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क्या भारत का स्टैंड राष्ट्रीय हित में है?

क्या भारत का स्टैंड राष्ट्रीय हित में है?

by हिंदी विवेक
in ट्रेंडींग, देश-विदेश
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अमेरिकी-इजरायली संयुक्त हमले और उसके विरुद्ध ईरान की सैन्य प्रतिक्रियाओं पर देश के अंदर विरोध के परिदृश्य चिंताजनक आवश्यक हैं, परआश्चर्य का विषय नहीं। भारत में अब ऐसी स्थिति नहीं जहां किसी मुद्दे पर देश की एकता दिखाई दे सके। संसद सत्र आरंभ होने के साथ सदन के अंदर और बाहर विरोध, नारेबाजी, बहिर्गमन, आरोप-प्रत्यारोप आदि की पृष्ठभूमि पहले से बनी हुई है। सड़कों पर विरोध प्रदर्शनो से लेकर संसद सत्र आरंभ होने के बाद के विरोध में सुसंगति है।

कांग्रेस के साथ अधिकतर विपक्षी पार्टियों और नेताओं ने सरकार पर अमेरिकी दबाव के समक्ष घुटने टेकने और भारत की परंपरागत विदेश नीति को बदलने का आरोप लगाया है। बड़े-बड़े नेता बोल रहे हैं कि मोदी सरकार ने विदेश नीति को डोनाल्ड ट्रंप के हाथों गिरवी रख दिया है। मूल स्वर यह है कि भारत को ईरान के समर्थन में खड़ा होना चाहिए था, जबकि वह तटस्थता प्रदर्शित करते हुए भी अमेरिका और इजरायल के साथ खड़ा दिख रहा है।

सोनिया गांधी ने लेख लिखा जिसमें कहा गया कि ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की हत्या पर केंद्र सरकार का यह मौन तटस्थता नहीं बल्कि जिम्मेदारी से पीछे हटना है। इससे भारत की विदेश नीति की दिशा और विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। इस तरह के वक्तव्यों की सूची बड़ी होती जा रही है तो क्या युद्ध में भारत की भूमिका वाकई गलत है?

पहले कुछ तथ्य देखें। ऑर्गेनाइजेशन औफ इस्लामी कॉन्फ्रेंस ओआईसी में 56 देश है। कोई भी देश ईरान के पक्ष में खड़ा नहीं हुआ है। छोटी-छोटी बातों पर बैठक बुलाने वाला ओआईसी चुप है। खाड़ी सहयोग परिषद की कोई टिप्पणी नहीं है। ईरान के 13 पड़ोसी मुस्लिम देश भी उसके साथ नहीं है। इसके कुछ तो कारण हैं। थोड़ी गहराई से देखें तो ईरान पर हमले के संदर्भ में इस तरह का आंतरिक विरोध दो ही देश में दिख रहा है, पाकिस्तान और भारत। पाकिस्तान में हिंसा करते लोग लगातार मारे जा रहे हैं। अनेक शहरों में इंटरनेट और सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाना पड़ा है। भारत में ऐसी स्थिति पैदा नहीं हुई तो इसका कारण दोनों देशों के संस्कार और चरित्र के बीच का मौलिक अंतर ही है। इसका उल्लेख इसलिए जरूरी है ताकि समझें कि हम कर क्या रहे हैं।

क्या हम विदेश नीति पर आंतरिक व्यवहार के मामले में पाकिस्तान के समक्ष स्वयं को देखना और दिखाना चाहते है? किसी को अतिशयोक्ति लगे लेकिन सच्चाई यही है। हमले के जवाब में इजराल को निशाना बनाने के साथ ईरान ने सउदी अरब, क़तर, अमीरात, ओमान, कुवैत, बहरीन, जॉर्डन, साइप्रस पर मिसाइलों से चुन-चुन कर हमले किये हैं।

After US-Israel strike on it, Iran has launched airstrikes on ten countries  in the region: Israel, Jordan, Iraq, Kuwait, Saudi Arabia, UAE, Qatar,  Bahrain, Cyprus, and Oman.

दुनिया की सबसे बड़ी सउदी अरामको तेल रिफाइनरी ईरान हमले के बाद बंद हो गई थी।
रूस की सलाह पर ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने कुछ पड़ोसी देशों से क्षमा मांगी और घोषणा किया कि हमले नहीं करेंगे, पर ऐसा हुआ नहीं। ईरान के मिसाइल लगातार अमेरिकी अड्डों को निशाना बनाने के नाम पर इन देशों पर बरस रहे। कोई दिन नहीं जब इन देशों से बयां नहीं आते कि हमने ईरान के इतने ड्रोन नष्ट किया या मिसाइल इंटरसेप्ट किया।

Iran war updates: Tehran chides ‘Operation Epic Mistake’ devised by Israel

ईरान के लिए आसमान सिर पर उठाने लेने वाले क्या चाहते हैं कि भारत अमेरिका और इजरायल के विरुद्ध मोर्चा ले? चीन और रूस ने इस हमले का विरोध अवश्य किया। क्या इससे आगे वे कुछ करने को तैयार हैं? अमेरिका द्वारा हिन्द महासागर में ईरान के युद्धपोत को नष्ट करने को भारत के लिए शर्मशार करने वाली घटना बताने वाले जानते हैं कि वे सच नहीं बोल रहे।

पोत भारत के आगे श्रीलंका की समुद्री सीमाओं से भी बाहर चला गया था। युद्ध की स्थिति में ईरान का युद्धपोत-विमान कहीं भी होगा निशान बनेगा। ईरान भी अपनी शक्ति भर यही कर रहा है। हम न भूले कि ईरान का एक पोत अभी कोच्चि बंदरगाह पर सुरक्षित है और उसके सारे क्रू भी।

क्या अमेरिका ने भारत से पूछा कि युद्ध के बीच आपने ईरान के युद्धपोत और उसके क्रू को क्यों सुरक्षित रखा हुआ है? इसका सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यही है। ध्यान रखिए आज ईरान के लिए आवाज उठाने वालों ने 7 अक्टूबर, 2023 को उत्सव मनाते इजरायलियों पर हमास द्वारा बर्बरतापूर्ण हमले, कत्लेआम और बंधक बनाए जाने पर निंदा का एक शब्द न बोला और केवल हमास के लिए खड़े दिखे। यह कैसी सिद्धांतवादिता है? ऐसा करते समय नहीं सोचा कि इसराइल पर क्या गुजरेगी? या स्टैंड भारत के राष्ट्रीय हित के विरुद्ध था।

ईरान के साथ भारत के संबंधों को न मित्रतापूर्ण कह सकते हैं न शत्रुतापूर्ण। मान लीजिए कि ईरान के साथ हमारे संबंध बहुत ही अच्छे थे। विदेश नीति और रक्षा नीति वर्तमान और भविष्य की परिस्थितियों के अनुसार निर्धारित होती हैं।

क्या इजराइल से हमारे संबंध बुरे रहे हैं? ऐसा कौन कठिन अवसर है जिसमें आवश्यकता पड़ने पर इजरायल ने साथ नहीं दिया है? 1962 से लेकर हर युद्ध में इजराइल भारत के साथ रहा है। 1962 में तो पंडित जवाहरलाल नेहरू के आग्रह पर उसने बिना चिन्ह लगाए हथियारों का खेप भेजा।
अमेरिका से व्यापार को लेकर ट्रंप की नीतियों में अवश्य दुराव पैदा हुआ किंतु आज भी वह हमारा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार, सबसे अधिक लाभ देने वाला देश है तथा सामरिक सहयोग उस सीमा तक पहुंच गए हैं जहां हम एक दूसरे के रक्षा लॉजिस्टिक तक का उपयोग कर सकते हैं।

ईरान ने जितनी भारी मात्रा में मिसाइल इकट्ठे किए उसका कोई वाजिब कारण है? ईरान पहले से पूरे क्षेत्र में आक्रमण करता रहा है। 2019 में भी उसने सऊदी अरब पर ड्रोन और मिसाइलों से हमला किया था। ओमान की खाड़ी में जहाजों को निशान बनाया। इराक में कुर्दों पर बैलिस्टिक मिसाइल दागे। सीरिया और पाकिस्तान में उसकी मिसाइलें गिरीं। कहा गया कि वहां से हथियारबंद समूह ईरान विरोधी गतिविधियां चला रहे हैं। हिज्बुल्लाह, हुती, हमास जैसे आतंकवादी समूहों को पालने वाला देश शांतिवादी नहीं हो सकता। बलूचिस्तान के एक भाग पर उसका कब्जा है तथा वहां के मुक्ति आंदोलन का वह भी पाकिस्तान की तरह क्रूरता से दमन कर रहा है।

ईरान की इस्लामी क्रांति - विकिपीडिया

1979 की इस्लामी क्रांति के बाद उसका सबसे पहला युद्ध इराक से हुआ जो एक दशक चला। इजरायल को धरती पर नहीं रहने के अधिकार की घोषणा करने वाले तथा पड़ोसी देशों को हमेशा अपनी सैन्य ताकत से भयभीत रखने की नीति वाले ईरानी शासन का कौन साथ देगा? इजरायल ईरान का पड़ोसी भी नहीं है। इजरायल का अब पड़ोसी जॉर्डन और मिस्र जैसे देशों के साथ कोई तनाव नहीं। हिज्बुल्लाह को छोड़ दें तो उसका लेबनान से तनाव खत्म हो सकता है।

भारत के संबंध अरब के सभी देशों से हैं और लगभग एक करोड़ भारतीय में सबसे कम ईरान में ही केवल दस हजार हैं। जरा सोचिए, ईरान के साथ खुलकर खड़ा होने का संदेश सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, ओमान, कुवैत आदि देशों में कैसा जाएगा? ओमान के साथ कुछ ही महीने पहले हमारा सामरिक साझेदारी समझौता हुआ है।

न्यायपूर्ण व्यवहार तो यही है कि ईरान इजरायल का अस्तित्व स्वीकारे, पड़ोसी देश को अपने सैन्य ताकत का भय दिखाना बंद करे, आतंकवादी समूहों को समर्थन न दे तथा नाभिकीय हथियार बनाने की सोच का मान्य परित्याग करे। क्षेत्र के साथ-साथ यही भारत के भी हित में है।
कांग्रेस भूल रही है कि 2006 में अमेरिका द्वारा ईरान के परमाणु कार्यक्रम के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय आणविक एजेंसी में लाए गए प्रस्ताव का तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार ने समर्थन किया था। भारत का इसी में राष्ट्रीय हित था।

निश्चित रूप से इस युद्ध से हमारी समस्याएं बढ़ीं है खासकर पेट्रोलियम आपूर्ति के संदर्भ में और उसका असर दिख रहा है। किंतु इसका सामना संपूर्ण देश को मिलकर ही करना होगा। यह संकट अकेले भारत का नहीं संपूर्ण विश्व के लिए है।‌ ईरान के साथ खुलकर खड़ा होना तो मामले को और जटिल बनाएगा।

PM Modi Set For Trichy Rally As BJP-Led Bloc Faces Setbacks In Tamil Nadu

भारत कभी युद्ध के साथ नहीं हो सकता किंतु जिन घटनाओं पर हमारा नियंत्रण नहीं उसमें हम कुछ कर नहीं सकते। ईरान 1979 के इस्लामी क्रांति के बाद छद्म युद्ध लगातार लड़ रहा है। विदेश नीति हमेशा राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर निर्धारित होती है और भारत इस मामले पर सही दिशा में है।
भारत के विदेश सचिव विक्रम मिश्री ने ईरान दूतावास जाकर आयतुल्लाह अलखामेनेई की मृत्यु पर शोक संदेश लिखा।

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने 9 मार्च को संसद में भारत का पक्ष रखते हुए कहा कि सरकार ने 20 फरवरी को बातचीत और कूटनीति के जरिए समाधान का बयान दिया था। उनके वक्तव्य का मुख्य सार यही था कि हमारी चिंता खाड़ी में रह रहे एक करोड़ भारतीयों की सुरक्षा है और फंसे लोगों को निकालने के इंतजाम किए जा चुके हैं। उन्होंने अरब देशों के विदेश मंत्रियों के साथ ईरान के विदेश मंत्री से भी बातचीत की।

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी अधिकतर अरब देशों के नेताओं से लगातार बातचीत कर रहे हैं। वस्तुत भारत का रुख शत प्रतिशत राष्ट्रीय हित के अनुकूल है और युद्ध का अंत जैसे भी हो हमारे संबंध पूरे क्षेत्र में सामान्य रहेंगे।

– अवधेश कुमार

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Tags: #IndiaForeignPolicy #IranIsraelWar #MiddleEastConflict #Geopolitics #IndiaStand #ModiGovernment #WorldPolitics #GlobalConflict #NationalInterest #IndiaMiddleEast

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