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भारतीय लोकतंत्र की अत्यंत प्रभावी प्रक्रिया है, अपने विकास के लिए जनहित में कार्य करने वाली सरकार का चुनाव करना। लोकतंत्र के इस उत्सव को भारतीय जनता अत्यंत उत्साह के साथ मनाती है। विजेता हो या पराजित जो इससे सबक लेता है, उसका भविष्य कुछ आसान हो जाता है। पक्ष और विपक्ष दोनों के लिए यह एक अनिवार्य प्रक्रिया है। हाल ही में मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, मिजोरम और तेलंगाना इन पांच राज्यों में हुए चुनाव परिणामों को इसी वर्ष याने 2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों का सेमीफाइनल माना जाता रहा है।

मिजोरम और तेलंगाना को छोड़ कर अन्य राज्यों में इस सेमीफाइनल को कांग्रेस ने जीत लिया है। जाहिर है इस जीत से कांग्रेस और उसके कार्यकर्ताओं में उत्साह का वातावरण है। पिछली बार मोदी लहर पर सवार होकर राज्य की बागड़ोर जनता ने सौंपी थी। फिर इस बार इतना उल्टापुल्टा क्यों हुआ, यह भाजपा के लिए चिंता व चिंतन का विषय है। इसका सीधा सा अर्थ यही है कि जनता ने अगले फाइनल के लिए सतर्कता की कुछ चेतावनी भाजपा को दी है। इस पर भाजपा नेतृत्व को आत्मचिंतन अवश्य करना चाहिए।

मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, मिजोरम और तेलंगाना इन 5 राज्यों में से 3 राज्यों में भाजपा की सत्ता थी। तीनों राज्यों में जनता ने अब कांग्रेस को राज्य चलाने की जिम्मेदारी दी है। मध्यप्रदेश तथा छत्तीसगढ़ में भाजपा विगत पंद्रह वर्षों से अर्थात तीन बार से सत्ता में थी तथा राजस्थान में विगत पांच वर्षों से। परिवर्तन प्रकृति का नियम है, यह शाश्वत उक्ति भारतीय राजनीति पर भी लागू होती है। लोकतंत्र में एक ही सरकार का निरंतर सत्ता पर बने रहना उस राज्य के विकास के लिए बाधा सिद्ध होता है। भारतीयों की भी यही मानसिकता है। इसी मानसिकता के आधार पर मध्यप्रदेश तथा छत्तीसगढ़ की जनता ने पिछले 15 वर्षों से चली आ रही एक ही पार्टी की सरकार को बदलने का निर्णय किया लगता है। राजस्थान में तो पिछले कई वर्षों से यह परंपरा बन गई है कि वहां जनता प्रत्येक विधान सभा चुनाव में सत्ता परिवर्तन कराती ही है। अतः राजस्थान में भाजपा की सरकार की जगह पर कांग्रेस की सत्ता आना  आश्चर्यजनक घटना नहीं लगती।

फिर भी भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को इन चुनाव परिणामों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए कि आखिर भाजपा इन राज्यों में सरकार चलाने के लिए जनता की पहली पसंद क्यों नहीं बन सकी? केंद्र में मोदी सरकार द्वारा लिए गए निर्णयों के संदर्भ में भारतीय जनता का अत्यंत सकारात्मक रुख भी इस चित्र को क्यों नहीं बदल सका? जनहित का विचार करते समय राजस्थान में जनता की किन समस्याओेंं की ओर ध्यान नहीं दिया गया? ऐसी कौन सी घटनाएं घटीं जिनके कारण जनता ने वसुंधरा राजे सिंधिया को चुनाव में जीत नहीं दिलाई? हालांकि चुनावों के दौरान राजस्थान के वातावरण में गूंजने वाले नारे ‘मोदी तुमसे बैर नहीं, वसुंधरा की खैर नहीं’ ने राजस्थान के चुनाव परिणामों का इशारा दे ही दिया था। इन सारी बातों की ओर अगर ध्यान दिया जाए तो राजस्थान में भाजपा हारी या वसुंधरा राजे हारी, यह प्रश्न महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि इन परिणामों से राजस्थान में पिछड़ती जा रही कांग्रेस को बल मिला। मध्यप्रदेश में पिछले 15 वर्षों में भाजपा की सरकार होने के कारण उसमें एक प्रकार से स्थिरता आ गई थी। भाजपा के स्थानीय नेताओं से लेकर कार्यकर्ताओं में शिथिलता आ गई थी। इसीका परिणाम था वरिष्ठ नेताओं, उनके रिश्तेदारों या समर्थकों के माध्यम से होने वाला भ्रष्टाचार। इस भ्रष्टाचार को जनता ने नजरअंदाज नहीं किया और भ्रष्टाचारी नेताओं को उनकी जगह दिखा दी। इसके साथ ही आरक्षण, किसानों की बढ़ती समस्याएं तथा ग्रामीण क्षेत्र की जनता से संबंधित अनेक विषय इस चुनाव में हार के मुख्य कारण रहे हैं।

छत्तीसगढ़ के साथ अन्य दो राज्यों में भाजपा के 60 प्रतिशत विधायकों को फिर से चुनाव लड़ने का मौका देना जनता को रास नहीं आया है। पुन: टिकट प्राप्त विधायकों मे से 80प्रतिशत भाजपा उम्मीदवारों को तीन राज्यों की जनता ने नकार दिया है। इस बात का सिधा मतलब यह है कि इन्होंने जनता का समाधान नही किया था।

भारत शहरों की अपेक्षा गांवों का देश है। अतः भारत के ग्रामीण स्तर पर होने वाले परिवर्तन भारतीय जनता पार्टी की आंखें खोलने वाले हैं। विकास के संदर्भ में केंद्र की मोदी सरकार के द्वारा जो निर्णय लिए गए हैं उसे राज्य के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने में स्थानीय कार्यकर्ता असफल रहे हैं। भाजपा को यह विचार करना चाहिए कि क्या जनता की अपेक्षाओं को अत्यधिक बढ़ाने में उनका भी सहभाग है। कुछ दिनों पहले नितिन गडकरी ने कहा था “अच्छे दिन भाजपा के गले की हड्डी बन गए हैं”। क्या सचमुच भाजपा ने देश की जनता की अपेक्षाएं अत्यधिक बढ़ा दी हैं? क्या इन अपेक्षाओं की ओर इशारा करते हुए ही भारतीय जनता चुनावों में अपना मत व्यक्त कर रही है? आशा है कि 2019 के चुनावों में इन सभी बातों पर सकारात्मक एवं नकारात्मक विचार करते हुए भाजपा चुनाव में उतरने की तैयारी करेगी।

मोदी के आगे राहुल गांधी का व्यक्तित्व बौना है, यह साफ ही है। फिर भी, आज वे इतने प्रभावशाली क्यों हैं? इस मुद्दे पर भी ध्यान देने की अत्यंत आवश्यकता है। जिस तरह अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रम्प के खिलाफ किया गया अति नकारात्मक प्रचार हिलेरी क्लिटंन को सत्ता से दूर रखने का कारण बना, क्या ऐसा ही कुछ राहुल गांधी के संदर्भ में भी हुआ है? यह सोचने की बात है कि क्या राहुल गांधी के विरुद्ध हद दर्जे का नकारात्मक प्रचार ही भाजपा के लिए भारी पड़ गया? राजनीति में जब सत्ता हाथ में आ जाती है, तब उस दल के कार्यकर्ताओं में शिथिलता और लापरवाही आ जाती है। जनता फिर सबक सिखाती है। यह सबक ही अगली तैयारी और कार्यों की प्रेरणा बन जाता है। इसलिए बहुत निराश होने की आवश्यकता नहीं होती।

मुद्दा यह है कि क्या राहुल गांधी को मिली यह विजय मृत्यु शैया पर पड़ी कांग्रेस को अगले चुनाव में संजीवनी देने का काम करेगी? या कि क्या इस चुनावी पराजय से सबक लेकर भाजपा फिर से उड़ान भरेगी?

This Post Has 3 Comments

  1. अमोल जी नमस्कार,,,
    आपने यह लेख बहुत ही अच्छा लिखा है,इस समय भारतीय राजनीति एवम भारतीय जनता पार्टी में मा.मोदी जी का कोई भी दूसरा सानी नही है,पर आपकी एक बात गौर करने लायक है कि आपने लिखा है कि क्या राहुल गांधी के विरुद्ध हद दर्जे का नकारात्मक प्रचार ही भाजपा के लिए भारी पड़ गया, यह भी एक कारण हो सकता है, और भी कई ऐसे मुद्दे है जिसे भाजपा तुरंत भुना ना चाहती है ,धीरज से काम लेकर और पिछले चुनाव परिणाम के नतीजों से सबक ले कर अपने पैर पुनः जमाने की कोशिश करनी चाहिए.

  2. BJP has no option…

    *Target 2019,  2024   &  2029*

    *#Bring* following bills in Special Joint Parliamentary session;

    #Common Civil Code Bill
    #Population Control Bill
    #Ram Mandir Nirmaan Bill
    #Economy Based Reservation Bill
    #Art.370/35A Repealing Bill
    #Resettlement of Kashmiri Pandits back in J&K

    No Other Option….

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