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Ocean Farming

Ocean Farming: महासागर की नई अर्थव्यवस्था

by हिंदी विवेक
in आर्थिक
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भूमिगत जल के अति-दोहन ने अनेक क्षेत्रों में जल संकट को गहरा कर दिया है। दूसरी ओर जनसंख्या का निरंतर विस्तार इस सदी के मध्य तक वैश्विक खाद्य मांग को अभूतपूर्व स्तर तक पहुँचा सकता है। ऐसे परिदृश्य में समुद्री खेती या महासागरीय कृषि एक संभावित विकल्प के रूप में उभर रही है।

मानव सभ्यता का इतिहास जल के इर्द-गिर्द रचा गया है। प्राचीन नगर नदियों के किनारे बसे, समुद्रों ने व्यापार के मार्ग खोले और जल ने जीवन का आधार निर्मित किया। किंतु इक्कीसवीं सदी में जल का महत्व एक नए रूप में उभर रहा है। बढ़ती जनसंख्या, घटती कृषि योग्य भूमि, जलवायु परिवर्तन, मिट्टी की उर्वरता में कमी और पोषण संकट जैसी चुनौतियों ने मानव को यह सोचने पर विवश किया है कि भविष्य की खाद्य सुरक्षा केवल पारंपरिक कृषि पर निर्भर रहकर सुनिश्चित नहीं की जा सकती। ऐसे में पृथ्वी के उस विशाल नीले विस्तार की ओर निगाहें उठना स्वाभाविक है, जो अभी तक हमारी खाद्य व्यवस्था में अपेक्षाकृत सीमित भूमिका निभाता रहा है। प्रश्न है, क्या भविष्य का अन्न सागर में खोजा जा सकता है?

पृथ्वी की सतह का लगभग सत्तर प्रतिशत भाग महासागरों से आच्छादित है, परंतु वैश्विक खाद्य उत्पादन का अधिकांश हिस्सा भूमि पर आधारित है। कृषि योग्य भूमि का अंधाधुंध विस्तार वनों की कटाई, जैव विविधता के ह्रास और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन से जुड़ा हुआ है। भूमिगत जल के अति-दोहन ने अनेक क्षेत्रों में जल संकट को गहरा कर दिया है। दूसरी ओर जनसंख्या का निरंतर विस्तार इस सदी के मध्य तक वैश्विक खाद्य मांग को अभूतपूर्व स्तर तक पहुँचा सकता है। ऐसे परिदृश्य में समुद्री खेती या महासागरीय कृषि एक संभावित विकल्प के रूप में उभर रही है।

समुद्री खेती का आशय समुद्र में वैज्ञानिक ढंग से खाद्य जीवों और वनस्पतियों का उत्पादन करना है, जो आज विश्व के अनेक देशों में व्यवहारिक रूप ले चुका है। उदाहरण के लिए चीन और जापान में समुद्री शैवाल तथा केल्प की बड़े पैमाने पर खेती की जाती है, जिनका उपयोग भोजन से लेकर औषधि और उद्योग तक में होता है।

Regenerative ocean farming is trending, but can it be a successful business  model? - Responsible Seafood Advocate

  • नॉर्वे में खुले समुद्र में विशेष पिंजरों के माध्यम से सैल्मन मछली का पालन किया जाता है, जबकि फ्रांस और भारत के कुछ तटीय क्षेत्रों में सीप और मसल्स की खेती विकसित हो रही है। इन प्रणालियों की विशेषता यह है कि इनमें भूमि, मीठे जल और उर्वरकों की अपेक्षा बहुत कम होती है तथा कई मामलों में ये समुद्री जल को प्राकृतिक रूप से स्वच्छ भी बनाए रखते हैं। इस प्रकार समुद्री खेती न केवल खाद्य उत्पादन का वैकल्पिक माध्यम बन रही है, बल्कि सतत विकास और पोषण सुरक्षा की दिशा में एक संभावनाशील कदम भी सिद्ध हो रही है।

समुद्री शैवाल को इस क्षेत्र की आधारशिला माना जा रहा है। ये प्रकाश-संश्लेषी जीव अत्यंत तीव्र गति से बढ़ते हैं और इन्हें उपजाऊ भूमि, रासायनिक उर्वरक या मीठे जल की आवश्यकता नहीं होती। वे समुद्री जल में घुले कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर जैव पदार्थ में रूपांतरित करते हैं, जिससे कार्बन चक्र में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका बनती है।

समुद्री अम्लीकरण, जो जलवायु परिवर्तन का एक गंभीर परिणाम है, उसे कम करने की संभावना भी शैवालों के माध्यम से देखी जा रही है। पोषण की दृष्टि से समुद्री शैवाल प्रोटीन, खनिज लवण, आयोडीन तथा ओमेगा-3 फैटी अम्ल से भरपूर होते हैं। एशिया के कई देशों में इन्हें पारंपरिक आहार का हिस्सा माना जाता रहा है, किंतु अब विश्व के अन्य भागों में भी इनकी स्वीकृति बढ़ रही है।

Ocean Crops: Is This The Next Frontier For Agriculture?

  • द्विपटली जीव जैसे सीप और मसल्स समुद्री खेती का दूसरा प्रमुख स्तंभ हैं। ये प्राकृतिक रूप से समुद्री जल को छानकर उसमें उपस्थित सूक्ष्म कणों और प्लवकों का उपभोग करते हैं। इस प्रक्रिया से जल की गुणवत्ता में सुधार होता है। इन्हें अतिरिक्त चारे की आवश्यकता नहीं होती, जिससे संसाधन निवेश कम रहता है। भूमि आधारित पशुपालन की तुलना में इनका कार्बन उत्सर्जन अत्यंत सीमित है। इसीलिए इन्हें टिकाऊ प्रोटीन स्रोत के रूप में देखा जा रहा है।

खुले समुद्र में पिंजरों के माध्यम से मछली पालन समुद्री खेती का विकसित रूप है। प्राकृतिक मत्स्य संसाधनों पर बढ़ते दबाव के कारण नियंत्रित मत्स्य पालन की आवश्यकता अनुभव की गई। नॉर्वे, चिली और कनाडा जैसे देशों ने इस क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। इससे खाद्य उत्पादन और निर्यात दोनों में वृद्धि हुई है। किंतु इसके साथ पर्यावरणीय सावधानियाँ अनिवार्य हैं। यदि घनत्व नियंत्रण, अपशिष्ट प्रबंधन और रोगनिरोधक उपायों पर ध्यान न दिया जाए तो समुद्री पारिस्थितिकी प्रभावित हो सकती है। इसलिए आधुनिक समुद्री खेती का संचालन वैज्ञानिक निगरानी और कठोर मानकों के साथ किया जाता है।

  • समुद्री खेती में एक नवोन्मेषी अवधारणा समेकित बहु-पोषण प्रणाली की है। इसमें अलग-अलग गहराइयों पर भिन्न-भिन्न प्रजातियों को इस प्रकार विकसित किया जाता है कि एक की जैविक अवशिष्ट सामग्री दूसरी के लिए पोषण का स्रोत बन जाए। उदाहरणार्थ, मछलियों से उत्सर्जित पोषक तत्व शैवालों द्वारा अवशोषित किए जा सकते हैं। इससे पारिस्थितिक संतुलन बना रहता है और उत्पादन अधिक टिकाऊ होता है। यह दृष्टिकोण समुद्र को एक जटिल, परस्पर संबंधित तंत्र मानकर कार्य करता है।
  • Regenerative Ocean Farming Transforming Our Seas for a Sustainable Future

भारत की दृष्टि से समुद्री खेती की संभावनाएँ विशेष महत्व रखती हैं। लगभग साढ़े सात हजार किलोमीटर लंबी तटरेखा, विविध समुद्री जैव संपदा और तटीय समुदायों की परंपरागत समुद्र-आधारित जीविका इस क्षेत्र के विकास के लिए आधार प्रस्तुत करती हैं।

  • तमिलनाडु, गुजरात और केरल जैसे राज्यों में समुद्री शैवाल तथा मसल्स की खेती के प्रयोग प्रारंभ हो चुके हैं। यदि वैज्ञानिक प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता, बाजार संरचना और नीतिगत स्पष्टता सुनिश्चित की जाए तो यह क्षेत्र तटीय अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ कर सकता है और पोषण सुरक्षा में योगदान दे सकता है।
  • जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में समुद्री खेती का महत्व और बढ़ जाता है। भूमि आधारित मांस उत्पादन वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में महत्वपूर्ण योगदान देता है। यदि मानव आहार में समुद्री शैवाल और द्विपटली जीवों का अनुपात बढ़े तो उत्सर्जन में कमी लाई जा सकती है। साथ ही समुद्री शैवाल से जैव ईंधन, जैव उर्वरक तथा जैव प्लास्टिक जैसे उत्पाद विकसित करने की दिशा में अनुसंधान जारी है, जो हरित अर्थव्यवस्था के निर्माण में सहायक हो सकते हैं।
  • यद्यपि संभावनाएँ व्यापक हैं, परंतु समुद्र असीमित संसाधनों का भंडार नहीं है। यह एक संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र है, जिसकी वहन क्षमता सीमित है। अनियंत्रित विस्तार, प्रदूषण और जैव विविधता पर प्रतिकूल प्रभाव दीर्घकालिक हानि पहुँचा सकते हैं। अतः समुद्री खेती का विस्तार वैज्ञानिक अध्ययन, पर्यावरणीय प्रभाव आकलन और स्थानीय समुदायों की सहभागिता के साथ ही होना चाहिए।

उत्पादन के साथ संरक्षण का संतुलन अनिवार्य है। आधुनिक तकनीक इस दिशा में सहायक बन रही है। उपग्रह निगरानी, स्वचालित सेंसर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित विश्लेषण और जैव सुरक्षा प्रणालियाँ समुद्री पर्यावरण की सतत निगरानी में सक्षम हैं। इससे जल गुणवत्ता, तापमान, लवणता और रोग प्रसार पर नियंत्रण संभव होता है। वैज्ञानिक प्रबंधन के माध्यम से समुद्री खेती को अधिक सुरक्षित और टिकाऊ बनाया जा सकता है।

समुद्री खेती के विस्तार के साथ एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक आयाम भी जुड़ता है। तटीय समुदाय, जो परंपरागत रूप से मत्स्य पालन पर निर्भर रहे हैं, बदलती समुद्री परिस्थितियों और घटते प्राकृतिक संसाधनों के कारण आर्थिक असुरक्षा का सामना कर रहे हैं।

Almost as if they're wild' – Offshore aquaculture startup Forever Oceans is  gaining confidence farming in deep water - Responsible Seafood Advocate

  • यदि समुद्री खेती को स्थानीय सहकारी मॉडल, महिला स्वयं सहायता समूहों और कौशल विकास कार्यक्रमों से जोड़ा जाए, तो यह रोजगार सृजन का सशक्त माध्यम बन सकती है। इससे आजीविका का विविधीकरण होगा और तटीय युवाओं का पलायन कम हो सकता है। साथ ही विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में समुद्री विज्ञान तथा तटीय प्रबंधन से जुड़े पाठ्यक्रमों को प्रोत्साहन देकर एक नई वैज्ञानिक पीढ़ी तैयार की जा सकती है, जो समुद्र और समाज के बीच संतुलित संबंध स्थापित करने में सक्षम हो।

भविष्य की दिशा स्पष्ट रूप से संतुलित नवाचार की माँग करती है। समुद्री खेती को खाद्य सुरक्षा, पोषण, जलवायु संतुलन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के व्यापक परिप्रेक्ष्य में समाहित करना होगा। इसके लिए समग्र नीति, कठोर पर्यावरणीय मानक, पारदर्शी नियमन और निरंतर अनुसंधान आवश्यक हैं।

यदि हम विज्ञान के आलोक में विवेकपूर्ण कदम उठाएँ, तो महासागर मानवता के लिए नए अन्नक्षेत्र के रूप में स्थापना पा सकते हैं। किंतु यह तभी संभव है जब विकास और संरक्षण के बीच सामंजस्य बना रहे तथा समुद्र को संसाधन नहीं, बल्कि जीवनदायी सहचर के रूप में देखा जाए।

अंततः यह प्रश्न केवल खाद्य उत्पादन का नहीं, बल्कि विकास की हमारी समग्र दृष्टि का है। यदि मानव समुद्र को असीम शोषण का क्षेत्र मानेगा तो वही त्रुटियाँ दोहराई जाएँगी जो भूमि पर हुई हैं। किंतु यदि विज्ञान, नीति और समाज मिलकर समुद्र को साझा प्राकृतिक धरोहर के रूप में स्वीकार करें और सतत उपयोग की दिशा में अग्रसर हों, तो संभव है कि भविष्य की खाद्य सुरक्षा में महासागर महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँ।

समुद्री खेती आशा की वह नई किरण है, जो हमें यह संकेत देती है कि पृथ्वी का नीला विस्तार केवल रहस्य और रोमांच का क्षेत्र नहीं, बल्कि संतुलित बुद्धि और संवेदनशीलता के साथ अपनाया जाए तो मानवता के अन्न भंडार का सशक्त आधार भी बन सकता है।

– डॉ. दीपक कोहली

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Tags: #BlueEconomy #OceanFarming #SeaweedFarming #FutureFood #FoodSecurity #SustainableFood #MarineAgriculture #ClimateSolution

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