| वर्तमान दौर में यह युद्ध केवल रणनीतिक नहीं बल्कि राजनीतिक, आर्थिक और वैचारिक प्रतिस्पर्धा का प्रतीक है। इसका समाधान कूटनीति, क्षेत्रीय सहयोग और अंतरराष्ट्रीय संवाद से ही सम्भव है। इस युद्ध से अब समस्त दुनिया प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से प्रभावित हो रही है। अत: ऐसे परिवेश में अब भारत की कूटनीति को बड़े संयम, सतर्कता, सजगता एवं संतुलित रूप से काम करना होगा। |
अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच अनवरत रूप से जारी घातक युद्ध अब केवल तीन देशों तक सीमित नहीं रहा हैं बल्कि यह मध्य-पूर्व की भू राजनीति, वैश्विक शक्ति संतुलन और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा एक जटिल मुद्दा बन गया है। इस लड़ाई की शुरुआत 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजराइल द्वारा संयुक्त रूप से ईरान के सामरिक स्थलों तथा उसके परमाणु प्रतिष्ठानों को अपना निशाना बनाने के साथ हुई। इजराइल ने इस युद्ध अभियान को ‘ऑपरेशन ल्वॉइंस रोवर’ नाम दिया है।
इस आक्रमण में ईरान के अनेक मिसाइल सिस्टम और नेतृत्व से जुड़े प्रमुख स्थानों को मुख्य रूप से निशाना बनाया गया तथा ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या कर दी गई। इसके प्रतिशोध में ईरान ने ‘ट्रुथफुल प्रोमिस-4’ नामक सैन्य अभियान द्वारा खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों के साथ-साथ उनके ऊर्जा व नागरिक बुनियादी ढांचे को अपना लक्ष्य बनाकर जवाबी कार्यवाही की। ईरान के समर्थन में हिजबुल्लाह ने इजराइल पर रॉकेटो द्वारा प्रहार किया, तब इजराइल ने लेबनान पर तेज हवाई आक्रमण किए। इससे यह युद्ध अब क्षेत्रीय व वैश्विक स्वरूप लेने लगा है।
उल्लेखनीय है कि मध्यपूर्व में एक लम्बी अवधि से ईरान और इजराइल के बीच वैचारिक व सैन्य प्रतिस्पर्धा रही है। ईरान के परमाणु कार्यक्रम तथा बैलेस्टिक मिसाइल क्षमता के फलस्वरूप अमेरिका व इजराइल की धड़कनें बढ़ती रही हैं चूंकि इजराइल और अमेरिका के बीच सामरिक सहयोग होने के कारण वे एक दूसरे की सुरक्षा का समर्थन करते हैं। इस युद्ध को अमेरिका ने इजराइल के माध्यम से शुरु किया ताकि प्रत्यक्ष रूप से युद्ध से बचते हुए इजराइल का सैन्य समर्थन, हथियार एवं खुफिया सहयोग प्रदान करता रहे।
विश्व भर के विशेषज्ञ यह मान रहे हैं कि इस युद्ध में कूदने के कारण अमेरिका स्वयं भी बुरी तरह से फंस गया है। अमेरिका की अधिकांश जनता इस युद्ध को एक अनावश्यक कार्यवाही के रूप में मान रही है। आखिरकार अमेरिका अब अपने बनाए जाल में फंस गया है।
अमेरिका-इजराइल आक्रमण के बाद अब ईरान की जवाबी कार्यवाही से वैश्विक संकट और गहरा होता जा रहा है। ईरान ने इजराइल और खाड़ी में अमेरिका के सहयोगी देशों पर हमले करके जवाबी कार्यवाही अनवरत जारी रखी है, जिसमें नागरिक स्थलों और ऊर्जा सुविधाओं सहित गैर-सैन्य लक्ष्य भी शामिल हैं। लड़ाई तेजी से लगातार बढ़ रही है और लेबनान तक फैल चुकी है, जिसके फलस्वरूप सभी पक्षों में हताहतों की संख्या बढ़ती जा रही है।
ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मृत्यु के बाद 8 मार्च को उनके बेटे मोजतबा खामेनेई को उनका उत्तराधिकारी नियुक्त किया गया। अमेरिका और इजराइल ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े परमाणु ठिकानों को लगातार निशाना बनाया। ईरानी तेल रिफाइनरियों पर हमले से निपटने के लिए उसने पश्चिम एशिया मेें तेल और गैस की आपूर्ति और बाधित कर दी है। जैसा कि इस क्षेत्र में कच्चे तेल व गैस की आपूर्ति होर्मुज जलडमरूमध्य से ही की जाती है, अब उसे बंद कर दिया है। ईरान का ये जलमार्ग बंद रहा तो पश्चिम एशिया सहित विश्वव्यापी व्यवस्था के समक्ष ऊर्जा संकट खड़ा हो जाएगा।

हाल ही में एलपीजी से लदे दो भारतीय जलयानों को अपनी यात्रा में आगे बढ़ने की अनुमति देने के परिणामस्वरूप ही दुनिया के लिए भी उम्मीद दिखाई दी कि होर्मुज जलडमरूमध्य मार्ग अभी पूरी तरह ठप्प नहीं हुआ है। यद्यपि यहां से गुजरने वाले सभी तेल व गैस टैंकरों को ईरानी नौसेना से समन्वय बनाकर आगेे बढ़ना होगा। ईरान के नए सर्वोच्च नेता मोजतबा ने कहा था कि होर्मुज पर नियंत्रण एवं दबाव बनाए रखना ईरान की एक आवश्यकता है। वैश्विक ऊर्जा संकट को नियंत्रित करने के लिए ट्रम्प प्रशासन ने समुद्र में फंसे रूसी तेल व पेट्रोलियम उत्पादों की खरीद हेतु सभी देशों को 30 दिन की अस्थाई छूट दी है। यूरोप ने ट्रम्प के इस निर्णय का विरोध किया और नाराजगी भी व्यक्त की। ब्रिटेन ने कहा कि रूस पर लगाए प्रतिबंधों में कोई भी ढील नहीं होनी चाहिए।
पश्चिम एशिया के इस महासंग्राम का यही सिलसिला जारी रहा तो दुनिया का ये संकट और बढ़ेगा तथा इसके प्रत्यक्ष व परोक्ष प्रतिकूल प्रभाव से अमेरिका भी प्रभावित होगा। सैन्य युद्ध का 15वां दिन अब बहुत ही खतरनाक मोड़ पर आ गया, जब ईरान समर्थित रेजिस्टेंस फोर्स ने अमेरिकी वायुसेना के केसी-135 रियूलिंग हवाई टैंकर को मार गिराया, जिसमें सवार सभी 6 सैनिकों की मृत्यु हो गई। अब ईरान ने भारत से अपील की है कि इस पश्चिम एशिया के संकट में ब्राजील, रूस, भारत, चीन व दक्षिण अफ्रीका (ब्रिक्स) देश अपनी उचित भूमिका निभाएं। उल्लेखनीय है कि इस वर्ष 2026 में भारत ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है।

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि ईरान अपनी आत्मरक्षा के अधिकार का प्रयोग करने के लिए स्वतंत्र है। आक्रमण में ईरानी सर्वोच्च नेता मोजतबा खामनेई के घायल और कदाचित् अंग-भंग की भी आशंका अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेमसेथ ने व्यक्त की। ट्रम्प ने दावा किया कि फारस की खाड़ी में स्थित खार्ग आइलैण्ड पर उपस्थित ईरान के सैन्य ठिकानों को ध्वस्त कर दिया गया है।
ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स की नौसेना के प्रमुख रियर एडमिरल अलीरेजा के अनुसार होर्मुज में आदेश का उल्लंघन करने वाले जलपोत निशाना बनेंगेेे। अब तक 17 तेल टैंकरों को निशाना बनाया जा चुका है। इसमें इराक के तट के निकट पांच तेल टैंकरों पर हमले के बाद आग लग गई। संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी के अनुसार (आलेख लिखे जाने तक)ईरान में अब तक 32 लाख से अधिक लोग विस्थापित हो चुके हैं और लगभग 2000 लोगों को मृत्यु हो चुकी है। लेबनान में 8 लाख लोग घर छोड़ने पर मजबूर हुए हैं।

हिजबुल्ला ने इजराइल पर 200 से अधिक रॉकेट दागे तथा इजराइल ने ईरान के अनेक सैन्य ठिकानों पर जोरदार हमले किए। ट्रम्प के एक दावे के अनुसार-अमेरिकी नौसेना ने अब तक 30 विस्फोटक लदी नावों को नष्ट किया है, ईरान के 90 जलयानों को जलमग्न किया तथा 6000 ठिकानों पर हमले किए हैं। दूसरी ओर ईरान द्वारा ईराक में अमेरिकी दूतावास पर प्रक्षेपास्त्र प्रहार, सऊदी अरब में भी 5 अमेरिकी वायुसेना के विमान नष्ट किए।

अमेरिका-इजराइल बनाम ईरान युद्ध इस समय एक अत्यंत गम्भीर, घातक एवं विस्फोटक स्थिति में है। ‘आपरेशन एविक यूरी’ के अंतर्गत अमेरिका और इजराइल ने संयुक्त रूप से ईरान पर हमले किए हैं। इसका प्रमुख लक्ष्य ईरान में सत्ता परिवर्तन और उसके परमाणु कार्यक्रम के साथ ही मिसाइल क्षमताओं को नष्ट करना घोषित किया गया। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प स्वयं को विश्व व्यवस्था की दशा व दिशा तय करने वाले स्वयंभू नेता के रूप में मानते हैं। उनकी दादागीरी, दबंगी, दबाव, दुतरफरी चाल और दहशतगर्दी ने दुनिया को हैरत में डाल दिया है। इस समय यह युद्ध अंतरराष्ट्रीय राजनीति व वैश्विक सम्बंधों का अत्यंत महत्वपूर्ण व सामयिक विषय बन गया है।
डॉ. सुरेंद्र कुमार मिश्र

