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लौहपुरुष सरदार पटेल: एकता के महानायक

लौहपुरुष सरदार पटेल: एकता के महानायक

by हिंदी विवेक
in दिनविशेष
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लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल साहसी, जिद्दी और निर्भीक थे। बारडोली आंदोलन के सफल नेतृत्व के बाद गांधी जी ने उन्हें ‘सरदार’ की उपाधि दी।

15 अगस्त, 1947 को अंग्रेजों ने भारत को स्वाधीन तो कर दिया, पर जाते हुए वे गृहयुद्ध एवं अव्यवस्था के बीज भी बो गए। उन्होंने भारत के 600 से भी अधिक रजवाड़ों को भारत में मिलने या न मिलने की स्वतंत्रता दे दी। अधिकांश रजवाड़े तो भारत में स्वेच्छा से मिल गए, पर कुछ आंख दिखाने लगे। ऐसे में जिसने इनका दिमाग सीधाकर उन्हें भारत में मिलाया, उन्हें हम लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल के नाम से जानते हैं।

वल्लभभाई का जन्म 31 अक्टूबर, 1875 को हुआ था। इनके पिता झबेरभाई पटेल ग्राम करमसद (गुजरात) के निवासी थे। उन्होंने भी 1857 में रानी झांसी के पक्ष में युद्ध किया था। इनकी माता लाड़ोबाई थीं।

बचपन से ही ये बहुत साहसी एवं जिद्दी थे। एक बार विद्यालय से आते समय ये पीछे छूट गए। कुछ साथियों ने जाकर देखा, तो ये धरती में गड़े एक नुकीले पत्थर को उखाड़ रहे थे। पूछने पर बोले – इसने मुझे चोट पहुंचाई है, अब मैं इसे उखाड़कर ही मानूंगा। और वे काम पूरा कर ही घर आए।

जब सरदार पटेल ने जोधपुर नरेश पर तान दी पिस्तौल - Sardar Vallabhbhai Patel  Birthday - Amar Ujala Hindi News Live

एक बार उनकी बगल में फोड़ा निकल आया। उन दिनों गांवों में इसके लिए लोहे की सलाख को लालकर उससे फोड़े को दाग दिया जाता था। नाई ने सलाख को भट्ठी में रखकर गरम तो कर लिया; पर वल्लभभाई जैसे छोटे बालक को दागने की उसकी हिम्मत नहीं पड़ी। इस पर वल्लभभाई ने सलाख अपने हाथ में लेकर उसे फोड़े में घुसेड़ दिया। खून और मवाद देखकर पास बैठे लोग चीख पड़े; पर वल्लभभाई ने मुंह से उफ तक नहीं निकाली।
साधारण परिवार होने के कारण वल्लभभाई की शिक्षा निजी प्रयास से कष्टों के बीच पूरी हुई। अपने जिले में वकालत के दौरान अपनी बुद्धिमत्ता, प्रत्युत्पन्नमति तथा परिश्रम के कारण वे बहुत प्रसिद्ध हो गए। इससे उन्हें धन भी प्रचुर मात्रा में प्राप्त हुआ। इससे पहले उनके बड़े भाई विट्ठलभाई ने और फिर वल्लभभाई ने इंग्लैंड जाकर बैरिस्टर की परीक्षा उत्तीर्ण की।

1926 में वल्लभभाई की भेंट गांधी जी से हुई और फिर वे भी स्वाधीनता आंदोलन में कूद पड़े। उन्होंने बैरिस्टर वाली अंग्रेजी वेशभूषा त्याग दी और स्वदेशी रंग में रंग गए। बारडोली के किसान आंदोलन का सफल नेतृत्व करने के कारण गांधी जी ने इन्हें ‘सरदार’ कहा। फिर तो यह उपाधि उनके साथ ही जुड़ गई। सरदार पटेल स्पष्ट एवं निर्भीक वक्ता थे। यदि वे कभी गांधी जी से असहमत होते, तो उसे भी साफ कह देते थे। वे कई बार जेल गए। 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में उन्हें 3 वर्ष की सजा हुई।

सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती और भारत के एकीकरण में उनका योगदान

स्वतंत्रता के बाद उन्हें उपप्रधानमंत्री तथा गृहमंत्री बनाया गया। उन्होंने केंद्रीय सरकारी पदों पर अभारतीयों की नियुक्ति रोक दी। रेडियो तथा सूचना विभाग का उन्होंने कायाकल्प कर डाला। गृहमंत्री होने के नाते रजवाड़ों के भारत में विलय का विषय उनके पास था। सभी रियासतें स्वेच्छा से भारत में विलीन हो गईं, पर जम्मू-कश्मीर, जूनागढ़ तथा हैदराबाद ने टेढ़ा रुख दिखाया। सरदार की प्रेरणा से जूनागढ़ में जन विद्रोह हुआ और वह भारत में मिल गई। हैदराबाद पर पुलिस कार्रवाई कर उसे भारत में मिला लिया गया।
जम्मू-कश्मीर का मामला प्रधान मंत्री नेहरू ने अपने हाथ में रखा। इसी से उसका पूर्ण विलय नहीं हो पाया। 15 दिसम्बर, 1950 को भारत के इस महान सपूत का देहांत हो गया।

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