पुराने दौर में युद्ध सीमाओं, भूभाग और सामरिक वर्चस्व के लिए लड़े जाते थे किंतु वर्तमान दौर एक नए यथार्थ का साक्षी है, जहां अब युद्ध का केंद्र ‘संसाधन’ (विशेषकर ऊर्जा) हैं। आधुनिक संघर्षों में गोलियां और मिसाइलें केवल सैनिक ठिकानों पर नहीं बल्कि तेल के कुओं, गैस संयंत्रों और समुद्री व्यापार मार्गों पर भी दागी जा रही हैं। पश्चिम एशिया में ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच उभरता त्रिकोणीय टकराव इसी बदलते वैश्विक समीकरण का प्रत्यक्ष उदाहरण है, जहां असली दांव जमीन नहीं बल्कि ऊर्जा आपूर्ति की जीवनरेखा पर नियंत्रण है।
भारत के लिए यह संकट केवल एलपीजी, पैट्रोल-डीजल की कमी का मुद्दा नहीं है बल्कि यह एक गहरी और बहुआयामी राष्ट्रीय सुरक्षा चुनौती बन चुका है। यह संकट उस अदृश्य ‘ऊर्जा लॉकडाउन’ का संकेत है, जो बिना किसी चेतावनी के देश की अर्थव्यवस्था को ठहराव की स्थिति में धकेल सकता है। जब शीर्ष नेतृत्व इस संकट की तुलना कोरोना काल से करता है तो उसका आशय सामाजिक बंदिशों से नहीं बल्कि उस वैश्विक अनिश्चितता से है, जो किसी भी क्षण विकास की गति को जाम कर सकती है।

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, जो विश्व ऊर्जा आपूर्ति का धड़कता हुआ नाड़ी तंत्र है, आज इस संघर्ष का सबसे संवेदनशील बिंदु बन चुका है। यह संकरा जलमार्ग दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत कच्चे तेल और भारी मात्रा में एलएनजी के परिवहन का मार्ग है। यदि यह मार्ग बाधित होता है तो इसका प्रभाव केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक होगा।
भारत, जो अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है, इस झटके को सहन करने की स्थिति में नहीं है। देश की ऊर्जा आपूर्ति का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा इसी मार्ग से होकर आता है। ऐसे में यदि यह धारा थमती है तो भारतीय अर्थव्यवस्था की धमनियों में बहने वाला ऊर्जा प्रवाह अचानक रुक सकता है। पिछले कुछ सप्ताहों में कच्चे तेल की कीमतों में आई तीव्र वृद्धि इस संकट की गंभीरता को और स्पष्ट करती है। 85 डॉलर प्रति बैरल से शुरू होकर कीमतों का 110 डॉलर के पार पहुंच जाना केवल एक आर्थिक आंकड़ा नहीं बल्कि चेतावनी है।

भारत जैसे आयात-निर्भर देश के लिए कच्चे तेल में प्रत्येक 10 डॉलर की वृद्धि सीधे चालू खाता घाटे में 12 से 15 अरब डॉलर का इजाफा करती है। यह एक ऐसा आर्थिक दबाव है, जो न केवल मुद्रा विनिमय दर को प्रभावित करता है बल्कि महंगा, राजकोषीय घाटा और आम नागरिक के जीवन स्तर को भी प्रभावित करता है।
ऊर्जा सुरक्षा के इस संकट में भारत की सबसे बड़ी कमजोरी उसका सीमित सामरिक पैट्रोलियम भंडार है। जहां विकसित देश 90 दिनों तक की आपूर्ति सुरक्षित रखने की क्षमता रखते हैं, वहीं भारत का भंडार मुश्किल से कुछ दिनों की जरूरतें पूरी कर सकता है। यह स्थिति एक उभरती हुई महाशक्ति के लिए न केवल चिंताजनक है बल्कि रणनीतिक दृष्टि से खतरनाक भी है।
यदि किसी कारणवश आपूर्ति श्रृंखला बाधित होती है तो देश को तत्काल प्रभाव से आर्थिक और औद्योगिक गतिविधियों को सीमित करना पड़ सकता है। यह विडंबना ही है कि एक ओर भारत वैश्विक मंच पर अपनी बढ़ती शक्ति और प्रभाव का दावा करता है, वहीं दूसरी ओर उसकी ऊर्जा सुरक्षा इतनी नाजुक स्थिति में है। यदि पर्याप्त सामरिक भंडार होता तो भारत अपनी विदेश नीति में अधिक आत्मविश्वास और स्वतंत्रता के साथ निर्णय ले सकता था किंतु वर्तमान स्थिति में ऊर्जा निर्भरता ने हमारी कूटनीतिक स्वायत्तता को सीमित कर दिया है।
भारत की विदेश नीति, जो लंबे समय तक ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ के सिद्धांत पर आधारित रही, आज ऊर्जा आवश्यकताओं के दबाव में संतुलन साधने के लिए विवश है। ईरान जैसे पारंपरिक साझेदार के साथ संबंधों में आई दूरी और खाड़ी देशों के साथ बढ़ती निकटता इसी विवशता का परिणाम है। खाड़ी क्षेत्र में कार्यरत लाखों भारतीयों की सुरक्षा और वहां से आने वाला विशाल रेमिटेंस भारत की अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऐसे में भारत के लिए किसी एक पक्ष का खुलकर समर्थन करना आसान नहीं है। यह स्थिति एक कठोर सत्य को उजागर करती है कि ऊर्जा पर निर्भरता केवल आर्थिक नहीं बल्कि कूटनीतिक परतंत्रता भी पैदा करती है। जब तक भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए केवल बाहरी स्रोतों पर निर्भर रहेगा, तब तक उसकी विदेश नीति पर बाहरी शक्तियों का अप्रत्यक्ष प्रभाव बना रहेगा।

इस संकट के बीच देश में फैल रही अफवाहें और आशंकाएं भी एक अलग चुनौती प्रस्तुत करती हैं। संकट के समय में जनमानस का संतुलित रहना उतना ही आवश्यक है, जितना कि सरकारी तंत्र का प्रभावी होना। सरकार द्वारा दिए गए आश्वासन तत्काल राहत तो प्रदान करते हैं किंतु वे दीर्घकालिक समाधान का विकल्प नहीं हो सकते। वास्तविक समाधान केवल दूरदर्शी नीति और ठोस क्रियान्वयन में निहित है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत ऊर्जा आत्मनिर्भरता को केवल एक नीतिगत लक्ष्य न मानकर राष्ट्रीय अस्तित्व का प्रश्न समझे। वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की ओर तेजी से बढ़ना अब विकल्प नहीं, अनिवार्यता बन चुका है। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, परमाणु शक्ति और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे स्रोत न केवल पर्यावरण के अनुकूल हैं बल्कि दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा के स्तंभ भी बन सकते हैं। घरेलू स्तर पर ऊर्जा खपत के पैटर्न में बदलाव भी उतना ही आवश्यक है।
यदि रसोई, परिवहन और उद्योगों में पारंपरिक ईंधनों की जगह विद्युत और जैव-ईंधन का उपयोग बढ़ाया जाए तो आयात पर निर्भरता को काफी हद तक कम किया जा सकता है। यह परिवर्तन केवल आर्थिक लाभ ही नहीं देगा बल्कि पर्यावरणीय संतुलन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी सशक्त करेगा। परिवहन क्षेत्र में विद्युतीकरण इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। वर्तमान में तेल की सबसे अधिक खपत इसी क्षेत्र में होती है। यदि सार्वजनिक परिवहन और वाणिज्यिक वाहनों को बड़े पैमाने पर इलैक्ट्रिक किया जाए तो यह विदेशी मुद्रा की भारी बचत कर सकता है।
ऊर्जा संकट का यह दौर भारत के लिए एक चेतावनी भी है और एक अवसर भी। चेतावनी इस बात की कि वर्तमान निर्भरता भविष्य में और बड़े संकट का कारण बन सकती है और अवसर इस रूप में कि भारत इस संकट को अपनी नीतियों में निर्णायक बदलाव के लिए प्रेरणा बना सकता है। आवश्यकता इस बात की है कि ऊर्जा सुरक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा के केंद्र में रखा जाए। सामरिक भंडार को सुदृढ़ करना, आपूर्ति स्रोतों का विविधीकरण करना और वैकल्पिक ऊर्जा में निवेश बढ़ाना, ये तीनों कदम अब विलंब नहीं सह सकते। स्पष्ट है कि वैश्विक परिस्थितियों पर हमारा नियंत्रण सीमित हो सकता है किंतु अपनी तैयारी और रणनीति पूरी तरह हमारे हाथ में है।
यदि भारत आज निर्णायक कदम उठाता है तो वह न केवल इस संकट से उबर सकता है बल्कि भविष्य में ऐसी चुनौतियों का सामना करने के लिए और अधिक सशक्त बन सकता है। लेकिन यदि हम केवल तात्कालिक समाधान और डैमेज कंट्रोल तक सीमित रहते हैं तो यह संकट बार-बार हमारे सामने खड़ा होता रहेगा। ऊर्जा आत्मनिर्भरता अब कोई विकल्प नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अस्तित्व की अनिवार्य शर्त है। यह केवल आर्थिक नीति नहीं बल्कि भारत के भविष्य की दिशा तय करने वाला निर्णायक तत्व है।
– योगेश कुमार गोयल

