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दासत्व से मुक्ति और प्रगति के आयाम का सूत्र

दासत्व से मुक्ति और प्रगति के आयाम का सूत्र

by रमेश शर्मा
in देश-विदेश, मार्च 2026
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गुलामी की मानसिकता से मुक्त होने का सशक्त मार्ग स्वदेशी विचारधारा में निहित है। जब हम अपने उत्पाद, अपनी भाषा और अपनी परम्पराओं को सम्मान देते हैं, तभी आत्मगौरव जागृत होता है। स्वदेशी केवल आर्थिक नीति नहीं बल्कि मानसिक स्वतंत्रता का आधार है।

भारत में स्वदेशी जागरण की एक लम्बी परम्परा है। इसी मार्ग पर चलकर भारत कभी विश्व गुरु के रूप में प्रतिष्ठित हुआ और स्वदेशी के संकल्प से ही भारत विदेशी आक्रांताओं के दमन से मुक्त हुआ। भारत के स्वदेशी तत्व को मिटाने के लिए विदेशी सत्ताओं ने कई कुटिल नीतियां बनाईं, कुचक्र भी किए। असंख्य प्राणों के बलिदान हुए और यह चेतना अनवरत रही। स्वदेशी संकल्प से आज भारत पुनः वैश्विक प्रतिष्ठा की नई अंगड़ाई ले रहा है और इसे पूरी दुनिया स्वीकार कर रही है।

स्वदेशी शब्द में केवल स्थानीय स्तर पर निर्मित वस्तुओं अथवा उनके उपयोग के संकल्प तक सीमित नहीं है। इसका संदेश बहुत व्यापक है। यह स्वत्व से प्रेरित भाव का सम्प्रेषण है। जिसमें स्वाभिमान, स्वराज्य, स्वराष्ट्र, स्वदर्शन, स्वसंस्कृति और स्वसम्मान के गौरव की झलक होती है। मानवीय समझ के विकास के साथ स्वदेशी की यात्रा आरम्भ होती है। मानवीय आदर्श स्वरूप का मूल है स्वदेशी। स्वदेशी का आह्वान कभी आत्म प्रेरणा के लिए हुआ तो कभी सामाजिक जागरण के लिए, कभी आत्मबलिदान और कभी आंदोलन के केंद्र में भी स्वदेशी का भाव रहा है।

शब्द स्वदेशी में स्व उपसर्ग के रूप में है और देशी प्रत्यय के रूप में। इन दोनों की संधि से स्वदेशी शब्द बनता है। उपसर्ग के रूप में स्व का उपयोग जिस किसी शब्द के साथ हुआ तो वह नया शब्द संज्ञा अथवा क्रिया शब्दबोध के रूप में प्रकट हुआ है। उस शब्द में संचारित भाव की केंद्रीभूत चेतना को प्रेरित करने वाला उद्घोष है स्वदेशी। इसे स्वराज, स्वभाव, स्वाभिमान स्वामित्व आदि शब्दों के भाव एवं आशय से समझा जा सकता हैं। स्वत्व चेतना के इन सभी भावों का केंद्र स्वदेशी है जो राष्ट्रभाव के प्रत्येक आयाम में प्रस्फुटित होता है। इसकी झलक वैदिक वाड्मय में भी है। वैदिक ऋचाओं में स्व आधारित जीवन की महत्ता पर बहुत जोर दिया गया है। स्वराज्य और राष्ट्र शब्द वेदों में अनेक स्थानों पर आए। स्व आधारित आदर्श जीवन के आह्वान में स्वदेशी भाव का ही बोध कराया गया है। पुराणों में कथाओं के माध्यम से जिस आदर्श की स्थापना का संदेश दिया गया है, उसमें भी स्वदेशी भाव के सशक्तिकरण की झलक होती है। स्वदेश और स्वदेशी की रक्षा के लिए मध्यकाल में जितना संघर्ष, बलिदान भारत में हुए, उतने संसार में कहीं नहीं। मध्यकाल में युद्ध की साका शैली में स्वदेशी भाव के प्रति समर्पण की पराकाष्ठा थी। जिसमें एक सैनिक यह संकल्प लेकर केशरिया पगड़ी बांधता था कि अब या तो युद्ध जीतना है अथवा स्वराष्ट्र के लिए प्राणों का बलिदान देना है। मध्यकाल में स्वदेशी का यह संघर्ष दोनों प्रकार से हुआ। वैचारिक अभियान द्वारा समाज जागरण भी और स्वदेशी राज्य की स्थापना के लिए संघर्ष भी। मध्यकाल के सम्पूर्ण भक्ति आंदोलन के केंद्र में स्वदेशी जागरण का वैचारिक अभियान ही है। इसे तुलसीदास, संत ज्ञानेश्वर, कबीरदास, रविदास, गुरु नानकदेव, समर्थ स्वामी रामदास आदि की साहित्य रचना से समझा सकता है। साहित्य की इन रचनाओं का बाह्य स्वरूप तो भक्तिमार्ग है, परंतु उनके शब्दों, स्वर और कथानक के मूल में स्वदेशी भाव जागरण का संदेश स्पष्ट है। यदि ये रचनाकार सीधे स्वत्व अथवा स्वदेशी का स्पष्ट आह्वान करते तो समस्त साहित्य जला दिया जाता और ये सभी मार डाले जाते। इसीलिए भक्ति के माध्यम से स्वदेशी भाव का जागरण किया गया, जो स्वदेश और स्वदेशी संघर्ष का आधार बनी। इसी से सिख गुरुओं का बलिदान, छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा हिंदवी स्वराज्य की स्थापना सम्भव हो सकी। छत्रपति शिवाजी महाराज के हिंदवी स्वराज्य का आशय स्वदेशी राज्य शैली ही है। उनके निर्णय और अष्ट प्रधान की नियुक्ति में स्वदेशी भाव की संकल्पना ही साकार हो रही है। ये दो बड़े उदाहरणों के अतिरिक्त स्थानीय स्तर पर हर क्षेत्र में स्वदेशी संघर्ष निरंतर रहे। जिससे उस घोर दमन काल में भी भारत का स्वदेशी सांस्कृतिक स्वरूप सुरक्षित रहा।

अंग्रेजीकाल में स्वदेशी जागरण और स्वदेशी आंदोलन

सल्तनत और अंग्रेजीकाल के स्वदेशी संघर्ष में एक अंतर है। सल्तनतकाल में जहां स्वदेशी की स्थापना के लिए सशस्त्र संघर्ष और असंख्य प्राणों के बलिदान हुए, वहीं अंग्रेजीकाल में सशस्त्र संघर्ष और साहित्य रचना के साथ अहिंसक आंदोलन की परम्परा भी आरम्भ हुई। इस कालखंड में कुछ आह्वानकर्ताओं के शब्द अलग हैं, परंतु उनके प्रत्येक संदेश में स्वदेशी के लिए जागरुकता और संघर्ष का आह्वान है। स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा वेदों की ओर लौटने का और स्वामी विवेकानंद द्वारा ‘उठो जागो, तुम अमृत पुत्र हो, संघर्ष करो’ के उद्घोष में स्वदेशी संघर्ष का आह्वान ही तो है। वेदों की ओर लौटना अर्थात स्वदेशी विचार, स्वदेशी आचरण, स्वदेशी जीवन शैली की ओर लौटना, वहीं स्वामी विवेकानंद ने तुम अमृत पुत्र हो कहकर मृत्यु के भय से मुक्त होकर खुलकर संघर्ष करने का आह्वान है। रानी लक्ष्मीबाई का यह उद्घोष ‘मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी’ स्वदेशी भाव चेतना से ही अनुप्रेरित है। बंकिम बाबू का गीत ‘वंदेमातरम’ भी स्वदेशी अभियान का अंग है। वनवासी क्षेत्र में भगवान बिरसा मुंडा की शैली और शब्द भले अलग हैं, पर उनका ‘अबुआ दिशूम अबुआ राज’ उद्घोष भी स्वदेशी का आह्वान है। 1857 की सम्पूर्ण क्रांति, पाइक विद्रोह, कोल विद्रोह, संन्यासी विद्रोह, संथाल विद्रोह, नील विद्रोह, मुंडा विद्रोह, अहोम विद्रोह और खासी विद्रोह आदि सभी संघर्ष स्वदेशी की रक्षा के लिए ही थे।

अंग्रेजीकाल में स्वदेशी के लिए सशस्त्र संघर्ष के साथ अहिसंक आंदोलन की शैली भी विकसित हुई। इतिहास में इसकी झलक 1850 के आसपास से देखने को मिलती है। जो 1875 में वंदेमातरम गीत के साथ पूरे भारत में विस्तारित हुआ। 1905 में अंग्रेजों द्वारा बंगाल विभाजन के निर्णय ने तो मानों स्वदेशी आंदोलन को एक बड़ी ज्वाला में बदल दिया। दादाभाई नौरोजी, गोपाल कृष्ण गोखले, महादेव गोविंद रानडे, बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, गणेश व्यंकटेश जोशी, भास्वत के. निगोनी, वीओ चिदम्बरम पिल्लई, सुब्रमण्यम भारती, सुब्रमण्यम शिवा, रामसिंह कूका, पंडित मदनमोहन मालवीय, महर्षि अरविंद, म. गांधी, सुंदरराव ठाकरे आदि विचारकों ने स्वदेशी आंदोलन को नई ऊंचाइयां दीं। तिलक ने 1893 में स्वदेशी अभियान के लिए गणेशोत्सव आरम्भ किए। स्वदेशी संकल्प को पूरा करने के लिए ही तिलक ने ‘स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है’ नारा दिया था। नामधारी सिखों द्वारा अंग्रेजी कपड़े, अंग्रेजी शिक्षा का बहिष्कार करने का आह्वान भी स्वदेशी स्थापना के लिए था। उन्होंने हाथ से काते गए सूत के कपड़े और खाप पंचायतों को बढ़ावा दिया। वी. ओ. चिदम्बरम पिल्लई ने तूतीकोरिन में ब्रिटिश इंडिया स्टीम नेविगेशन कम्पनी को अपने अधिकार में लेकर इसको भारतीय स्वामित्व वाली शिपिंग कम्पनी में परिवर्तित कर दिया और अक्टूबर 1906 में इसका नाम स्वदेशी शिपिंग कम्पनी रखा। पंडित मदनमोहन मालवीय ने स्वदेशी आधारित शिक्षा पर जोर दिया और काशी विश्वविद्यालय की नींव रखी। क्रांतिकारी भगतसिंह ने असेम्बली में बम किसी को क्षति पहुंचाने के लिए नहीं फोड़ा था, उनका उद्देश्य सम्पूर्ण भारत के नौजवानों का स्वदेशी भाव जागरण करना ही था। नेताजी सुभाषचंद्र बोस का नारा- ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ स्वदेशी राज की स्थापना के लिए संघर्ष का आह्वान ही तो है। इन्हीं दिनों कवि प्रदीप का वह गीत हर जिव्हा पर आया- ‘दूर हटो अए दुनियां वालो, हिन्दुस्थान हमारा है’ वंदेमातरम मातरम… के साथ यह गीत 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का उद्घोष बना।

अंग्रेजीकाल में स्वदेशी का यह आंदोलन केवल स्वराज्य की स्थापना तक सीमित नहीं था। इसमें स्वभाषा, स्वभूषा, स्वाधारित शिक्षा, स्वभोजन और भवनों के स्व स्वरूप तक व्यापक था। विदेशी वस्त्रों की होली जलाना, भगवान बिरसा मुंडा द्वारा नशा मुक्ति एवं शाकाहार भोजन का आह्वान, म. गांधी द्वारा रामराज्य और ग्राम स्वराज्य की कल्पना एवं धोती पहनना आदि स्वदेशी स्थापना के अभियान रहे। यह स्वदेशी की संकल्प यात्रा ही थी जिससे अंग्रेज भारत से विदा हुए और भारत में स्वाधीनता का सूर्योदय हुआ।

स्वदेशी की नई अंगड़ाई ; भारत पुनः विश्व शक्ति की ओर

स्वदेशी सिद्धांत पर चलकर ही भारत ज्ञान और समृद्धि में सर्वश्रेष्ठ रहा है, विश्वगुरु और सोने की चिड़िया माना गया। यही विशेषता भारत पर लुटेरों के हमले का कारण बनी। दासत्व के घोर अंधकार में भी स्वदेशी का मंत्र गुंजायमान रहा, किंतु स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद प्रशासनिक नीति निर्णयों में स्वदेशी संकल्प को वह गति न मिल सकी जो अपेक्षित थी, परंतु सामाजिक स्तर पर स्वदेशी चेतना यथावत रही। स्वदेशी जागरण मंच जैसे सामाजिक संगठनों ने जन सामान्य के बीच स्वदेशी का वातावरण बनाए रखा। नए शोध और अनुसंधान भी हुए। पंडित दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानव दर्शन और अंत्योदय सिद्धांत, नानाजी देशमुख का ग्रामोदय प्रकल्प स्वदेशी संकल्पना का ही अंग है। भारत में स्वत्व और स्वदेशी को गति प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के प्रधान मंत्री बनने के साथ मिली। अब स्वदेशी संकल्पना ने पुनः अंगड़ाई ली है। नरेंद्र मोदी द्वारा अपना कार्यभार सम्भालने से पहले संसद की सीढ़ियों को प्रणाम करना स्वदेशी जीवनशैली की ही झलक है। मोदी सरकार ने स्वदेशी के लिए सभी दिशाओं में एक साथ कार्य आरम्भ किया। एक ओर ‘वोकल फॉर लोकल’ नारा देकर जनसामान्य से स्वदेशी अपनाने का आह्वान किया तो मेक इन इंडिया का आह्वान करके भारतीय उद्योग प्रतिष्ठानों को प्रोत्साहित किया और वहीं आधुनिक तकनीक के अनुसंधान में स्वदेशी शैली के विकास को प्राथमिकता दी। नरेंद्र मोदी के ‘आत्मनिर्भर भारत’ के नारे में भी विदेशी निर्भरता को कम करने का संदेश है। मोदी सरकार ने स्वदेशी स्टार्टअप और एमएसएमई को बढ़ावा दिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म और नीति सुधार लागू किए, इससे पूरे देश में स्वदेशी का वातावरण बना। इसके साथ उन्होंने 7 अगस्त 2015 को स्वदेशी हथकरघा और खादी उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए भारत में पहला वार्षिक राष्ट्रीय हथकरघा दिवस मनाया। 7 अगस्त की तिथि का चयन भी बहुत विचार के साथ किया। वर्ष 1905 में इसी तिथि को राष्ट्रव्यापी स्वदेशी आंदोलन की घोषणा हुई थी। पूरे देश में प्रभात फेरियां निकलीं। उस स्मृति को जाग्रत करने के लिए ही मोदी जी ने 7 अगस्त को राष्ट्रीय हाथकरघा दिवस मनाने की घोषणा की ताकि स्वदेशी का भाव जाग्रत हो सके।

यह मोदी सरकार का स्वदेशी संकल्प ही है कि भारत आज पुनः सम्पूर्ण विश्व में अपना अग्रणी स्थान बनाने की ओर अग्रसर है। यह स्वदेशी भाव की शक्ति ही है कि भारत ने अब विश्व की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था का स्थान अर्जित कर लिया है और अब वह तीसरे स्थान पर आने की ओर बढ़ रहा है। प्रधान मंत्री मोदी जी ने भारत को विश्व का सर्वश्रेष्ठ विकसित राष्ट्र बनाने के लिए वर्ष 2047 का लक्ष्य निर्धारित किया है। यह तभी सम्भव होगा जब सरकार की नीति और निर्णयों के साथ भारत के प्रत्येक नागरिक भी स्वदेशी भाव अपनाने का संकल्प ले। तभी भारत पुनः उस स्थान पर प्रतिष्ठित होगा जहां वह कभी रहा है।

 

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Tags: #आयाम #सूत्र #गणित #शिक्षा #ज्ञान

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