| दुनिया का प्रत्येक देश किसी न किसी रूप में एक दूसरे पर निर्भर है। ऐसे में विश्व के किसी कोने में भी युद्ध चल रहा हो तो उसका वैश्विक प्रभाव पड़ेगा ही…फिर ईरान-अमेरिका-इजराइल युद्ध का विश्व पर प्रभाव न पड़े, यह तो हो ही नहीं सकता। |
ईरान में चल रहा युद्ध कभी लगता है कि यह किसी भी समय समाप्त हो जाएगा और फिर लगता है कि शायद नहीं होगा। इजराइल का कहना है कि हमें तीन हफ्ते तक बमबारी और करनी होगी, जबकि डोनल्ड ट्रम्प का कहना है कि ईरान हार चुका है और युद्ध किसी भी समय समाप्त हो सकता है।
अंतिम परिणति क्या होगी कहना मुश्किल है, पर रहन-सहन और उसकी लागत, ऊर्जा पर निर्भरता, परिवहन, व्यापार मार्गों और रणनीतिक साझेदारियों तथा वैश्विक अर्थव्यवस्था की संवृद्धि में बदलाव दिखाई देने लगा है। इस युद्ध से होने वाला नुकसान अंततः इस बात पर निर्भर करेगा कि यह कितने समय तक चलता है। युद्ध तीन-चार सप्ताह के भीतर समाप्त हो गया, तो इसका प्रभाव अस्थाई होगा, पर यदि लम्बा खींचा तो दुनिया बड़े संकट से घिर जाएगी।
युद्ध को लेकर भारत की सबसे बड़ी दो चिंताएं हैं। एक, पेट्रोलियम और घरेलू गैस की आपूर्ति और दूसरे पश्चिम एशिया में रह रहे भारतीयों की चिंता। युद्ध ने फारस की खाड़ी की अर्थव्यवस्थाओं की नींव हिला दी है। सुरक्षित आश्रय स्थलों के रूप में उनकी सावधानीपूर्वक बनाई गई छवि चकनाचूर हो रही है। अरब देशों में आर्थिक-संकट पैदा होगा, तो लगभग 1 करोड़ भारतीयों के रोजी-रोजगार पर संकट मंडराने लगेगा। इस युद्ध ने यह भी बताया है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद बनी संयुक्त राष्ट्र जैसी वैश्विक प्रशासनिक-व्यवस्था बुरी तरह विफल हुई है। बैंकिंग सिस्टम, एनर्जी सप्लाई और वैश्विक व्यापार-तीनों एक साथ दबाव में हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रम्प के हाल के कुछ निर्णयों ने पहले से ही यह जटिलता पैदा कर दी थी।

वैश्विक अर्थव्यवस्था
युद्ध ने वैश्विक अर्थव्यवस्था और बाजारों में भारी उथल-पुथल मचा दी है। इसका सबसे गम्भीर असर ऊर्जा आपूर्ति और परिवहन मार्गों पर पड़ा है। सबसे ज्यादा उछाल खनिज तेल की कीमतों में दिखाई दे रहा है। ब्रेंट क्रूड तेल की कीमतें कुछ ही दिनों में 70 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 110 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं।डोनॉल्ड ट्रम्प ने 9 मार्च को घोषणा की कि ईरान के खिलाफ उनका अभियान ‘बहुत जल्द’ समाप्त हो जाएगा, जिससे तेल की कीमतें, जो एक दिन पहले लगभग 120 डॉलर प्रति बैरल के उच्चतम स्तर पर थीं, गिरकर लगभग 80 डॉलर तक पहुंच गईं।
युद्ध से पहले वे 70 डॉलर थीं। दो दिन बाद भी जब युद्ध खत्म होने के आसार दिखाई नहीं दिए, तो फिर से बढ़ गईं। 16 मार्च तक विश्व स्तर पर खनिज तेल की कीमतें 100 डॉलर को पार कर चुकी थीं। सऊदी अरब की तेल कम्पनी आराम्को के सीईओ ने चेतावनी दी है कि लगभग 18 करोड़ बैरल तेल इस युद्ध की भेंट चढ़ चुका है।
कतर की मुख्य तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) निर्यात सुविधा बंद है, जिससे वैश्विक आपूर्ति का लगभग पांचवां हिस्सा बाजार से बाहर हो गया है। इसके उत्पादन-विस्तार को भी स्थगित कर दिया गया है। कतर के निर्यात में आई रुकावट ने एशिया में अफरा-तफरी मचा दी है।

तेल पर निर्भरता
दुनिया आज तेल पर अपनी निर्भरता कम कर रही है, पर उसका पक्का विकल्प अभी तैयार हो नहीं पाया है। पेट्रोलियम का पहला संकट 1973 में पैदा हुआ था, जब अरब देशों के प्रतिबंध के कारण खनिज तेल की कीमतें चौगुनी हो गईं थीं। इसके बाद 1979-80 में, ईरानी क्रांति और ईरान-इराक युद्ध ने आपूर्ति को बुरी तरह प्रभावित किया था। बिजली उत्पादन में आज पेट्रोलियम का प्रयोग कम हो गया है, पर परिवहन और पेट्रो केमिकल्स और कुछ अन्य उद्योगों के लिए तेल की आवश्यकता आज भी है। बेशक स्थिर है, यानी बढ़ नहीं रही है, पर आपूर्ति में कमी 70 के दशक के दोनों संकटों से कहीं अधिक हैं। इस युद्ध को लम्बा खींचकर ईरान यह जताने का प्रयास कर रहा है कि इस खेल की बाजी उसी के हाथ में है, न कि अमेरिकी सेना के। उसने होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते से आने वाले टैंकरों के परिवहन को रोकने की घोषणा करके एक बड़ी समस्या पैदा कर दी है। दुनिया की तेल आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर निकलता है।
होर्मुज के रास्ते यातायात बाधित होने से वैश्विक तेल बाजार में इतिहास का सबसे बड़ा व्यवधान पैदा हुआ है। युद्ध का नया केंद्र यह मार्ग बन गया है। ऊर्जा प्रवाह में रुकावट वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी चिंता का विषय है। ईरान यह बात भली-भांति जानता है, उसे यह भी पता चल गया है कि होर्मुज मार्ग को रोकना आसान और अपेक्षाकृत सस्ता है।
शेयर बाजारों में गिरावट
वैश्विक निवेशकों में घबराहट के कारण दुनिया भर के शेयर बाजारों में भारी बिकवाली हो रही है। युद्ध शुरू होते ही 2 मार्च को डाऊ जोन्स 400 से अधिक अंक गिर गया था। भारतीय शेयर बाजारों में निवेशकों को भारी नुकसान हुआ है। शुरुआती 3 हफ्तों में निवेशकों के लगभग 30 लाख करोड़ रुपए डूब गए।
ऊर्जा और परिवहन लागत बढ़ने से वैश्विक स्तर पर मुद्रास्फीति का दबाव बढ़ गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि संघर्ष लम्बा खींचेगा, तो वैश्विक विकास दर में भारी गिरावट आएगी। खाड़ी क्षेत्र में यात्री विमानों की उड़ानें बंद होने से अमीरात जैसी प्रमुख एयरलाइनों की हजारों उड़ानें रद्द हुई हैं। जलमार्ग से माल ढोने वाली कम्पनियां अब स्वेज नहर की बजाय केप ऑफ गुड होप मार्ग का उपयोग कर रही हैं, जिससे शिपिंग समय और लागत दोनों बढ़ गए हैं।
वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम ने हीलियम संकट की ओर ध्यान दिलाया है। क़तर के रास लफान हब में व्यवधान के कारण दुनिया के एक-तिहाई हीलियम की आपूर्ति बाजार से बाहर हो गई है। हीलियम एक महत्त्वपूर्ण, उत्कृष्ट हल्की गैस है, जिसका उपयोग चिकित्सा (एमआरआई मशीनों), उच्च-तकनीक निर्माण (सेमीकंडक्टर/चिप), अंतरिक्ष अनुसंधान (रॉकेट ईंधन दबाव), और वैल्डिंग (शील्डिंग गैस) में किया जाता है। इसकी सप्लाई रुकने से कई तरह की औद्योगिक गतिविधियां ठप्प होने का भय है।
खाड़ी देशों की छवि
फारस की खाड़ी से जुड़े अरब देशों ने इन क्षेत्रों में स्थिरता और समृद्धि केंद्रों की छवि बनाई है। यहां के शहरों में ढेर सारी गतिविधियां, खेलों के आयोजन, मनोरंजन, सम्मेलन-समारोहों और मौज-मस्ती, खानपान के विकल्प उपलब्ध हैं। खाड़ी देशों के शासक केवल अपने देशों की जनता को आजीविका, आराम और सुरक्षा की गारंटी नहीं देते हैं, बल्कि दूसरे देशों के कुशल कारीगरों, इंजीनियरों, विशेषज्ञों और कामगारों को भी रोजगार प्रदान करते हैं। इस तरह वैश्विक समृद्धि में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
युद्ध समाप्त हो भी जाएगा, तब भी खाड़ी देशों को आने वाले वर्षों में इसके दुष्परिणामों से जूझना होगा, क्योंकि पश्चिमी देशों के पूंजीपति यहां से हटने पर विचार करने लगे हैं। एक अर्से से छोटी-छोटी जनसंख्या वाले, ये अमीर देश अमेरिकी सुरक्षा कवच पर निर्भर थे। उन्होंने अमेरिकी हथियार खरीदे, अपने देशों में अमेरिकी फौजी अड्डे बनने दिए और कुछ मामलों में, अपने सैनिकों को अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों के साथ और इस्लामिक स्टेट के विरुद्ध लड़ने के लिए भेजा।
डोनॉल्ड ट्रंप की पहल पर सितम्बर 2020 में हुए अब्राहमिक समझौते ने इस क्षेत्र में कुछ नई सम्भावनाएं पैदा कर दीं। इजराइल और संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, सूडान और मोरक्को जैसे कई अरब/मुस्लिम देशों के बीच हुए समझौते के कारण इस क्षेत्र में न केवल शांति-स्थापना के आसार बढ़ गए साथ ही व्यापार, सुरक्षा और प्रौद्योगिकी सहयोग बढ़ने की सम्भावनाएं पैदा हो गईं। सऊदी अरब भी इस समझौते में शामिल होने वाला है कि तभी 7 अक्तूबर 2023 को हमास ने गाज़ा में बड़ी आतंकी कार्रवाई करके सारा गणित बिगाड़ दिया।
भारत ने भी आई2यू2 समझौते के तहत कुछ महत्त्वाकांक्षी योजनाओं पर काम शुरू किया था। इसके अलावा भारत-पश्चिम एशिया कॉरिडोर पर काम शुरू होने ही वाला था, जिससे यूरोप तक का एक नया और छोटा रास्ता तैयार हो जाता। फिलहाल इन कार्यक्रमों पर ब्रेक लग गया है।

