ऑपरेशन ‘देवी शक्ति’

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यह नाम ‘ऑपरेशन देवी शक्ति’ इसलिए रखा गया क्योंकि जैसे ‘मां दुर्गा’ राक्षसों से बेगुनाहों की रक्षा करती हैं, उसी प्रकार इस मिशन का लक्ष्य बेकसूर नागरिकों को तालिबान के आतंकियों की हिंसा से रक्षा करना है। यह ऑपरेशन वायुसेना की भूमिका और तालिबानियों की निर्ममता पर एक साथ टिप्पणी है।

अफगानिस्तान की हलचल का भारत पर प्रभाव

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अफगानिस्तान में तालिबान का वर्चस्व स्थापित हो चुका है। राष्ट्रपति अशरफ गनी, उपराष्ट्रपति अमरुल्लाह सालेह और उनके सहयोगी देश छोड़कर चले गए हैं।

नेतृत्व विहीन अफगानिस्तान

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तालिबानी की विजय की खबर आने के बाद मलाला युसुफज़ई ने ट्वीट किया, ‘अफगानिस्तान पर तालिबान का नियंत्रण होने से हम स्तब्ध हैं। मुझे स्त्रियों, अल्पसंख्यकों और मानवाधिकार-समर्थकों को लेकर चिंता है। वैश्विक, क्षेत्रीय और स्थानीय शक्तियों को चाहिए कि वे फौरन युद्धविराम कराएं, जरूरी मानवीय सहायता मुहैया कराएं और शरणार्थियों तथा नागरिकों की हिफाजत करें।’ मलाला युसुफज़ई कौन है?वही जिसे तहरीके तालिबान ने इसलिए गोली मारी थी, क्योंकि वह पढ़ना चाहती थी और लड़कियों की पढ़ाई की समर्थक थी।

सवालों से घिरा अफगानिस्तान और भारत की भूमिका

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अफगानिस्तान सरकार के पास तालिबानी लड़ाकों की तुलना में चार-पांच गुना ज्यादा सैनिक हैं और वायुसेना भी है। वह लड़ने पर उतारू हो, तो तालिबान के लिए आसान नहीं होगा। क्या देश अराजकता की ओर बढ़ रहा है? विशेषज्ञों का कहना है कि 1990 के दशक के मुकाबले आज का तालिबान कहीं ज़्यादा बंटा हुआ है। वह ज़मीनी स्तर पर कब्जे की कहानियां इसलिए फैला रहा है, ताकि दोहा-वार्ता में मोल-भाव की ताकत बढ़े। इसमें काफी बातें प्रचार का हिस्सा हैं, जिसका सूत्रधार पाकिस्तान है।

इज़राईल का ‘बेमेल-गठबंधन’ नेतन्याहू को हटाने में सफ़ल

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गठबंधन बनाने में सफलता प्राप्त करने वाले नेफ़्टाली बेनेट ने चुनाव-प्रचार के दौरान कहा था कि हम वामपंथियों, मध्यमार्गी पार्टियों और अरब पार्टी के साथ गठबंधन नहीं करेंगे। अब उन्हीं दलों के साथ उन्होंने गठबंधन किया है। इसी को लेकर नेतन्याहू ने आरोप लगाया कि यह इलेक्शन फ्रॉड है।

जटिल समस्या फलस्तीन-इजराइल संघर्ष

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अमेरिका के पिछले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यरूशलम को इजराइल की राजधानी बनाने का खुला समर्थन किया था। उन्होंने यह भी कहा था कि हम अपने दूतावास को यरूशलम में स्थानांतरित करेंगे। हालांकि जो बाइडेन का वर्तमान प्रशासन उस हद तक इजराइल का समर्थक नहीं है, पर सं.रा. सुरक्षा परिषद में जरूरी हुआ, तो उसके हितों की रक्षा करेगा।

गृहयुद्ध की आग में झुलसता म्यांमार

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इन सारे सवालों से जुड़ा सवाल है कि भारत चुप क्यों है? इस समय भारत उतनी शिद्दत के साथ सैन्य शासन के विरुद्ध क्यों नहीं बोल रहा, जैसा 1988 में बोलता था? सवाल यह भी है कि उससे हमें मिला क्या? हमारे रिश्ते खराब हुए, जिनका लाभ चीन को मिला। म्यांमार में चीन की दिलचस्पी किसी से छिपी नहीं है।

जो बाइडेन का आगमन और परिवर्तन के संकेत

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अमेरिका में सामाजिक आधार पर जो ध्रुवीकरण हो रहा है, वह ज्यादा बड़ी चिंता का विषय है। यह सामाजिक विभाजन खत्म नहीं हो जाएगा, बल्कि अंदेशा है कि बढ़ेगा। नए राष्ट्रपति जो बाइडेन के सामने ज्यादा बड़ी चुनौती उस सामाजिक टकराव को रोकने की है, जो अब शुरू होगा। अमेरिका के गोरे बाशिंदे, जो खेती या औद्योगिक मजदूर हैं अपने देश में बाहर से आए लोगों को लेकर परेशान हैं। उनके सामने रोजगार की समस्याएं भी खड़ी हुईं हैं।

ट्रंप की पराजय से कितने बदलेंगे भारत-अमेरिका रिश्ते

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तत्कालिन राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में जो बाइडेन उप राष्ट्रपति थे और भारत के साथ अच्छे रिश्ते बनाने के जबर्दस्त समर्थक थे। उन्होंने पहले सीनेट की विदेशी मामलों की समिति के अध्यक्ष के रूप में और बाद में उप राष्ट्रपति के रूप में अमेरिका की भारत-समर्थक नीतियों को आगे बढ़ाया। वस्तुतः उपराष्ट्रपति बनने के काफी पहले सन 2006 में उन्होंने कहा था, ‘मेरा सपना है कि सन 2020 में अमेरिका और भारत दुनिया में दो निकटतम मित्र देश बनें।’

चीन को चाहिए करारा जवाब!

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भारत-चीन के बीच लड़ाई हुई भी तो आज 1962 की स्थिति नहीं है। भारतीय सेना काफी अच्छी स्थिति में है और चीन उतनी बड़ी ताकत नहीं है, जितना उसे समझा जा रहा है। चीनी अहंकार और पाकिस्तान के साथ मिलकर की जा रही उसकी साजिशों के कारण भारत को कुछ कड़े राजनयिक निर्णय करने ही होंगे।

श्रीलंका के बदलते हालात में भारत की भूमिका

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श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे एक अरसे से कहते रहे हैं कि उन्होंने अनुभवों से सीखा है और भारत के साथ उनके रिश्ते संतुलित रहेंगे। दूसरी तरफ भारत सरकार ने भी श्रीलंका के साथ संतुलन बरतने की कोशिश की है। चीन के प्रति राजपक्षे के झुकाव को किस तरह नियंत्रित करें यह भारत के समक्ष बड़ी चुनौती होगी।

बेरूत के धमाकों से दहल उठी दुनिया

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बेरूत में हुआ धमाका इतना भीषण था कि आकाश में एटमी विस्फोट जैसा मशरूम बना। विस्फोट की आवाज ढाई सौ किमी दूर साइप्रस में भी सुनी गई। असंख्य लोग हताहत हुए। कोरोना के बाद इस विस्फोट ने लेबनान की अर्थव्यवस्था की रीढ़ ही तोड़ दी।

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