हिन्दी के दधीचि पंडित श्रीनारायण चतुर्वेदी

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वे अंग्रेजी काल में उत्तर प्रदेश में शिक्षा प्रसार अधिकारी थे। एक बार तत्कालीन प्रदेश सचिव ने उन्हें यह आदेश जारी करने को कहा कि भविष्य में हिन्दी रोमन लिपि के माध्यम से पढ़ायी जाएगी। इस पर वे उससे भिड़ गये। उन्होंने साफ कह दिया कि चाहे आप मुझे बर्खास्त कर दें; पर मैं यह आदेश नहीं दूँगा। इस पर वह अंग्रेज अधिकारी चुप हो गया। उनके इस साहसी व्यवहार से देवनागरी लिपि की हत्या होने से बच गयी।

अमृत महोत्सव वर्ष में हिंदी का वैभव

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पिछले कुछ वर्षों में हिंदी ने अन्य बड़ी वैश्विक भाषाओं की तुलना में अधिक तीव्रता से अपना विस्तार किया है परंतु अभी भी मौलिक कार्यों की कमी है जिसे पूरा किया जाना अति आवश्यक हो जाता है। इसके लिए भारत सरकार को बड़े पैमाने पर सर्वेक्षण और शोध करवाना चाहिए ताकि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाएं वैश्विक स्तर पर वह ऊंचाई छू सकें जो अंगे्रजी और अन्य यूरोपीय भाषाओं को प्राप्त है।

क्या हो तकनीकी हिंदी का भविष्य

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हम खुशफहमी में जीने वाले लोग हैं इसलिए तकनीकी क्षेत्र में हिंदी के बढ़ाव को लेकर अति प्रसन्न हो जाते हैं लेकिन हमें पता होना चाहिए कि हिंदी और हिंदी भाषी अंतरराष्ट्रीय बाजार में केवल उपभोक्ता मात्र बनकर रह गए हैं जबकि हमें उत्पादक बनने की आवश्यकता है ताकि हमारी अन्य भारतीय भाषाओं के लिए भी वैश्विक स्तर पर रास्ता खुल सके।

स्वभाषा और हिंदी भारी न हो कोई पलड़ा

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स्व भाषा प्रेम के नाम पर अन्य भाषाओं के प्रति दुराग्रह पालने की प्रवृत्ति के कारण भारतीय भाषाओं और उनके लालित्य का ह्रास हो रहा है। सरकारी और सामाजिक स्तर पर भारतीय भाषाओं के विकास और संवर्धन के सार्थक प्रयास भी नहीं हो रहे हैं जबकि आवश्यक है कि बड़े पैमाने पर विज्ञान, तकनीक जैसे विषयों पर गम्भीर लेखन हो ताकि स्वभाषा का विकास हो सके।

हमें अपनी जड़ों की ओर लौटना होगा 

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उत्तम शिक्षा के लिए पाठ्यक्रम में चारित्रिक विकास एवं मानवीय गुणों को विकसित करने के विषयों को भी सम्मिलित किया जाना चाहिए। विज्ञान एवं तकनीकी विषयों से केवल मनुष्य की भौतिक उन्नति होती है, किन्तु औद्योगिक उन्नति के साथ-साथ मानवीय मूल्य भी विकसित होने चाहिए, जिससे नागरिक सामाजिक, नैतिकता तथा आध्यात्मिक मूल्यों को प्राप्त कर सकें। वर्तमान युग में मनुष्य ज्यों-ज्यों भौतिक उन्नति कर रहा है, त्यों-त्यों वह जीवन के मूल्यों को पीछे छोड़ता जा रहा है। आपसी पारिवारिक संबंध टूटते जा रहे हैं। किसी को किसी की तनिक भी चिंता नहीं है। परिवार के वृद्धजनों को वृद्धाश्रम में डाल दिया जाता है तथा बच्चे बोर्डिंग स्कूल में भेज दिए जाते हैं। ग्रामों की पैतृक संपत्ति को बेचकर महानगरों में छोटे-छोटे आवासों में भौतिक सुख-सुविधा में जीने को ही मनुष्य ने जीवन की सफलता मान लिया है। यदि हमें अपनी जड़ों की ओर लौटना है, तो सबसे पहले वर्मान शिक्षा पद्धति में सुधार करना होगा।   

क्या आप ‘काँन्वेंट’ शब्द का मतलब जानते है ?

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काँन्वेंट शब्द पर गर्व न करें सच समझे। ‘काँन्वेंट’ सबसे पहले तो यह जानना आवश्यक है कि ये शब्द आखिर आया कहाँ से है, तो आइये प्रकाश डालते हैं। ब्रिटेन में एक कानून था लिव इन रिलेशनशिप बिना किसी वैवाहिक संबंध के एक लड़का और एक लड़की का साथ में रहना। जब साथ में रहते थे तो शारीरिक संबंध भी बन जाते थे, तो इस प्रक्रिया के अनुसार संतान भी पैदा हो जाती थी तो उन संतानों को किसी चर्च में छोड़ दिया जाता था। अब ब्रिटेन की सरकार के सामने यह गम्भीर समस्या हुई कि इन बच्चों का क्या किया जाए तब वहाँ की सरकार ने काँन्वेंट खोले अर्थात् जो बच्चे अनाथ होने के साथ-साथ नाजायज हैं उनके लिए काँन्वेंट बने। उन अनाथ और नाजायज बच्चों को रिश्तों का एहसास कराने के लिए उन्होंने अनाथालयों में एक फादर एक मदर एक सिस्टर की नियुक्ति कर दी क्योंकि ना तो उन बच्चों का कोई जायज बाप है न ही माँ है। तो काँन्वेन्ट बना नाजायज बच्चों के लिए जायज।

अध्यापकों की सीधी भर्ती से शिक्षा में सुधार

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योजना के प्रारूप के अनुसार, इन विशेषज्ञों को अनुबंध के आधार पर विज्ञान, अभियांत्रिकी, मीडिया, साहित्य, उद्यमिता, सामाजिक विज्ञान, ललित कला, लोकसेवा और सशस्त्र बल आदि क्षेत्रों में नियुक्ति दी जाएगी। इस नीति को सितंबर माह में 'प्रोफेसर आफ प्रैक्टिसÓ (पेशेवर प्राध्यापक) रूप में अधिसूचित किया जाएगा। पीएचडी जैसी पात्रता भी अनिवार्य नहीं रह जाएगी। शिक्षण संस्थानों में स्वीकृत कुल पदों में से दस प्रतिशत पदों की नियुक्ति इस योजना के अंतर्गत की जाएगी। फिलहाल देशभर में पत्रकारिता के विवि में अनेक पेशेवर पत्रकार इसी आधार पर अध्यापन का कार्य कर रहे हैं।   

शिक्षा में भारत विश्व गुरु बनने की ओर अग्रसर

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प्राचीन भारत में विदेशों से विद्यार्थी शिक्षा अर्जन के लिए भारत आते थे। क्या भारत में शिक्षा व्यवस्था में सुधार कर पुनः विदेशों को भारत में शिक्षा अर्जन हेतु आकर्षित नहीं किया जाना चाहिए। इसके लिए हमें भारत की शिक्षा प्रणाली में आमूल चूल परिवर्तन करने होंगे और भारतीय संस्कृति की मजबूत जड़ों की ओर पुनः लौटना होगा। विकसित देशों में बसे लोग आज भौतिकवादी नीतियों से बहुत परेशानी महसूस कर रहे हैं। आज अमेरिका एवं अन्य विकसित देशों की आधी से ज़्यादा आबादी मानसिक रोग से पीड़ित हैं और वे इन मानसिक बीमारियों से निजात पाना चाहते हैं। जिसका हल केवल भारतीय प्राचीन संस्कृति को अपनाकर ही निकाला जा सकता है।

शिक्षा का अधिकार: लागु नहीं कर रहे है विद्यालय ?

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इस जानकारी में कुल 290 स्कूल शामिल हैं जिन पर शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू है। पिछले 5 साल में सिर्फ एक स्कूल के खिलाफ कार्रवाई हुई है। अंधेरी वेस्ट स्थित राजरानी मल्होत्रा ​​स्कूल के खिलाफ कार्रवाई की गई है। सरकार से प्रतिपूर्ति राशि नहीं मिलने के कारण स्कूल ने प्रवेश से इनकार कर दिया था। सुनवाई के बाद स्कूल में दाखिले का आदेश दिया गया। उसके बाद स्कूल ने स्कूल स्तर पर प्रवेश देकर छात्र की ऑनलाइन शिक्षा शुरू की।

अतिवादी शिक्षा पर लगे अंकुश

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बंटवारे के समय करोड़ों मुसलमान पाकिस्तान नहीं गए क्योंकि उनकी गर्भनाल यहां से जुड़ी हुई थी। राष्ट्र के विकास और रक्षा के लिए भी हमेशा तत्पर रहे परंतु संविधान में सेक्युलर शब्द जोड़ दिए जाने और सरकारों द्वारा प्रश्रय पाने के बाद कठमुल्लाओं ने लोगों को भड़काना शुरू किया और मुख्यधारा से काटकर रख दिया।

लीक से हटकर पढ़ाया जाएगा सोच का पाठ

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नए अविष्कार या अनुसंधानों की शुरुआत अकसर समस्या के समाधान से होती है, जिसमें उपलब्ध संसाधनों को परिकल्पना के अनुरुप ढालकर क्रियात्मक अथवा रचनात्मक रूप दिया जाता है। यही वैचारिक स्त्रोत अविष्कार के आधार बनते हैं। किंतु हमारी शिक्षा पद्धति से इन कल्पनाशील वैचारिक स्त्रोतों को तराशने का अध्यापकीय कौशल कमोबेश नदारद रहा है। लिहाजा सोच कुंठित होती रही है। अंग्रेजी का दबाव भी नैसर्गिक प्रतिभाओं को कुंठित कर रहा है। देर से ही सही आईआईटी मद्रास ने सोच का पाठयक्रम शुरू करके एक आवश्यक  पहल की है।

बाजारवादी की देन है नम्बर संस्कृति को बढ़ावा

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सवाल यही है कि क्या परीक्षा परिणाम ही सफलता की गारंटी है। बेशक़ नहीं! अब परीक्षा परिणाम स्कूलों के प्रमोशन का जरिया बन गया है। स्कूलों में मैरिट बच्चों के बड़े बड़े विज्ञापन छपेंगे ताकि स्कूलों का महिमामंडन किया जा सके। मीडिया में सफल बच्चों के इंटरव्यू की बाढ़ लगी होगी। लेकिन उन बच्चों का क्या जिन्होंने कम नम्बर लाए है? क्या जीवन में सफलता का पैमाना सिर्फ नम्बर ही रह गया है।

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