रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी की दिशा में अत्याधुनिक तकनीक, अनुसंधान और समयबद्ध उत्पादन अभी भी बड़ी चुनौती बने हुए हैं। निजी क्षेत्र और स्टार्ट-अप्स की भागीदारी बढ़ाना भी एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है। स्वदेशी रक्षा उत्पादन से रोजगार सृजन और आर्थिक मजबूती को नया बल मिलता है।
भारतीय सेनाएं ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान के अंतर्गत स्वदेशीकरण पर विशेष बल दे रही हैं, इसका प्रमुख उद्देश्य रक्षा आयात को सीमित व समाप्त कर घरेलू उत्पादन को प्राथमिकता प्रदान करना है। युद्ध के बदलते स्वरूप तथा अतिआधुनिक तकनीकी पर आधारित हथियार, उपकरण तथा अन्य आवश्यक युद्धक सामग्री ने देश की रक्षा चुनौतियों को बहुत ही बहुआयामी बना दिया है।
वैश्वीकरण के इस बदलते परिवेश एवं राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की साम्राज्यवादी व विस्तारवादी सोच के परिणामस्वरूप अब केवल तत्कालिक रक्षा उपकरणों तथा आवश्यक हथियारों का क्रय किया जाना और तकनीकी तौर पर अपग्रेडेशन ही इन घातक एवं बहुआयामी समस्याओं का समाधान नहीं है बल्कि आधुनिकीकरण के साथ हमारी सेनाओं को अब नए दौर के वारफेयर से सम्पन्न करना अनिवार्य हो गया है।

यह निर्विवाद रूप से सत्य है कि वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में वही देश अब बाह्य आक्रमणों और रक्षा चुनौतियों से सही रूप में निपट सकता है, जो हथियारों और अन्य आवश्यक सैन्य सामग्री के संदर्भ में पूरी तरह से आत्मनिर्भर हो। वर्तमान में भारत सरकार स्वदेशी रक्षा उत्पाद एवं रक्षा उद्योग पर अपना विशेष बल दे रही है। यही कारण है कि आज हमारी सेनाओं की गोला-बारूद की लगभग 90 प्रतिशत आवश्यकताएं घरेलू रक्षा उद्योग से ही पूरी की जा रही हैं।
आपरेशन सिंदूर, अमेरिका का ईरान पर हमला, रूस तथा यूक्रेन के बीच अनवरत जारी जंग तथा गाजा में इजराइल व हमास के बीच जारी लड़ाई में यह स्पष्ट हो गया कि अब निर्णायक लड़ाई प्रमुख रूप से आधुनिक गतिशील व तकनीकी युद्ध हथियारों से ही सफल सिद्ध हो सकेगी। साइबर तथा अंतरिक्ष युद्ध भी आधुनिक लड़ाई में निर्णायक व सहयोगी सिद्ध हो रहे हैं। इसके साथ ही ड्रोन तथा यूएवी की चुनौतियां भी युद्ध को बहुत जटिल बना रही हैं। यही नहीं अब तो इलेक्ट्रॉनिक हथियारों की आधुनिक युद्धों में सक्रिय रूप से भ्ाूमिका बढ़ी है।
व्याप्त वर्तमान चुनौतियों को विशेष रूप से दृष्टि में रखते हुए ही भारतीय सेना ने ‘आत्मनिर्भर भारत’ तथा ‘मेक इन इंडिया-मेक फॉर द वर्ल्ड’ की दृष्टि के अनुरूप स्वदेशीकरण की प्रक्रिया को तेजी के साथ गति दी है। सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने स्पष्ट रूप से कहा कि “हम भविष्य के युद्धों की तैयारी कर रहे हैं तथा आत्मनिर्भरता के लिए स्वदेशीकरण बहुत महत्वपूर्ण है।”

उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि भारतीय सेनाएं अब भविष्य के लिए तैयार बल के रूप में अनवरत आगे बढ़ रही हैं और स्वदेशी उपकरणों की आवश्यकता पर जोर देते हुए इसे एक “रणनीतिक आवश्यकता” बताया। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि आपरेशन सिंदूर ने एक “नया मानक” स्थापित किया। इस ऑपरेशन ने भारतीय सेना की त्वरित, समन्वित एवं सटीक प्रतिक्रिया देने की क्षमता का स्पष्ट प्रदर्शन किया। इस ऑपरेशन ने एक परिपक्व और आत्मविश्वास से परिपूर्ण संगठन का परिचय दिया, जो संयमित, सशक्त, सक्षम तथा उत्तरदायित्वपूर्ण भ्ाूमिका के माध्यम से राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा करने में सक्षम है।
जनरल द्विवेदी ने स्पष्ट रूप से कहा कि “हम न केवल वर्तमान चुनौतियों का समाधान कर रहे हैं बल्कि इसे एक अवसर मानकर भविष्य के युद्धों की तैयारी भी कर रहे हैं। इस दिशा में नवीन संरचनाएं भी बनाई जा रही हैं, जिसे भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरुप सुसंगठित, सुसज्जित एवं सुप्रशिक्षित किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि भारतीय थल सेना में ‘भैरव’ बटालियन और ‘शक्ति बाण’ रेजीमेंट जैसी इकाईयों का भी गठन किया गया है।
भारतीय सेना अपने हथियार प्रणालियों में गोला-बारूद और सटीक गोलाबारुद के लगभग 200 वैरियंट (संस्करण या प्रकार) का प्रयोग करती है। केंद्रीय नीति सुधारों और उद्योगों के साथ जुड़ाव के जरिए इनमें से 90 प्रतिशत से अधिक का स्वदेशीकरण कर लिया गया है और उन्हें घरेलू स्रोतों के माध्यम से प्राप्त किया जा रहा है। इससे सेना की लम्बी अवधि की युद्ध क्षमता सुद़ृढ़ हुई है।
तेजस हल्के लड़ाकू विमान (एलसीए) एम-के 1ए की तीसरी उत्पादन लाइन और प्रशिक्षण विमान एचटीटी 40 के दूसरे विनिर्माण संयंत्र का उद्घाटन करने के अवसर पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने स्पष्ट रूप से कहा था कि भारत घरेलू रक्षा उत्पादन को 100 प्रतिशत तक ले जाने की दिशा में काम कर रहा है क्योंकि विदेशी सैन्य आपूर्ति पर निर्भरता रणनीतिक कमजोरी को पैदा करती है।
उन्होंने कहा- भारत के स्वदेशी हल्के टैंक से एंटी टैंक गाइ
डेड मिसाइल (एटीजीएम) नाग एमके 2 का परीक्षण किया जा चुका है। यह रक्षा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि है। इस टैंक को रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) द्वारा डिजाइन और विकसित किया गया है तथा इसका निर्माण लार्सन एंड टुब्रो (एल एंड टी) लिमिटेड द्वारा किया गया है।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने स्पष्ट रूप से कहा कि “एक समय था, जब देश अपनी रक्षा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए दूसरे देशों पर पूरी तरह से निर्भर था और लगभग 65-70 प्रतिशत रक्षा उपकरण आयात किए जाते थे, पर आज यह स्थिति पूरी तरह बदल गई है। अब भारत 65 प्रतिशत से अधिक उत्पादन अपने भ्ाू-भाग में कर रहा है। बहुत जल्द हम अपने घरेलू उत्पादन को 100 प्रतिशत तक ले जाएंगे। निश्चित रूप से स्वदेशी और स्वावलम्बन पर तब तक बल दिए जाने की आवश्यकता है, जब तक वांछित सफलता न प्राप्त हो सके।
जहां एक ओर सरकार को स्वदेशीकरण की राह को आसान बनाना होगा, वहां समाज को भी अब अपने सहयोग, समर्थन एवं सहानुभ्ाूति देने के लिए अनवरत रूप से तत्पर, तैनात व तैयार रहना होगा। ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर-भारत’ का लक्ष्य तभी सार्थक सिद्ध हो सकेगा, जब हमारी सुरक्षा सेनाएं स्वदेशी ड्रोन से लेकर स्वदेशी लड़ाकू विमान व परमाणु पनडुब्बी तक से लैस हो जाएंगे।
वर्तमान वैश्विक सुरक्षा परिद़ृश्य, तीव्रगति से बदलती युद्ध तकनीक और भू- राजनीतिक, भू -रणनीतिक व भू-आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच भारतीय हथियारों का स्वदेशीकरण केवल एक विकल्प नहीं अपितु राष्ट्रीय सुरक्षा की अनिवार्य शर्त बन चुका है। विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि हमारा देश एक लम्बी अवधि तक विश्व के सबसे बड़े हथियार आयात करने वाले देशों में से एक रहा है, जिसके परिणामस्वरूप ही रणनीतिक निर्भरता और आर्थिक बोझ दोनों बढ़े। ऐसे परिवेश में आत्मनिर्भरता तथा स्वदेशीकरण रक्षा उत्पादन समय की मांग बन चुका है। ट्रम्प की बढ़ती दादागीरी, दबंगई, दहशतगर्दों एवं दुनियाभर पर दबाव बनाने का दम्भभरा कदम उठा रहे है। इसके साथ ही बेलगाम बांग्लादेश भारत के हितों के विरुद्ध पाकिस्तान और चीन के गठजोड़ में शामिल होने के लिए तत्पर है। अत: ऐसे परिवेश में भारत की सुरक्षा चुनौतियां अप्रत्याशित रूप से और भी बढ़ गई हैं।
वर्तमान वैश्विक स्थिति के संदर्भ में राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू ने भी 77वें गणतंत्र दिवस पर राष्ट्र के नाम सम्बोधन में आत्मनिर्भरता और स्वदेशी के मूलमंत्र पर जोर देते हुए कहा कि हम विश्वस्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण में निवेश करके अपनी आर्थिक संरचना का उच्चस्तर पर पुनर्निमाण कर रहे हैं। भविष्य के हथियारों के निर्माण में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) की भूमिका विशेष सराहनीय है क्योंकि 5 मैक से अधिक गति वाली हाइपरसोनिक गाईडेड मिसाइल, सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस एनजी, हाइपरसोनिक ब्रह्मोस 2, एमके-2 व एमके-3 अस्त्र एयर टू एयर मिसाइल जो बियांड विजुअल तथा रुद्रम 2 तथा 3 एयर टू ग्राउंड 5.5 मैक वाली हाइपर सोनिक विकिरण विरोधी मिसाइल विकसित कर रहा है। इसके साथ हवाई हमलों को रोकने के लिए तथा जवाबी कार्यवाही हेतु सुदर्शन चक्र तैयार हो रहा है। आशा एवं विश्वास है कि आगामी वर्ष 2035 तक देश को हमलावर लड़ाकू विमान, घातक प्रक्षेपास्त्र और ड्रोन को सरलता से निशाना बनाने वाले सुदर्शन चक्र भारतीय सेनाओं में शामिल हो जाएंगे।
रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम (डीपीएसयू) आत्मनिर्भरता व स्वदेशीकरण के संदर्भ में अपनी सक्रिय एवं सशक्त भ्ाूमिका निभा रहा है। ‘मेक इन इंडिया’ व ‘मेक फॉर वर्ल्ड’ एवं ‘आत्मनिर्भर’ और ‘स्वदेशी’ वाली सोच रक्षा के क्षेत्र में कायाकल्प करने की ओर अबाधगति से अनवरत अग्रसर हो रही है। यही कारण है कि एक बड़ी संख्या में स्टार्ट-अप और हजारों सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्यम इस आपूर्ति श्रृंखला का एक बड़ा हिस्सा बन चुके हैं। ऑटो मोबाइल और ऑटो कम्पोनेंट उद्योग के लिए उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना भी सहायक सिद्ध हो रही है। अब समय आ गया है कि हम विदेशी हथियारों के आयात पर अपना प्रतिबंध लगाएं और आत्मनिर्भरता व स्वदेशी निर्माण के साथ हथियारों के निर्यात के मामले में सक्षम व समर्थ हो सकें। इसके लिए बड़े पैमाने पर संसाधनों, अनुसंधान एवं मजबूत ढांचे को सशक्त व सक्षम बनाना अब समय की मांग है।
स्वदेशीकरण पर विशेष ध्यान देने की आवश्यक इसलिए है ताकि देश रणनीतिक स्वतंत्रता, प्रतिबंध व राजनीतिक दबाव तथा आयातित हथियारों की आपूर्ति बाधा से बच सके तथा इससे भारी विदेशी मुद्रा की बचत भी होगी। स्वदेशीकरण के माध्यम से ही लड़ाकू विमान तेजस, प्रक्षेपास्त्र आकाश, ब्रह्मोस, आकाश एनजी, अर्जुन टैंक, गतिशील व विध्वंसक तोपें, विमान वाहक पोत विक्रांत तथा ड्रोन आधारित निगरानी में अब हम सक्षम हो सके हैं। यद्यपि आगे की राह को सरल व सफल बनाने हेतु डीआरडीओ, निजी क्षेत्र का सहयोग, कृत्रिम बुद्धिमता (एआई), क्वांटम, रोबोटिक्स व स्पेस तकनीकी पर विशेष ध्यान, सेनाओं की आवश्यकताओं के अनुसार डिजाइन टू डिलीवरी मॉडल तथा रक्षा निर्यात को रणनीतिक उपकरण बनाने पर बल देना होगा। भारतीय हथियारों का स्वदेशीकरण राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक सुदृढ़ता, आत्म सम्मान, श्रेष्ठता और वैश्विक सामयिक व सामरिक स्वयत्तता का आधार है। वैश्वीकरण के कारण बदलती दुनिया, क्षेत्रीय अस्थिरता एवं युद्ध की प्रकृति को दृष्टि में रखते हुए यह एक सामयिक ही नहीं बल्कि अपरिहार्य आवश्यकता है। स्वदेशीकरण अभियान के परिणामस्वरूप रक्षा निर्यात हमारे देश के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि सिद्ध होगी।
–डॉ. सुरेंद्र कुमार मिश्र
