रूस और यूक्रेन के बीच चल रहा भीषण युद्ध अब केवल पारंपरिक हथियारों के प्रयोग तक सीमित नहीं रह गया है। आधुनिक युद्ध के इस दौर में सूचना और संचार तकनीक सबसे बड़े हथियार के रूप में उभर कर सामने आई है। किसी भी सैन्य अभियान की सफलता के लिए उपग्रह आधारित संचार व्यवस्था अत्यंत महत्वपूर्ण हो चुकी है। इसी परिप्रेक्ष्य में हाल ही में एक नया और गंभीर विवाद उत्पन्न हुआ है जिसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक और रणनीतिक हलचल तेज कर दी है। यूक्रेन के सैन्य अभियानों के बीच अचानक उनकी सबसे महत्वपूर्ण उपग्रह संचार प्रणाली की गति को धीमा कर दिया गया। यह घटना उस समय हुई जब यूक्रेन रूसी प्रक्षेपास्त्र हमलों का सामना कर रहा था। संचार व्यवस्था के अचानक बाधित होने से यूक्रेनी सेना को भारी नुकसान उठाना पड़ा और कई महत्वपूर्ण रक्षा अभियान बीच में ही रोक देने पड़े। इस अप्रत्याशित बाधा ने यूक्रेन के नेतृत्व को गहरी चिंता में डाल दिया और युद्ध के मैदान में तकनीकी निर्भरता के खतरों को पूरी दुनिया के सामने उजागर कर दिया।

इस पूरी समस्या का मुख्य कारण सैन्य संचार उपकरणों पर लगाई गई एक अघोषित तकनीकी रोक थी। यूक्रेनी सैन्य अधिकारियों और रक्षा विशेषज्ञों ने पाया कि उनके द्वारा उपयोग किए जा रहे उच्च स्तरीय संचार उपकरणों पर अचानक एक गति सीमा लागू कर दी गई है। यदि कोई भी मानवरहित टोही विमान या सैन्य उपकरण 160 किलोमीटर प्रति घंटे की गति को पार करता है, तो उसका उपग्रह संपर्क स्वतः ही टूट जाता है। कुछ सैन्य रिपोर्टों के अनुसार, यह भयंकर समस्या 110 किलोमीटर प्रति घंटे की गति पर भी देखी गई। आधुनिक युद्ध में उपयोग किए जाने वाले उन्नत मानवरहित विमान बहुत तेज गति से उड़ान भरते हैं और सटीक जानकारी एकत्र करने या लक्ष्य को भेदने के लिए निरंतर उपग्रह संपर्क पर निर्भर करते हैं।
वर्तमान समय में जो युद्ध लड़ा जा रहा है, उसमें इन मानवरहित विमानों की भूमिका सबसे अहम हो गई है। ये विमान न केवल दुश्मन की चौकियों की टोह लेने का काम करते हैं, बल्कि सटीक निशाने के साथ गोला बारूद गिराने में भी सक्षम हैं। ऐसे विमानों को लगातार दूर बैठे संचालकों से निर्देश प्राप्त करने होते हैं। यह निर्देश अत्यंत उच्च गति वाले उपग्रह संचार नेटवर्क के माध्यम से ही संभव हो पाते हैं। जब ये विमान बहुत तेज गति से उड़ रहे होते हैं, तो हर पल बदलते भौगोलिक निर्देशांकों के साथ उपग्रह का संपर्क बनाए रखना एक जटिल तकनीकी प्रक्रिया होती है। गति सीमा पार करते ही संपर्क टूट जाने का सीधा मतलब यह है कि ये विमान अचानक अंधे हो जाते हैं। ऐसे में न तो वे अपने संचालक को कोई दृश्य भेज पाते हैं और न ही कोई निर्देश प्राप्त कर सकते हैं। दिशाहीन होने की स्थिति में ये महंगे और उन्नत विमान या तो दुर्घटनाग्रस्त हो जाते हैं या फिर दुश्मन के रडार की पकड़ में आकर नष्ट कर दिए जाते हैं। बिना किसी पूर्व चेतावनी के लागू की गई इस तकनीकी रोक के कारण यूक्रेनी सेना के कई उन्नत विमान लक्ष्य तक पहुंचने से पहले ही बेकार हो गए।
इस गंभीर घटना के बाद यूक्रेन के राष्ट्रपति ने सार्वजनिक तौर पर यह आरोप लगाया कि युद्ध क्षेत्र में उनकी संचार सेवाओं को जानबूझकर धीमा किया जा रहा है। उनका मानना था कि रूसी हमलों के बीच इस तरह की तकनीकी बाधा उत्पन्न करना यूक्रेनी सुरक्षा व्यवस्था को कमजोर करने की एक साजिश हो सकती है। इन गंभीर आरोपों के बाद, इस उपग्रह संचार प्रणाली का निर्माण करने वाली कंपनी के प्रमुख एलन मस्क को सामने आकर स्पष्टीकरण देना पड़ा। उन्होंने स्थिति को स्पष्ट करते हुए नागरिक उपयोग वाली प्रणाली और सैन्य उपयोग वाली प्रणाली के बीच का अंतर समझाया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यूक्रेनी सेना जिस विशिष्ट सैन्य संचार प्रणाली का उपयोग कर रही है, उसका पूर्ण स्वामित्व और नियंत्रण अमेरिकी सरकार के पास है। उनके अनुसार, नेटवर्क की गति को नियंत्रित करने, उसे धीमा करने या किसी भी प्रकार का प्रतिबंध लगाने का एकमात्र अधिकार अमेरिकी रक्षा विभाग और देश के सर्वोच्च कमांडर यानी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास है।
इस खुलासे के बाद यह तकनीकी मुद्दा पूरी तरह से एक भू राजनीतिक विवाद में परिवर्तित हो गया। अंतरराष्ट्रीय मामलों के विश्लेषकों और कूटनीतिक विशेषज्ञों ने इस घटना को अमेरिका और यूक्रेन के बीच चल रहे हालिया राजनीतिक तनाव से जोड़कर देखना शुरू कर दिया। ऐसा माना जा रहा है कि यह कदम केवल एक तकनीकी खराबी नहीं बल्कि कूटनीतिक दबाव बनाने का एक हथियार था। पिछले कुछ समय से यूक्रेन द्वारा रूसी ऊर्जा ठिकानों पर लगातार हमले किए जा रहे थे, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार पर असर पड़ने की संभावना थी। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अमेरिकी प्रशासन यूक्रेन पर इन हमलों को रोकने या सीमित करने का दबाव बना रहा था। जब कूटनीतिक बातचीत से बात नहीं बनी, तो युद्ध के मैदान में सीधे असर डालने वाली संचार तकनीक को नियंत्रित करके संदेश देने का प्रयास किया गया। यह इस बात का स्पष्ट उदाहरण है कि किस प्रकार महाशक्तियां युद्ध में सीधे तौर पर शामिल हुए बिना भी तकनीकी नियंत्रण के माध्यम से युद्ध की दिशा और परिणाम को प्रभावित कर सकती हैं।

इस घटना ने केवल यूक्रेन को ही नहीं बल्कि यूरोप के अन्य देशों और सहयोगी राष्ट्रों को भी गहरी चिंता में डाल दिया है। उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन के कई सदस्य देशों ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उनका तर्क है कि यदि युद्ध के मैदान में अत्यंत आवश्यक तकनीकी संचार बुनियादी ढांचे का उपयोग राजनीतिक दबाव बनाने के लिए किया जाने लगा, तो यह सभी सहयोगी देशों की सुरक्षा के लिए एक अभूतपूर्व खतरा बन जाएगा। पोलैंड जैसे देशों के रक्षा मामलों के जानकारों ने सार्वजनिक मंचों पर यह चिंता व्यक्त की है कि आज जो स्थिति यूक्रेन के साथ हुई है, कल वह किसी भी अन्य देश के साथ हो सकती है। रक्षा मामलों में किसी विदेशी महाशक्ति की तकनीक पर पूरी तरह से निर्भर रहना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़ा जोखिम बनता जा रहा है।
इस पूरी घटना ने कूटनीतिक हलकों में राष्ट्रीय संप्रभुता की एक नई बहस को जन्म दे दिया है। जब कोई देश अपने रक्षा उपकरणों के लिए किसी अन्य देश की तकनीक पर निर्भर होता है, तो क्या वह वास्तव में स्वतंत्र निर्णय ले सकता है। यूक्रेन की स्थिति इसी सवाल का उत्तर देती है। भले ही उनके सैनिक जमीन पर बहादुरी से लड़ रहे हों, लेकिन उनके हथियारों और संचार साधनों का नियंत्रण मीलों दूर बैठे एक अमेरिकी राष्ट्रपति के हाथों में है। कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीक को इस तरह से हथियार के रूप में इस्तेमाल करना एक खतरनाक परंपरा की शुरुआत है। यदि राजनीतिक मतभेदों के कारण युद्ध के बीच में ही रक्षा सहायता या तकनीकी समर्थन वापस ले लिया जाए या उसे सीमित कर दिया जाए, तो यह उस देश की हार का सीधा कारण बन सकता है।

अंततः, यूक्रेन में संचार प्रणाली को धीमा किए जाने का यह पूरा प्रकरण इस बात को स्थापित करता है कि भविष्य के युद्ध केवल भौगोलिक सीमाओं और तोपखानों से नहीं लड़े जाएंगे। आज के समय में अदृश्य तकनीकी जाल और उपग्रह संचार व्यवस्थाएं युद्ध के सबसे निर्णायक मोर्चे बन चुके हैं। तकनीकी प्रभुत्व जिसके पास है, वही युद्ध के वास्तविक परिणाम तय कर सकता है। अमेरिकी सरकार और राष्ट्रपति के पास इस सैन्य संचार प्रणाली का नियंत्रण होने से यह स्पष्ट हो गया है कि तकनीक प्रदान करने वाले देश कभी भी अपनी सुविधा और राजनीतिक लाभ के अनुसार उसका उपयोग रोक या बदल सकते हैं। यूक्रेन का यह अनुभव विश्व के सभी देशों के लिए एक कड़वा सबक है। यह घटना साबित करती है कि तकनीकी निर्भरता का अर्थ राजनीतिक निर्भरता भी है। जब तक कोई देश अपनी रक्षा संचार तकनीक में आत्मनिर्भर नहीं होता, तब तक उसकी संप्रभुता और सैन्य स्वतंत्रता हमेशा किसी अन्य देश के राजनीतिक फैसलों पर निर्भर रहेगी।
– महेन्द्र तिवारी

