कुछ पाकिस्तानी मस्जिदों की अंधेरी गलियों में, ज़ैद हामिद जैसे उग्रवादियों के जोशीले भाषणों में, और जैश-ए-मोहम्मद (JeM) तथा लश्कर-ए-तैयबा (LeT) जैसे संगठनों के गुप्त मेनिफेस्टो में, ग़ज़वा-ए-हिंद का भविष्यवाणी वाला सपना लंबे समय से चलता रहा है। इस विजय में इस्लामी शासन सिंधु से गंगा तक और उससे आगे फैलने की बात कही जाती है।
मुख्यधारा के इस्लामी विद्वान इन हदीसों को कमजोर, गढ़ा हुआ या ऐतिहासिक संदर्भ (शायद पुरानी फारसी या अन्य लड़ाइयों) मानते हैं, लेकिन कट्टरपंथी इसे जिहादी भर्ती, कश्मीर में सीमा-पार हमलों और पाकिस्तान में एकजुट करने वाली मिथक के रूप में इस्तेमाल करते हैं।
उनके लिए ग़ज़वा-ए-हिंद सिर्फ कहानी नहीं, बल्कि नियति है। यह विभाजन के अधूरे काम, पूर्वी पाकिस्तान के नुकसान, कश्मीर की “कब्जे” की पीड़ा का बदला और पाकिस्तानी सेना तथा वैश्विक मुस्लिम स्वयंसेवकों द्वारा पूर्व की ओर पवित्र मार्च का वादा करता था।

लेकिन अयातुल्लाह अली खामेनेई की 28 फरवरी को अमेरिका-इज़राइल हमलों में हत्या के बाद शुरू हुए ईरान-अरब-इज़राइल-अमेरिका युद्ध के कुछ दिनों में, यह सपना तबाह हो चुका है। इस युद्ध– जिसमें सैकड़ों मौतें हुई हैं, क्षेत्रीय तेल प्रवाह ठप हो गया है और मध्य पूर्व का नक्शा बदलने का खतरा पैदा हो गया है— ने ग़ज़वा-ए-हिंद को सिर्फ टाला नहीं, बल्कि घातक और शायद स्थायी झटका दे दिया है।
कट्टरपंथियों की नजर में यह कोई अस्थायी रुकावट नहीं, बल्कि ईश्वरीय परीक्षा या भू-राजनीतिक जाल है। पर यह युद्ध पैन-इस्लामी एकता और पाकिस्तान की रणनीतिक भ्रम की कमजोरी उजागर कर रहा है। इस युद्ध ने ग़ज़वा-ए-हिंद के भौतिक, कूटनीतिक, वैचारिक और सैन्य आधारों को चूर-चूर कर दिया है, इसे दशकों, शायद हमेशा के लिए असंभव कल्पना बना दिया है।
इस झटके को समझने के लिए युद्ध की तेजी से फैलती तबाही को जानना जरूरी है। 28 फरवरी 2026 को अमेरिका-इज़राइल ने ऑपरेशन एपिक फ्यूरी (कुछ पश्चिमी मीडिया का नाम) में तेहरान में खामेनेई (86 वर्ष) को उनके परिसर में मार गिराया, साथ ही प्रमुख IRGC कमांडर, रक्षा मंत्री और परिवार के सदस्य भी मारे गए। ईरानी मीडिया ने “शहादत” की पुष्टि की, जिससे 40 दिनों का शोक शुरू हुआ।
- बदला तुरंत आया:
ईरानी मिसाइलें और ड्रोन इज़राइल, बहरीन, कतर, कुवैत, सऊदी अरब और UAE में अमेरिकी ठिकानों पर गिरे। हिजबुल्लाह ने लेबनान से हमला किया। 2-3 मार्च तक युद्ध फैल गया। इज़राइल-अमेरिका ने नतांज न्यूक्लियर साइट्स, एयर डिफेंस और तेल सुविधाओं पर बमबारी की। ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य बंद कर दिया, वैश्विक तेल कीमतें 150 डॉलर/बैरल से ऊपर पहुंच गईं।
ग़ज़वा-ए-हिंद के स्वप्नजीवियों के लिए ईरान “प्रतिरोध” का अग्रदूत था। पाकिस्तानी जिहादी सर्कल में पश्चिम और इज़राइल के खिलाफ रोमांटिक सहयोगी था– शिया-सुन्नी तनाव के बावजूद। पाकिस्तान की आधिकारिक निंदा, सड़क प्रदर्शन और PTI-धार्मिक दलों की एकजुटता मुस्लिम एकता का संकेत लगती थी। लेकिन अब यह उन्हें भी समझ आ रहा है कि यह कोई भारत-विरोधी जिहाद नहीं, बल्कि संप्रदायिक कसाईखाना और आर्थिक ब्लैक होल है, जो पाकिस्तान का अभियान से पहले ही खून बहा देगा।

सबसे बड़ा और सबसे घातक झटका आर्थिक है। पाकिस्तान की कमजोर अर्थव्यवस्था पहले से IMF बेलआउट पर टिकी थी। मुद्रास्फीति 25-30% थी। विदेशी मुद्रा भंडार 10 अरब डॉलर के आसपास था। यह अर्थव्यवस्था अब युद्ध के प्रभाव से नष्ट हो चुकी है। होर्मुज संकट से वैश्विक तेल व्यापार का 20% प्रभावित हुआ है पर पाकिस्तान 80-85% कच्चा तेल खाड़ी से आयात करता है। कीमतें 40-50% बढ़ गई हैं। ईंधन, परिवहन और भोजन में हाइपरइन्फ्लेशन हुआ है। सऊदी अरब, UAE, कतर, कुवैत में 3-4 मिलियन पाकिस्तानी प्रवासियों से आने वाली रेमिटेंस (30+ अरब डॉलर सालाना) अब ढह रही हैं। खाड़ी अर्थव्यवस्थाएं ईरानी ड्रोन हमलों और अमेरिकी प्रतिबंधों से हिली हैं।
- प्रवासी काम छोड़कर भाग रहे हैं; बैंक ट्रांसफर फ्रीज हो गए हैं।
ग़ज़वा-ए-हिंद के समर्थकों के लिए यह विनाशकारी है। भारत पर उन्हें बड़े पैमाने का अभियान चाहिए: आधुनिक टैंक, ड्रोन, साइबर क्षमता, महीनों की लॉजिस्टिक्स। रक्षा बजट (GDP का 2.5-3%) पहले से तंग था। अब दो मोर्चों का बोझ आ गया था। युद्ध से पहले पूर्वी फोकस (भारत के खिलाफ) पश्चिमी स्थिरता से संभव था। अब ईरान/अफगानिस्तान से शरणार्थी लहरें (कई मिलियन अफगान पहले से KPK में बोझ), सीमा झड़पें, कराची-लाहौर में हिंसक प्रदर्शन– संसाधन पश्चिम की ओर बह रहे हैं। स्टॉक मार्केट 15% गिरा, करेंसी रिकॉर्ड निचले स्तर पर है। IMF बातचीत रुकी हुई है। अस्पतालों में दवाइयां नहीं, बिजली ग्रिड फेल है। दिवालिया राज्य “ईश्वरीय मार्च” कैसे फंड करेगा?
भारत की अर्थव्यवस्था (रूस, अमेरिकी शेल से विविध ऊर्जा) 7% विकास पर, पाकिस्तान नेगेटिव में चल रहा है। हिंदू “दुश्मन” मजबूत हो रहा है, मुस्लिम अग्रदूत भूखा मर रहा है।
- सैन्य ओवरस्ट्रेच और दो-मोर्चे का दुःस्वप्न
बड़ी समस्या खड़ी कर गया है, जिससे ग़ज़वा-ए-हिंद आत्मघाती हो गया है। पाकिस्तान की परमाणु-सशस्त्र 6.5 लाख की सेना भारत की 14 लाख सेना और बेहतर वायुसेना से कमजोर थी और हमेशा पूर्वी फोकस पर निर्भर थी। अब पश्चिमी सीमा (ईरान अराजक, तालिबान अफगानिस्तान अनिश्चित) पर डिवीजन शिफ्ट हो रही हैं – बलूचिस्तान, सिंध में अतिरिक्त तैनाती। पहले से तंग पाकिस्तान वायुसेना (F-16/JF-17), अब पूर्व-पश्चिम विभाजन नहीं कर सकती।
जिहादी फोरम में यह सच्चाई फुसफुसाई जा रही है: पहले के वॉरगेम्स में तेज कश्मीर थ्रस्ट की कल्पना थी। अब अमेरिका-इज़राइल ने ईरान के ऊपर आकाश पर नियंत्रण हासिल कर लिया है। पाकिस्तानी एडवेंचरिज्म अमेरिकी गुस्से को न्योता देगा। ट्रंप ने “अराजकता का फायदा उठाने” वाले सहयोगियों को चेतावनी दी। पाकिस्तान का परमाणु सिद्धांत (पूर्ण-स्पेक्ट्रम डिटरेंस) अब खतरा बन गया – जब अमेरिका “फॉरएवर वॉर” में है, तो एस्केलेशन लैडर छोटी हो जाती है।

उधर भारत LoC और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर चुपके से मोबिलाइजेशन कर रहा है। दिल्ली की तटस्थता (QUAD, इज़राइल से गहराते संबंध – ड्रोन, मिसाइल को-प्रोडक्शन) पाकिस्तान की थकान का इंतजार कर रही है।
गज़वे की भविष्यवाणी वाली सेनाएं इकट्ठी भी नहीं हो सकतीं। ग़ज़वा की बजाय पाकिस्तान घिस रहा है – होर्मुज पर ड्रोन गिराए जा रहे हैं। चीनी उपकरणों के स्पेयर पार्ट्स पर प्रतिबंध लग गये हैं। 1 लाख मुजाहिदीन का सपना शुरू होने से पहले ही टूट गया।
कूटनीतिक रूप से युद्ध ने उस पैन-इस्लामवाद का खोखलापन उजागर कर दिया है जो ग़ज़वा-ए-हिंद के लिए जरूरी माना गया है। सऊदी अरब और UAE (पाकिस्तान के प्रमुख ऋणदाता/निवेशक) तटस्थ या चुपके से अमेरिका-इज़राइल के साथ रहे हैं। अब्राहम एकॉर्ड्स के फायदे और तेल स्थिरता को प्राथमिकता देते रहे हैं।
रिपोर्ट्स के अनुसार रियाद-अबू धाबी ने अमेरिकी लॉजिस्टिक्स की मदद की। खामेनेई की मौत और संभावित शासन बदलाव (अंतरिम परिषदें बन रही हैं) से “प्रतिरोध अक्ष” ढह रहा है। हिजबुल्लाह लेबनान में खून बहा रहा, हूती यमन में साइडलाइन में वही कर रहा है। सुन्नी अरब राज्य पाकिस्तान की “जिहाद” भाषा से सतर्क (ब्लोबैक का डर) हो गया है। चीन ऑल-वेदर फ्रेंड था पर अब हेज कर रहा है। उसे CPEC बाधित होने का खतरा बढ़ गया है। वह डी-एस्केलेशन की अपील कर रहा है। अमेरिका गाजर (ऋण राहत?) और डंडा (FATF ग्रे-लिस्ट) दोनों दिखा रहा है।
ग़ज़वा-ए-हिंद के विचारकों के लिए यह स्थिति जहर है। भविष्यवाणी एकजुट उम्माह की कल्पना करती है। लेकिन युद्ध ने मुस्लिम बनाम मुस्लिम कर दिया। ईरानी मिसाइलें अरब भूमि पर गिर रहीं। पाकिस्तानी प्रदर्शन खाड़ी मेजबानों को अलग कर रहे हैं क्यों कि अरब देशों को ही अब काफिर कहा जा रहा है। भारत की चुप्पी, I2U2 और मजबूत रक्षा समझौते पाकिस्तान को और अलग कर रहे हैं।

ग़जवा के भारत के गुप्त समर्थक भारत के स्टैंड को ईरान के साथ विश्वासघात कह रहे हैं, लेकिन भारत फायदा उठा रहा है। युद्ध-थके पश्चिम के लिए स्थिर साथी भारत ही नजर आ रहा है। ऐसा देश जो अपने इंपल्स पर संयम रखता है। अब वह वैश्विक खलीफा कॉल कहां है ? तुर्की या इंडोनेशिया के स्वयंसेवक कहां हैं? उम्माह हिंद के लिए एकजुट नहीं हो रही, तेहरान पर बंट रही है।
आंतरिक रूप से युद्ध ने उन दरारों को भड़काया है जो ग़ज़वा-ए-हिंद की वैचारिक जमीन को खोखला कर रही हैं। खामेनेई के शोक में पाकिस्तान के 2 करोड़ शिया उग्र हो चुके हैं और सुन्नी कट्टरपंथियों से टकराव बढ़ गया है। कराची, क्वेटा में हिंसा बढ़ी है। सेना मनोबल के संकट का सामना कर रही है। जूनियर अधिकारी ईरान-समर्थक हैं और पश्चिमी सीमाओं पर गश्त के आदेश पर सवाल उठा रहे हैं। सोशल मीडिया सवाल खड़ा कर रहा है कि दिल्ली कैसे जीतें जब लाहौर को खाना नहीं मिल रहा?
गजवा के स्वप्नजीवी आगे देखें तो उनकी निराशा गहरी होती है। युद्ध कुछ हफ्तों (ट्रंप की उम्मीद) या महीनों (इज़राइली अनुमान) में खत्म भी हो, निशान रहेंगे: ईरान में शासन बदलाव या कमजोर थियॉक्रेसी, खाड़ी पुनर्संरेखण, अमेरिका-समर्थक ब्लॉक, “अस्थिरता प्रायोजक” पर वैश्विक प्रतिबंध, कर्ज में डूबा पाकिस्तान, शरणार्थी बोझ, किसी आक्रामक से बड़ी। पुनर्निर्माण प्राथमिकताएं जलवायु परिवर्तन, भारत से पानी युद्ध, आंतरिक आतंकवाद – दुख बढ़ाएंगे।
युवा – पहले जिहाद का ईंधन था। अब वह पलायन या निराशा की ओर जा रहा है, शहादत की ओर नहीं। उसे इस स्वप्न की बेवक़ूफ़ियाँ पता चल रही हैं। कट्टरों के लिए प्रामाणिक हदीसें उन युगों की बात करती हैं जब साम्राज्य विश्वास से उभरते थे; आज अर्थशास्त्र, गठबंधन और सटीक युद्ध हावी हैं। भारत के ड्रोन, सैटेलाइट, AI, साइबर पाकिस्तान की कल्पनाओं से बहुत आगे हैं।
दिल्ली का रास्ता तेहरान के मलबे तले दब गया है। गजवे का सपना तक़रीर में बचा है, लेकिन तक़दीर में नहीं। वास्तविकता ने थकान, विभाजन और हार का कड़वा सच बोल दिया है।
लोग UN के दंतहीन विषहीन होने की बात करते हैं पर ध्यान से देखें तो OIC- आर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोआपरेशन – की हालत उससे भी बदतर हो चुकी है।
इसलिए भारत के कुछ हल्कों में बेचैनी है तो समझ आता है।
पर अपनी असभ्यताओं से बाहर निकलकर आधुनिक युग की रचना में अपनी भूमिका निभाने की चुनौती स्वीकार करने का समय आ गया है।
-मनोज श्रीवास्तव

