| भारत में मौसम व त्योहार जीवन के अभिन्न हिस्से हैं। उनमें से एक है मकर संक्रांति का त्योहार। जिसमें सूर्य के उत्तरायण होने का उत्सव मनाया जाता है। इस समय खेतों में नई फसल लहलहाने लगती है, शादी-विवाह जैसे शुभ कार्य आरम्भ हो जाते हैं। |
प्रयागराज को तीर्थों का राजा कहा जाता है। यह वह धरा है जहां गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती जैसी नदियां, सदियों से एक आध्यात्मिक संस्कृति को आकार देती आई हैं। यहां लोक-रंग और अध्यात्म ऐसे घुलते-मिलते हैं कि एक अद्भुत व मन मोहित करने वाली सांस्कृतिक आभा स्वतः ही सम्पूर्ण विश्व में फैलती है।
जब जनवरी में कड़ाके की ठंड उत्तर भारत को अपनी चपेट में ले लेती है, तब इसी पावन संगम की भूमि पर श्रद्धालुओं, तीर्थयात्रियों और कल्पवासियों का आगमन आरम्भ होता है। यह आगमन कोई साधारण नहीं होता है बल्कि यह उन आत्मिक यात्रियों का सच्चा संगम है जो शांति, साधना और आध्यात्मिक उर्जा की खोज में यहां पहुंचते हैं।
पौष पूर्णिमा से प्रयागराज के विश्व प्रसिद्ध माघ मेले का शुभारम्भ होता है, यह वह परम्परा जिसने सदियों से अपनी गरिमा और आध्यात्मिक महत्ता को अक्षुण्ण रखा है। इस मेले की प्रतिष्ठा का उल्लेख स्वयं गोस्वामी तुलसीदास ने किया है। श्रीरामचरितमानस के बालकांड में उन्होंने माघ स्नान और प्रयागराज की पावन महत्ता का वर्णन इन पंक्तियों में किया है-
माघ मकरगत रवि जब होई। तीरथ पतिहिं आव सब कोई॥
देवदनुज किन्नर नर श्रेनी। सादर मज्जहिं सकल त्रिवेनी॥
अर्थात, माघ मास में जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है, तब सभी पुण्य-साधक प्रयागराज में आगमन करते हैं। देव, दानव, किन्नर और साधारण मनुष्य सभी मिलकर पवित्र त्रिवेणी संगम पर स्नान, ध्यान और साधना करते हैं और आत्मिक शुद्धि एवं कल्याण की कामना करते हैं।
माघ मेले की प्रमुख तिथि मकर संक्रांति होती है, इस दिन देशभर से असंख्य श्रद्धालु पावन त्रिवेणी संगम में स्नान के लिए आते हैं। मकर संक्रांति के दिन सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण हो मकर राशि में प्रवेश करते हैं, जिस कारण इस दिन को मकर संक्रांति या सूर्य उत्तरायण भी कहा जाता है। इस दिन का महत्व इसलिए है क्योंकि मकर संक्रांति के बाद से दिन लम्बे होने लगते हैं, खेतों में नई फसलें पककर तैयार होती हैं और इसे शुभ कार्यों की शुरुआत के लिए अत्यंत मंगलकारी माना जाता है।
सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने पर उत्तर भारत विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान और बिहार में मकर संक्रांति का पर्व बड़े उत्साह से मनाया जाता है। देश के अन्य हिस्सों में भी सूर्य के उत्तरायण होने और नई फसल के आगमन की प्रसन्नता को अलग-अलग नामों और परम्पराओं के साथ मनाया जाता है। यह एक ऐसा अवसर है जो विविधताओं के बीच भारत की सांस्कृतिक एकता को खूबसूरती से प्रदर्शित करता है।
खिचड़ी – उत्तर प्रदेश में मकर संक्रांति को खिचड़ी के नाम से भी जाना जाता है। उत्तर प्रदेश में इस दिन विशेष तौर पर परम्परागत तरीके से नए चावल और उड़द की दाल, मटर आदि सब्जियां डालकर खिचड़ी का पकवान बनाया जाता है।
तिल संक्रांति – बिहार में मकर संक्रांति को तिल संक्रांति भी कहते हैं। इस दिन बिहार के अधिकतर भाग में सुबह के समय चूड़ा, दही, तिल से बने पदार्थ का भोजन किया जाता है और शाम को खिचड़ी बनाई जाती है।
माघ बिहू – असम में मकर संक्रांति के अवसर पर बिहू पर्व मनाया जाता है, जिसे विशेष रूप से माघ बिहू भी कहा जाता है। यह त्योहार नई फसल के पककर तैयार होने की खुशी में मनाया जाता है। माघ बिहू की सुबह लोग स्नान-ध्यान कर मेजी (असम का पारम्परिक अलाव) प्रज्वलित करते हैं, जिससे बिहू के मुख्य उत्सव की शुरुआत होती है। मेजी के पूर्ण रूप से जल जाने के बाद उसकी राख को खेतों में छिड़का जाता है, जो कृषि कार्यों की शुभता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
शिशुर संक्रांत – कश्मीर घाटी में मकर संक्रांति को शिशुर संक्रांत कहा जाता है, जबकि जम्मू के कुछ हिस्सों में इसे माघी संक्रांत के नाम से जाना जाता है। इस अवसर पर तिल और गुड़ से बने मीठे व्यंजनों का सेवन शुभ माना जाता है। इस दिन कश्मीरी पंडित विशेष रूप से चावल और कांगरी (हाथ से पकड़ने वाला कोयले से जलने वाला गर्माहट देने वाला पात्र) का दान करते हैं।

लोहड़ी – पंजाब का प्रसिद्ध और उल्लासमय पर्व लोहड़ी नई फसल के आगमन की खुशी में मनाया जाता है। यह त्योहार मकर संक्रांति से एक दिन पूर्व, 13 जनवरी को मनाया जाता है। इस दिन लोग सामूहिक रूप से एकत्र होकर लोहड़ी की अग्नि प्रज्वलित करते हैं और उसमें तिल, मूंगफली तथा नई फसल के प्रतीक के तौर पर डालते हैं।
सुगी – कर्नाटक के ग्रामीण क्षेत्रों में मनाया जाने वाला यह सुगी त्योहार, एक स्थानीय फसल उत्सव है, जहां पूरा गांव, मौसम के बदलाव और नई फसल के आगमन की खुशियां मनाने के लिए एकजुट होता है। यह त्योहार प्रत्येक वर्ष 14 जनवरी को मनाया जाता है। इस अवसर पर एल्लु बिरोद्धु नाम की एक विशेष परम्परा निभाई जाती है, जिसमें रिश्तेदारों को तिल (एल्लु), भुनी मूंगफली, सूखा नारियल और गुड़ (बेला) जैसे खाद्य पदार्थों से भरी थालियों के साथ नए कपड़े भेंट किए जाते हैं।
पोंगल – तमिलनाडु में मकर संक्रांति को पोंगल के रूप में मनाया जाता है। चार दिनों तक चलने वाला यह भव्य उत्सव नई फसल की खुशी का प्रतीक है। इस दौरान नए कटे चावल से तैयार किया गया मीठा पोंगल प्रमुख व्यंजन के रूप में बनाया जाता है। गांवों में गन्ने से सजे पारम्परिक मिट्टी के बर्तनों में पोंगल पकाने की परम्परा आज भी पूरे तमिलनाडु में उत्साह के साथ निभाई जाती है।

तिरमूरी – मकर संक्रांति का यह त्योहार केवल भारत में ही नहीं बल्कि पड़ोसी देश पाकिस्तान में भी मनाया जाता है। पाकिस्तान में रहने वाले सिंधी समुदाय द्वारा मनाया जाने वाला तिरमूरी त्योहार इस बात का सुंदर उदाहरण है कि प्राचीन भारतीय परम्पराएं किसी एक धर्म या क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं। 14 जनवरी का दिन हर साल सिंधी समुदाय द्वारा तिरमूरी के उत्सव के रूप में मनाया जाता है। तिर का अर्थ है तिल, और मूरी का अर्थ है मूली, इन्हीं दो तत्वों के आधार पर इस त्योहार का नाम पड़ा है।
देश के अन्य भागों जैसे महाराष्ट्र, गुजरात, हरियाण में भी मकर संक्रांति का त्योहार व्यापक रूप से मनाया जाता है। पश्चिमी भारत के महाराष्ट्र राज्य में इस दिन को माघी संक्रांत कहा जाता है। यहां त्योहार की शुरुआत लोग तिल युक्त पानी से स्नान कर करते हैं। इसके अलावा, महिलाएं एक-दूसरे को हल्दी और कुमकुम का आदान-प्रदान करती हैं। गुजरात में मकर संक्रांति के अवसर पर पतंगोत्सव व्यापक तौर पर मनाया जाता है। इस दिन गुजरात के आसमान में केवल और केवल पतंग दिखाई देती हैं।
मकर संक्रांति केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि एक जीवनशैली है, एक ऐसा अवसर जो हमें प्रकृति से जोड़ता है, उस प्रकृति से जो मानव जीवन की आधारशिला है।
-दिव्या द्विवेदी

