या नागरिक अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक हो रहे हैं? यही वास्तविक कसौटी है।
शताब्दी का संदेश
डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने जब संघ का कार्य प्रारम्भ किया, तब उनके पास विशाल संसाधन नहीं थे। उनके पास था- एक ध्येय, समाज के प्रति विश्वास और व्यक्ति निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण का संकल्प। आज शताब्दी वर्ष उसी साधना को व्यापक समाज की शक्ति से जोड़ने का अवसर है। शताब्दी का वास्तविक उत्सव केवल कार्यक्रमों की संख्या में नहीं बल्कि समाज में दिखाई देने वाले परिवर्तन में होगा- कितने परिवार जुड़े, कितना सामाजिक विश्वास बढ़ा, कितने लोग समाज के लिए खड़े हुए और कितनी सामाजिक शक्तियां राष्ट्रहित में सक्रिय हुईं। अंततः प्रश्न यह नहीं कि संघ कितना बड़ा हुआ? बड़ा प्रश्न यह है कि संघ के कारण समाज कितना अपना, संस्कारित, संगठित और समर्थ हुआ? यही शताब्दी वर्ष की कसौटी है और यही अगले चरण की चुनौती है।
कैलाशचंद्र जी

