जो बाइडेन का आगमन और परिवर्तन के संकेत

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अमेरिका में सामाजिक आधार पर जो ध्रुवीकरण हो रहा है, वह ज्यादा बड़ी चिंता का विषय है। यह सामाजिक विभाजन खत्म नहीं हो जाएगा, बल्कि अंदेशा है कि बढ़ेगा। नए राष्ट्रपति जो बाइडेन के सामने ज्यादा बड़ी चुनौती उस सामाजिक टकराव को रोकने की है, जो अब शुरू होगा। अमेरिका के गोरे बाशिंदे, जो खेती या औद्योगिक मजदूर हैं अपने देश में बाहर से आए लोगों को लेकर परेशान हैं। उनके सामने रोजगार की समस्याएं भी खड़ी हुईं हैं।

ट्रंप की पराजय से कितने बदलेंगे भारत-अमेरिका रिश्ते

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तत्कालिन राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में जो बाइडेन उप राष्ट्रपति थे और भारत के साथ अच्छे रिश्ते बनाने के जबर्दस्त समर्थक थे। उन्होंने पहले सीनेट की विदेशी मामलों की समिति के अध्यक्ष के रूप में और बाद में उप राष्ट्रपति के रूप में अमेरिका की भारत-समर्थक नीतियों को आगे बढ़ाया। वस्तुतः उपराष्ट्रपति बनने के काफी पहले सन 2006 में उन्होंने कहा था, ‘मेरा सपना है कि सन 2020 में अमेरिका और भारत दुनिया में दो निकटतम मित्र देश बनें।’

चीन को चाहिए करारा जवाब!

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भारत-चीन के बीच लड़ाई हुई भी तो आज 1962 की स्थिति नहीं है। भारतीय सेना काफी अच्छी स्थिति में है और चीन उतनी बड़ी ताकत नहीं है, जितना उसे समझा जा रहा है। चीनी अहंकार और पाकिस्तान के साथ मिलकर की जा रही उसकी साजिशों के कारण भारत को कुछ कड़े राजनयिक निर्णय करने ही होंगे।

श्रीलंका के बदलते हालात में भारत की भूमिका

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श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे एक अरसे से कहते रहे हैं कि उन्होंने अनुभवों से सीखा है और भारत के साथ उनके रिश्ते संतुलित रहेंगे। दूसरी तरफ भारत सरकार ने भी श्रीलंका के साथ संतुलन बरतने की कोशिश की है। चीन के प्रति राजपक्षे के झुकाव को किस तरह नियंत्रित करें यह भारत के समक्ष बड़ी चुनौती होगी।

बेरूत के धमाकों से दहल उठी दुनिया

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बेरूत में हुआ धमाका इतना भीषण था कि आकाश में एटमी विस्फोट जैसा मशरूम बना। विस्फोट की आवाज ढाई सौ किमी दूर साइप्रस में भी सुनी गई। असंख्य लोग हताहत हुए। कोरोना के बाद इस विस्फोट ने लेबनान की अर्थव्यवस्था की रीढ़ ही तोड़ दी।

नेपाल में चीनी ड्रेगन का शिकंजा

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चीनी राजदूत होऊ यांछी की पिछले तीन महीनों में नेपाल के राजनीतिक नेताओं से मुलाकातों से इतना तो साफ हो गया है कि नेपाल में भारत विरोधी खेल की वे सूत्रधार हैं। नेपाली प्रधानमंत्री ओली तो इस राजदूत महिला के हाथों कठपुतली बन गए हैं। जो कभी भारत के करीब माने जाते थे वे अब चीनी ड्रेगन के पंजे में जकड़ गए हैं।

चीन को जरूर मिलेगा भारत से करारा जवाब!

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भारत को वैश्विक जनमत का समर्थन मिलेगा, पर चीन का सामना हमें अपनी सामर्थ्य से करना होगा, किसी की मदद से नहीं। ...चीन की चुनौती हमें अपनी सामर्थ्य को बढ़ाने की प्रेरणा दे रही है। अभी दें या कुछ समय बाद, चीन को जवाब तो हमें देना ही है।

टेक्नोट्रॉनिक युद्ध के लिए तैयार भारतीय सेना

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भविष्य के युद्ध नेटवर्क सेंट्रिक होंगे। यानी सैनिक पूरी तरह सायबर स्पेस से जुड़े होंगे। विशेष किस्म के सूट और ‘कॉम्बैट गॉगल’ सैनिक पहनेंगे। सैनिक के सामने जो कुछ भी आएगा उसे ये चश्मे रिकॉर्ड करते जाएंगे। इनकी मदद के मार्फत दिशाज्ञान होगा, शत्रु पक्ष की खुफिया जानकारी होगी और लोकल भाषा का तुरंत अनुवाद भी होता जाएगा।

मजदूरों के हितैषी डॉ. आंबेडकर

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भारत में मजदूर आंदोलनउन्नीसवीं सदी में ही शुरू हो गए थे। सन १८७७ में नागपुर की एम्प्रेस मिल्स के मजदूरों ने हड़ताल की। इसके बाद १८८४ में मुंबई की कपड़ा मिलों के ५००० मजदूरों ने हड़ताल की। सन १९२० में ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस बन चुकी थी। सन १९२२ में फैक्ट्रीज एक्ट लागू हुआ जिसके तहत मजदूरों के काम के घंटे १० तय हुए थे।

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