विकसित भारत के संकल्प के साथ हम विकास यात्रा की दौड़ में निकल चुके हैं, पर याद रहे कहीं कोई अपना पीछे न छुट जाएं। हमें अपने परिवार, मित्र और समाज को भी ऊंचा उठाना है। भौतिक उन्नति के आगे मानवीय संवेदना कहीं दम न तोड़ दे, इसका भी ध्यान रखना है क्योंकि अगला दशक विकसित भारत की नींव मजबूत करने का अवसर है।
दीपावली केवल दीप जलाने और अंधकार को दूर करने का उत्सव नहीं है; यह प्रकाशमान होने और दूसरों के जीवन को भी प्रकाशमान करने का संदेश देने वाला भारतीय जीवन-दर्शन का पर्व है। घर के द्वार पर जलने वाला एक छोटा-सा दीप हमें यह स्मरण कराता है कि प्रकाश की सार्थकता तभी है, जब वह स्वयं प्रकाशित होने के साथ आसपास के अंधकार को भी दूर करे। इसी भाव को यदि व्यक्ति के जीवन से समाज और राष्ट्र के जीवन तक विस्तारित करें तो दीपावली एक गहरा प्रश्न हमारे सामने रखती है, क्या हमारे विचार प्रकाशमान हैं? क्या हमारा आचरण समाज में विश्वास और सद्भाव का प्रकाश फैला रहा है? क्या हमारे निर्णय राष्ट्र को अधिक सक्षम, समरस और जाग्रत बना रहे हैं? अज्ञान से ज्ञान की ओर, निराशा से आशा की ओर, विभाजन से समरसता की ओर और निर्भरता से आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ना ही दीपावली के प्रकाश का वास्तविक विस्तार है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पू. सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी और देश के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने हमें विकसित भारत के माध्यम से विश्वगुरु भारत की ओर मार्गक्रमण करने का संदेश दिया है। भारत आज ‘विकसित भारत’ के संकल्प के साथ अपनी विकास-यात्रा के एक महत्वपूर्ण पड़ाव पर खड़ा है। स्वतंत्रता के बाद हमने अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है, परंतु व्यक्ति के विचारों में प्रकाश, परिवार में समन्वय, समाज में समरसता, राजनीति में शुचिता, राष्ट्रजीवन में सजगता, विज्ञान और तकनीक में आत्मविश्वास, अर्थव्यवस्था में स्वावलम्बन तथा विश्व के प्रति उत्तरदायित्व का प्रकाश भी हम सभी भारतीयों में आवश्यक है। दीपावली का यह पर्व उत्सव मनाने के साथ आत्ममंथन का अवसर भी है। हम अपने भीतर कौन-सा प्रकाश जगाएं, उस प्रकाश को समाज तक कैसे पहुंचाएं और उसी सामूहिक चेतना के बल पर भारत को विकसित से समर्थ तथा समर्थ से विश्वगुरु बनाने में अपना योगदान कैसे दें? इन महत्वपूर्ण बातों पर हमारे मन-मस्तिष्क में मंथन चलना आवश्यक है।
विकास कभी पूर्ण नहीं होता। वह एक ऐसी यात्रा है जिसमें प्रत्येक उपलब्धि अगले लक्ष्य की भूमिका तैयार करती है। भारत जब स्वतंत्र हुआ, तब हमारे सामने केवल राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करने का प्रश्न नहीं था। सदियों की गुलामी, आर्थिक पिछड़ापन, सामाजिक विषमता, अशिक्षा, गरीबी, कमजोर औद्योगिक आधार और सीमित संसाधनों के बीच एक आधुनिक राष्ट्र के निर्माण की चुनौती थी। आज स्वतंत्रता के 8 दशक के पड़ाव की ओर बढ़ते हुएपीछे मुड़कर देखें तो भारत की विकास यात्रा केवल उपलब्धियों की सूची नहीं है; यह असंख्य संघर्षों, प्रयोगों, सफलताओं, असफलताओं और निरंतर आत्मसुधार की यात्रा है। हमने विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अपनी स्थिति मजबूत की, किंतु इसी मोड़ पर एक महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है, क्या हमारे विकास की यात्रा अब पूर्ण हो गई है? निश्चित रूप से ‘नहीं’, क्योंकि विकास कोई अंतिम स्टेशन नहीं है, वह निरंतर आगे बढ़ने वाली यात्रा है। आज भारत के सामने प्रश्न यह नहीं है कि हमने कितना प्राप्त किया। प्रश्न यह है कि अब हमें कितना और प्राप्त करना है और किस दिशा में प्राप्त करना है? यहीं से विकसित भारत की अगली यात्रा प्रारम्भ होती है।

स्वतंत्रता के समय भारत की स्थिति आज के भारत से बिल्कुल अलग थी। भारत की विकास यात्रा को पंडित जवाहरलाल नेहरू से लेकर अब नरेंद्र मोदी तक हुए अनेक प्रधान मंत्रियों ने अलग-अलग चरणों में गति दी। इसलिए आज का भारत उस भारत से बहुत आगे है, जिसने 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त की थी, पर हर पूर्ण हुई मंजिल ने हमारे सामने एक नई मंजिल खड़ी कर दी है। कल तक प्रश्न यह था कि विकास कितना होगा, किंतु वर्तमान प्रश्न यह है कि किस प्रकार का विकास होगा। अब तक प्रश्न था कि हमारे पास क्या नहीं है? अब प्रश्न बदल रहा है, हमारे पास जो है, उसकी गुणवत्ता कैसी है? एक गांव में सड़क पहुंच गई, पर क्या उस सड़क के साथ रोजगार आया? घर में बिजली पहुंच गई, क्या वह विश्वसनीय व पर्याप्त है? इंटरनेट पहुंच गया, पर क्या डिजिटल साक्षरता भी पहुंची? अस्पताल बन गया, किंतु क्या गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध है? शहर में मेट्रो बन गई, पर क्या नागरिक का जीवन वास्तव में अधिक सुगम हुआ? यही विकास की अगली कसौटी है। इसलिए आने वाले 10 वर्षों में भारत की आधारभूत संरचना की सोच बड़ा निर्माण से भारतीय नागरिकों के बेहतर जीवन की ओर बढ़नी चाहिए।
जल, बिजली, सड़क, रेल, आवास, स्वच्छता, स्वास्थ्य, शिक्षा, डिजिटल कनेक्टिविटी और सार्वजनिक परिवहन, विकसित भारत के भौतिक आधार हैं, पर हमें अब इनकी दूसरी पीढ़ी की ओर जाना होगा। यानी आने वाले दशक में इंफ्रास्ट्रक्चर का अर्थ नागरिक के जीवन की गुणवत्ता होना चाहिए, परंतु भविष्य का विकसित भारत केवल इंफ्रास्ट्रक्चर से नहीं बनेगा। यहीं से विकसित भारत की चर्चा का सबसे महत्वपूर्ण और प्राय: उपेक्षित पक्ष सामने आता है। क्या चौड़ी सड़कें किसी समाज को विकसित बना देती हैं? क्या ऊंची इमारतें हमारे विकसित समाज की पहचान हैं? क्या तेज इंटरनेट अपने आप नागरिक में चेतना पैदा कर देता है? क्या बड़ी अर्थव्यवस्था अपने आप समाज में सामाजिक समरसता पैदा कर देती है? उपस्थित सभी प्रश्नों का उत्तर है… ‘नहीं’। राष्ट्र का विकास केवल बाहर दिखाई देने वाली संरचनाओं से नहीं, भीतर विकसित होने वाली चेतना से भी होता है। इसीलिए भारत के अगले विकास चरण को पांच स्तरों पर देखना होगा- व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र, विश्व। यदि इन पांचों में संतुलित जागरण नहीं आया तो आर्थिक विकास अधूरा रहेगा।

भारत की शक्ति उसकी विविधता में है। जाति, वर्ण, भाषा, क्षेत्र, पंथ और सामाजिक पहचानें यदि अपनी सांस्कृतिक विविधता का परिचय हैं तो वे भारत की शक्ति हैं, किंतु जब यही पहचानें श्रेष्ठता, हीनता, घृणा अथवा राजनीतिक ध्रुवीकरण का साधन बन जाती हैं, तब सामाजिक शक्ति विभाजन में बदल जाती है। हमें विविधता को स्वीकार करना आवश्यक है, विविधता को संघर्ष का कारण बनाना आवश्यक नहीं। भारत की सामाजिक शक्ति तभी बढ़ेगी जब समरसता सामाजिक जीवन का स्वाभाविक संस्कार बनेगी।
हम विकास की चर्चा करते समय ॠऊझ, उद्योग, तकनीक और इंफ्रास्ट्रक्चर की बात करते हैं, परंतु किसी भी समाज की वास्तविक स्थिरता का पहला केंद्र परिवार है। परिवार टूटता है तो अकेलापन बढ़ता है। पीढ़ियों के बीच संवाद टूटता है तो अनुभव और ऊर्जा का सम्बंध टूटता है। बच्चों के पास तकनीक होती है, पर संस्कार का संवाद कम हो जाता है। वृद्धों के पास अनुभव होता है, किंतु परिवार में उनके लिए समय कम होता है। इसलिए विकसित भारत का परिवार केवल आर्थिक इकाई नहीं होना चाहिए। वह होना चाहिए- संवाद का केंद्र, संस्कार का केंद्र और भावनात्मक सुरक्षा का केंद्र। आधुनिकता परिवार को कमजोर करने का नाम नहीं है। आधुनिकता का अर्थ है- परिवार के भीतर सम्मान, समानता, संवाद और परस्पर जिम्मेदारी को मजबूत करना।
लोकतंत्र ने हमें अधिकार दिए हैं, परंतु क्या हमने उतनी ही गम्भीरता से कर्तव्यों को स्वीकार किया है? सड़क पर कचरा फेंकना और स्वच्छ भारत की अपेक्षा करना विरोधाभास है। सार्वजनिक सम्पत्ति को हानि पहुंचाना और बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर की मांग करना विरोधाभास है। कर चोरी करना और सरकार से बेहतर सुविधाओं की अपेक्षा करना विरोधाभास है। नियम तोड़ना और व्यवस्था को दोष देना भी विरोधाभास है। इसलिए विकसित भारत के लिए नागरिकता की एक नई संस्कृति चाहिए, सरकार क्या करेगी, के साथ मैं क्या करूंगा? यही जागरूक नागरिकता है।
राजनीति लोकतंत्र का आवश्यक अंग है। विचारों का संघर्ष लोकतंत्र की शक्ति है, पर जब राजनीतिक प्रतिस्पर्धा सामाजिक शत्रुता में बदलती है, तब लोकतंत्र कमजोर होता है। विरोधी राजनीतिक दल का व्यक्ति देश का शत्रु नहीं है। नीतियों की आलोचना होनी चाहिए, परंतु व्यक्ति का अमानवीकरण नहीं। विचारों का संघर्ष होना चाहिए, पर समाज को स्थाई खेमों में बांटना लोकतंत्र के लिए घातक है। भारत को ऐसी राजनीतिक संस्कृति की आवश्यकता है जिसमें असहमति हो, पर संवाद भी हो। प्रतिस्पर्धा हो, पर राष्ट्रहित सर्वोपरि हो। आलोचना हो, परंतु तथ्य और मर्यादा के साथ।
लोकतंत्र में आंदोलन आवश्यक हैं। अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना नागरिक अधिकार है, पर आंदोलन की भी एक संस्कृति होती है। आंदोलन यदि सत्य, अहिंसा, संवाद और जनहित पर आधारित है तो वह लोकतंत्र को मजबूत करता है। यदि आंदोलन घृणा, हिंसा, सार्वजनिक सम्पत्ति की क्षति, अपमान और सामाजिक विभाजन का माध्यम बन जाए तो वह अपने मूल उद्देश्य को कमजोर कर देता है। भारत की अपनी ज्ञान परम्परा ने हमें यह अंतर समझाया है। महावीर की अहिंसा, बुद्ध की करुणा और गांधी का सत्याग्रह हमें बताते हैं कि संघर्ष और हिंसा समानार्थी शब्द नहीं हैं। 26 जनवरी के दिन लाल किले पर अराजकता फैलाने वाले आंदोलक, भारत देश को नेपाल-बांग्लादेश जैसे हिंसक आंदोलन में परिवर्तित करने हेतु होने वाले लगातार प्रयास। यह सारे आंदोलन अपने नकारात्मक एवं देश विरोधी उद्देश्य को स्पष्ट करते हैं। इसलिए विकसित भारत में आंदोलन की संस्कृति भी विकसित होनी चाहिए। विरोध हो, पर वैमनस्य नहीं। आक्रोश हो, परंतु अराजकता नहीं।
विकसित भारत केवल आर्थिक रूप से मजबूत भारत नहीं हो सकता। राष्ट्र को अपने आंतरिक और बाहरी दोनों प्रकार के संकटों के प्रति सजग रहना होगा। सीमाओं की सुरक्षा जितनी आवश्यक है, उतनी ही आवश्यक है सामाजिक एकता। पाकिस्तान, चीन, बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों से होने वाली खुराफात से निर्माण होने वाली बाहरी चुनौती का सामना भारतीय सेना करती है, परंतु आंतरिक विघटन का सामना पूरा समाज करता है। आतंकवाद, अलगाववाद, संगठित अपराध, साइबर संकट, दुष्प्रचार, डिजिटल धोखाधड़ी और सामाजिक तनाव, ये सभी आधुनिक राष्ट्र की सुरक्षा से जुड़े विषय हैं। इसलिए राष्ट्रीय सुरक्षा की अवधारणा भी बदल रही है। आज सुरक्षा के नए आयाम है- सीमा सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा, जल सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, आर्थिक सुरक्षा, तकनीकी सुरक्षा, सामाजिक एकता।
अगले 10 वर्ष तकनीकी परिवर्तन के दशक होंगे। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रोबोटिक्स, क्वांटम कम्प्यूटिंग, जैव-प्रौद्योगिकी, सेमीकंडक्टर, ड्रोन, स्वचालन और अंतरिक्ष तकनीक भारत के विकास को नई दिशा दे सकते हैं, पर साथ ही तकनीक नए प्रश्न भी पैदा करेगी। इसलिए भारत को तकनीक आयात करने वाला देश नहीं, तकनीक विकसित करने वाला देश बनना होगा। आधुनिक युद्ध केवल सीमा पर नहीं लड़े जाते। साइबर क्षेत्र, अंतरिक्ष, ड्रोन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, उपग्रह और संचार प्रणाली ये सब राष्ट्रीय सुरक्षा के नए क्षेत्र हैं। इसलिए रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का अर्थ केवल हथियार बनाना नहीं है। हमें चाहिए- अनुसंधान स्वदेशी, तकनीक, निजी उद्योग, स्टार्टअप, रक्षा उत्पादन, रणनीतिक आपूर्ति श्रृंखला। राष्ट्र की सुरक्षा जितनी मजबूत होगी, आर्थिक विकास के लिए वातावरण उतना ही स्थिर होगा। हमारी उद्योग नीति भारत को केवल बाजार नहीं, उत्पादन केंद्र बनाने वाली होनी आवश्यक है।
विश्वगुरु बनने का अर्थ यह नहीं कि भारत दुनिया पर अपना विचार थोपे। भारत की वास्तविक शक्ति सनातन से चली आ रही अपनी विश्वसनीयता, सभ्यता, ज्ञान और मानव-केंद्रित दृष्टि में होनी चाहिए। भारत ने विश्व को योग-आयुर्वेद दिया। बौद्ध और जैन परम्पराओं की अहिंसा और करुणा की दृष्टि दी। वसुधैव कुटुम्बकम् का विचार दिया। आज भारत को इन्हीं मूल्यों को आधुनिक कूटनीति, तकनीक, अर्थव्यवस्था, व्यापार और वैश्विक सहयोग के माध्यम से नए रूप में प्रस्तुत करना होगा। विश्वगुरु का अर्थ उपदेश देने वाला भारत नहीं, विश्व के लिए उपयोगी भारत होना है। विकसित भारत के संदर्भ में स्वदेशी की चर्चा भी नए अर्थ में करनी होगी। स्वदेशी का अर्थ दुनिया से कट जाना नहीं है। स्वदेशी का अर्थ है, अपनी क्षमता पर विश्वास। हम विदेशी तकनीक सीखें, पर अपनी तकनीक विकसित भी करें। हम वैश्विक बाजार में जाएं, पर अपने उद्योगों को मजबूत भी करें। हमें विश्व से जुड़ना है, परंतु स्वयं को खोना नहीं है, यह बात हमें ध्यान में रखना अत्यंत आवश्यक है।
किसी राष्ट्र की आर्थिक प्रगति तभी स्थायी होती है जब उसका समाज स्वस्थ हो। स्वस्थ समाज का अर्थ केवल बीमारी से मुक्त समाज नहीं। स्वस्थ समाज वह है जिसमें परिवार मजबूत हों, युवा नशे और निराशा से दूर हों, महिलाएं सुरक्षित और सम्मानित हों, वृद्ध अकेले और बेसहारा न हों, बच्चों को संस्कार और अवसर दोनों मिलें, खेल और स्वास्थ्य जीवनशैली का हिस्सा हों और समाज में परस्पर विश्वास बना रहे। सामाजिक स्वास्थ्य भी राष्ट्रीय सम्पत्ति है। इसलिए अपने अंदर छुपे हुए स्व-बोध की खोज किएबिना विकसित भारत और विश्वगुरु की यात्रा अधूरी है।
भारत के सामने आज एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न है। हम विकसित किसके लिए होना चाहते हैं? यदि विकास केवल उपभोग और उच्छृंखलता बढ़ाने का नाम है तो यह अधूरा विकास है। सनातन काल से ही भारत की सभ्यता ने मनुष्य को कर्तव्यबोध, आत्मसंयम, परिवार, समाज, प्रकृति और विश्व से जुड़े प्राणी के रूप में देखा। इसलिए विकसित भारत को अपनी विकास यात्रा में हम भारतीयों को अपने स्व को पुनः पहचानना होगा। स्व का अर्थ संकीर्ण स्वार्थ नहीं। स्व का अर्थ है, अपनी सभ्यता की चेतना, अपनी सांस्कृतिक स्मृति, अपनी भाषाएं, अपनी ज्ञान परम्परा, अपनी सामाजिक जिम्मेदारी और अपने राष्ट्र के प्रति कर्तव्य। जो राष्ट्र स्वयं को पहचानता है, वही विश्व को कुछ दे सकता है।
विश्वगुरु यह हम भारतीयों को मिलने वाली पदवी नहीं बल्कि वह एक दायित्व है। विश्वगुरु बनने का अर्थ है, जब दुनिया जल संकट से जूझे तो भारत समाधान दे। जब दुनिया युद्ध से थके तो भारत संवाद और शांति का मार्ग दिखाए। जब तकनीक मानवता के सामने नए प्रश्न खड़े करे तो भारत मानव-केंद्रित दृष्टि दे। जब दुनिया पर्यावरणीय संकट से जूझे तो भारत प्रकृति के साथ संतुलित जीवन का अपना अनुभव साझा करे। जब समाज विभाजन से जूझे तो भारत वसुधैव कुटुम्बकम् को केवल श्लोक नहीं, व्यवहार का मॉडल बनाकर दिखाए, तभी विश्वगुरु की संकल्पना सार्थक होगी।
हम भारतीयों के लिए अगले 10 वर्ष एक समग्र राष्ट्रीय जागरण का दशक होना अत्यंत आवश्यक है। भारत को अगले दशक में केवल परियोजनाएं पूरी नहीं करनी हैं। हमें एक समग्र राष्ट्रीय जागरण का निर्माण करना है। व्यक्ति, परिवार, समाज, राजनीति, अर्थव्यवस्था, सुरक्षा, विदेश नीति, पर्यावरण और अन्य विभिन्न क्षेत्र में संतुलित विकास और राष्ट्रीय चेतना का जागरण करना है। ऐसे समय हमारे मन में यह प्रश्न निरंतर होना चाहिए कि आज से 10 वर्ष बाद 2036 का भारत कैसा होगा? आज से दस वर्ष बाद जब हम पीछे मुड़कर देखें तो केवल यह न पूछें- कितने किलोमीटर सड़क बनी? कितने हवाई अड्डे बने? कितनी डिजिटल सेवाएं शुरू हुईं? कितने उद्योग आए? बल्कि यह पूछें- क्या हमारा परिवार अधिक मजबूत हुआ? क्या समाज अधिक समरस हुआ? क्या जातिगत दूरी कम हुई? क्या नागरिक अधिक जिम्मेदार हुआ? क्या राजनीति अधिक परिपक्व हुई? क्या आंदोलन अधिक लोकतांत्रिक और अहिंसक हुए? क्या हमारे युवा अधिक कुशल और आत्मविश्वासी हुए? क्या हमारी विदेश नीति ने भारत की विश्वसनीयता बढ़ाई? क्या हमारी प्रकृति अधिक सुरक्षित हुई? और सबसे महत्वपूर्ण क्या सामान्य भारतीय के जीवन में सम्मान, सुरक्षा, अवसर और आत्मविश्वास बढ़ा? यदि इन प्रश्नों के उत्तर सकारात्मक होंगे, तभी हम कह पाएंगे कि विकसित भारत की यात्रा सही दिशा में आगे बढ़ रही है।
दीपावली प्रकाश का पर्व है, परंतु राष्ट्र के जीवन में प्रकाश केवल बिजली से नहीं आता। ज्ञान का प्रकाश चाहिए और कर्तव्य, समरसता, राष्ट्रभक्ति, स्वावलम्बन का प्रकाश चाहिए। विज्ञान, संस्कार और आत्मविश्वास का प्रकाश चाहिए। भारत के अगले 10 वर्षों की यात्रा केवल इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण की यात्रा नहीं हो सकती। यह व्यक्ति निर्माण की यात्रा होगी, यह समाज को स्वस्थ और राष्ट्र को समर्थ बनाने की यात्रा भी होगी। यह केवल विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में स्थान पाने की यात्रा नहीं होगी।
यह विश्व को कुछ देने योग्य बनने की यात्रा होगी और यही विकसित भारत से विश्वगुरु भारत तक जाने का मार्ग है क्योंकि सड़कें भारत को जोड़ेंगी, तकनीक भारत को सक्षम बनाएगी, अर्थव्यवस्था भारत को समृद्ध बनाएगी, शक्ति भारत को सुरक्षित रखेगी, परंतु संस्कार और जागृत राष्ट्रीय चेतना ही भारत को विश्व के लिए मार्गदर्शक बनाएगी। इसलिए आने वाले 10 वर्षों का सबसे बड़ा संकल्प केवल यह नहीं होना चाहिए कि भारत विकसित बने बल्कि संकल्प इससे बड़ा होना चाहिए, ऐसा भारत बने जो स्वयं विकसित हो, समाज को समरस बनाए, प्रकृति के साथ संतुलित रहे, तकनीक में अग्रणी हो, अपनी जड़ों से जुड़ा हो, विश्व के प्रति उत्तरदायी हो और मानवता को नई दिशा देने में सक्षम हो, यही विकसित भारत की अगली मंजिल है और कदाचित् यही विश्वगुरु भारत की वास्तविक शुरुआत भी।

