छींक एक ऐसी प्रक्रिया है जिसका उपयोग हमारा शरीर नाक को साफ रखने के लिए करता है। जब गंदगी, पराग, धुआं या धूल जैसे बाह्य पदार्थ नाक में प्रवेश करते हैं, तो नाक में जलन या गुदगुदी हो सकती है। जब ऐसा होता है, तो हमारा शरीर वही करता है जो उसे नाक साफ़ करने के लिए करना चाहिए यानी हमें छींक आती है।
छींक पर सर्वप्रथम वैज्ञानिक ढ़ंग से विचार करने का प्रयत्न प्रसिद्ध दार्शनिक एवं वैज्ञानिक हिप्पोक्रेट्स को जाता है। 400 ईसा पूर्व लगभग जन्मे इस विद्वान का विचार था कि फेफड़ों की बीमारियों से ग्रस्त व्यक्तियों के लिए छींकना खतरनाक है जबकि अन्य रोगियों को इससे फ़ायदा होता है।

ब्रिटिश शल्य चिकित्सक एवं नेत्र विशेषज्ञ सर जोनाथन हचिन्सन (23 जुलाई, 1828 – 23 जून, 1913 ) छींकने को अच्छे स्वास्थ्य का प्रतीक मानते थे। बहरहाल, वैज्ञानिक छींक पर अनुसंधान करते रहे और आज जो जानकारी उपलब्ध है, उसके अनुसार यह एक नासिका क्षोभक (irritant) प्रतिवर्त है और इसका अच्छे या बुरे स्वास्थ्य, जन्म अथवा मृत्यु से कोई रिश्ता नहीं है और न इसका शकुन अथवा अपशकुन से कोई सैद्धांतिक संबंध है।
दरअसल, छींक हमारी नाक की भीतरी सतह में मौजूद तंत्रिकाओं के सीमांत सिरों अथवा दृष्टि तंत्रिका के उद्दीपन से मस्तिष्क में पहुंचने वाले आवेगों के कारण उत्पन्न होने वाली एक अनैच्छिक प्रतिवर्ती क्रिया है। नाक में यह उद्दीपन किसी बाह्य पदार्थ की उपस्थिति, नाक की शलेष्मल कला की सूजन, जुकाम आदि से होता है। दृष्टि तंत्रिका चमकीले प्रकाश से उद्दीप्त होती है। नसवार के सूंघने से अथवा किसी वस्तु विशेष से एलर्जी की वजह से भी छींक आ जाती है।
यूं किसी भौतिक उद्दीपन और कई तरह के रासायनिक उत्तेजकों को नाक की भीतरी सतह पर प्रयोग करने से छींक पैदा की जा सकती है। हिस्टामीन जैसी औषधियों को सूंघने एवं नाक में होने वाले श्लेष्मीय स्राव से भी छींक आती है। शरीर की त्वचा को ठंडा करने, शिरोवल्क (स्कैल्प) या कान पर उत्तेजकों की उपस्थिति तथा कतिपय मनोवैज्ञानिक कारणों से भी छींक आ सकती है। वजह चाहे जो भी हो, नाक के भीतर अजीब सी गुदगुदी महसूस होते ही हमें छींक आती है।

सूरज की रोशनी कई लोगों को छींकने का कारण बनती है। विश्व चर्चित साइंस न्यूज वेबसाइट “लाइव साइंस” की एक रिपोर्ट के अनुसार लगभग चार में से एक व्यक्ति सूरज की रोशनी में छींकता है। वैज्ञानिक पूरी तरह से यह नहीं समझ पाए हैं कि ऐसा क्यों होता है? कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि तेज रोशनी की उपस्थिति में मस्तिष्क को पुतलियों को सिकोड़ने का जो संदेश मिलता है, वह छींकने के लिए मस्तिष्क को मिलने वाले संदेश के अनुरूप हो सकता है।
हिस्टीरियाजन्य कारणों से व्यक्ति को लंबे समय तक निरंतर छींक आ सकती है। ऐसे कुछ उदाहरण रिकॉर्ड भी किए गए हैं। ऐसा ही एक उदाहरण एक तेरह वर्षीय किशोरी का है जो 2 महीनों तक लगातार छींकती रही। उसकी छींक तभी बंद हुई जब उसे एक एकांत कमरे में रखा गया। ऐसे ही एक दूसरी युवती 20 मिनट की समयावधि के दौरान 200 से भी अधिक बार छींकी। एक किशोर का मामला भी दिलचस्प है। वह महीने भर से कुछ अधिक दिन प्रति मिनट तीन से लेकर छह बार तक छींकता रहा।
गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स के अनुसार ब्रिटेन में सन् 1969 में जन्मी एक 12 वर्षीया किशोरी डोना ग्रिफ़िथ्स लगातार 976 दिनों तक छींकती रही। ऐसा भी देखने में आया है कि काली खांसी के कुछ रोगियों में खांसी का दौरा समाप्त होने पर छींक का दौरा शुरू हो गया। नाक में पालिपों के कारण एवं बाह्य कर्ण गुहा में किसी इतर पदार्थ की मौजूदगी से भी छींक आती है।
नाक की श्लेष्मीय झिल्ली की सतह पर कैप्सेसिन औषध का स्थानीय अनुप्रयोग करने से उत्तेजकों को सूंघने के बावजूद छींक नहीं आती है। दरअसल, यह औषध तंत्रिकाओं में न्यूरोपेप्टाइड “सब्सटेंस पी (Substance P )” का नि:शेषण (depletion ) करती है। इससे यह संकेत मिलता है कि नाक की श्लेष्मीय झिल्ली में मौजूद तंत्रिकाओं के सीमांत सिरे ही छींक पैदा करने वाले उत्तेजकों के लिए ग्राही यानी रिसेप्टर्स का काम करते हैं यानी ये सिरे ही उद्दीपकों द्वारा पैदा आवेगों को मस्तिष्क में स्थित छींक केंद्र तक पहुंचाते हैं।
बहरहाल, मानव मस्तिष्क में छींक से जुड़ा विशिष्ट केंद्र कहां है, इस सवाल का उत्तर अभी अंतिम रूप से नहीं मिल पाया है। कुछ वैज्ञानिकों का विचार था कि यह ब्रेन स्टेम (मस्तिष्क का तने के समान भाग जो प्रमस्तिष्क गोलार्द्धों को मेरूरज्जु से जोड़ता है) में हो सकता है, लेकिन अभी इस मसले पर अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई है। बिल्लियों में यह केंद्र मज्जा (medulla) में होता है।
सन् 2021 में अमेरिका से प्रकाशित होने वाले प्रसिद्ध वैज्ञानिक जर्नल “सैल” के 15 जून के अंक में वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ मेडिसन के शोधकर्ता फेंगजियान ली और उनके साथियों ने चूहों में किए छींक संबंधी अपने अध्ययन में पाया कि छींक का संकेत देने के लिए न्यूरोमेडिन बी (एनएमबी) पेप्टाइड आवश्यक है और छींकने की प्रतिक्रिया नाक से मस्तिष्क तक एक पेप्टाइडर्जिक मार्ग द्वारा तय होती है।
छींक की उग्रता, आवाज और आयतन का संबंध लोगों की शरीर-रचना और शरीरक्रिया के साथ कई कारकों से है। उदर मांसपेशियों की शक्ति, फेफड़ों का आयतन, श्वास नली की बनावट के साथ-साथ छींक प्रक्रिया के दौरान फेफड़ों में पहुंची हवा के अलावा यह सब इस बात पर भी निर्भर करता है कि छींक के दौरान हवा मुँह से बाहर आती है या नथुनों से।
जब हम छींकते हैं तो लगभग 16 से लेकर 160 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से हमारे नासिका छिद्रों से निकलने वाली हवा के साथ बहुत बड़ी संख्या में रोगाणु बाहर आते हैं। यही वजह है कि समझदार लोग ‘आ छीं’ करते ही अपनी नाक पर रुमाल या टिश्यू पेपर रख देते हैं।
सन् 2016 में मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के मेडिकल इंजीनियरिंग और विज्ञान संस्थान की भौतिकविद लिडीया बूर्वुबा के एक शोध पत्र के अनुसार सामान्यतया छींक की फुहार में मौजूद अपेक्षाकृत बड़ी बूंदें छींकने वाले व्यक्ति से एक-दो मीटर की दूरी पर लुप्त हो जाती हैं, जबकि उसी फुहार की बदली में मौजूद महीन बूंदें कुछ सेकंड से लेकर कुछ मिनटों तक हवा में झूलते हुए छींकने वाले व्यक्ति से छह से लेकर आठ मीटर की दूरी पहुंच जाती हैं।
यूनिवर्सिटी ऑफ़ आर्कन्सा फॉर मेडिकल साइंसेज की श्रवण विज्ञानी (ऑडियोलॉजिस्ट) डॉ. एलिसन कैटलेट वुडाल के अनुसार छींक के दौरान नाक ढ़कना तो उचित है, किंतु छींक को रोकना कतई उचित नहीं है। दरअसल, छींक से तुरंत पहले फेफड़ों में मौजूद हवा पर एक बहुत बड़ा दबाव बनता है ताकि जब वह अत्यधिक तेज गति से नासिका मार्ग से बाहर आए तो अपने साथ वहां मौजूद क्षोभकों को भी बाहर धकेल पाए।
डॉ. वुडाल के अनुसार यदि कोई जबरदस्ती छींक को रोकने की कोशिश करता है तो फिर फेफड़ों से बाहर आती हवा यूस्टेचियन ट्यूब से होकर मध्यकर्ण गुहा में पहुंचती है। यद्यपि छींक रोकने से इंसान की श्रवण शक्ति को हानि पहुंचने की संभावना अत्यल्प है, लेकिन इसे नकारा भी नहीं जा सकता है। तीव्र गति से आने वाली यह हवा मध्य और भीतरी कान के साथ-साथ कान के पर्दे को भी नुकसान पहुंचा सकती है। साथ ही यकायक छींक को रोकने से आँखों और मस्तिष्क की रक्त वाहिकाओं को क्षति पहुंच सकती है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति विशेष को चक्कर (वर्टिगो) भी आ सकते हैं।
कुछ ऐसे मामले भी प्रकाश में आए हैं जहां छींकने की वजह से संबंधित व्यक्ति को शारीरिक क्षति भी पहुंची है। उदाहरण के लिए मई सन् 2004 में तेजी से छींकने की वजह अमेरिका के शिकागो क्लब से जुड़े बेसबाल के खिलाड़ी सैमी सोसा की कमर में जो मोच आई, उसकी वजह से वे एक महीने तक खेल नहीं पाए। तेजी से छींकने या उसे जबरदस्ती रोकने की वजह से दिल का दौरा, कार दुर्घटना और गर्भपात जैसे हादसों के होने के मामले भी सामने आए हैं।
छींक के शारीरिक प्रभावों में मुंह तथा गले की पेशियों का संकुचन, आंखों का टिमटिमाना और बंद होना तथा सिर सहित शरीर के ऊपरी भाग का संचालन प्रमुख है। छींक के दौरान आखों में पानी आ सकता है। कभी-कभी छींक की प्रबलता के कारण श्वसनी के बहिर्व्यास एवं हृदवाहिका प्रणाली में अस्थायी परिवर्तन हो सकता है।
यदाकदा, इस दौरान होने वाले कुछ अन्य शारीरक परिवर्तनों के कारण क्षणिक उच्च रक्त दाब, अथवा मूर्छा के लक्षण भी देखने को मिलते हैं। लाक्षणिक दृष्टि से छींक का अत्यंत अल्प महत्व है। हाँ, यदि इसकी निरंतरता बनी रही यानी किसी व्यक्ति को लगातार छींक आती रही तो इसकी तरफ अवश्य ध्यान दिया जाना चाहिए। ऐसे व्यक्ति के नाक, कान और गले की जांच जरूरी है।
बीमार व्यक्तियों को भी छींक आती है और यदि वे प्लूरिसी अथवा कमर के दर्द से पीड़ित हों तो उन्हें छींक अत्यधिक कष्टप्रद महसूस होती है। यूं ऐसा भी देखा गया है कि छींक आने से हिचकियों का दौरा समाप्त हो जाता है।
सन् 2012 में यूनिवर्सिटी ऑफ मिनेसोटा में कार्यरत कान, नाक, गला विशेषज्ञ डॉ. होली बोयर ने बताया कि अक्सर छींक आने के बाद हम राहत महसूस करते हैं। बोयर के अनुसार छींकते ही हमें उस पेशी खिंचाव से मुक्ति मिल जाती है जो छींक की प्रक्रिया की शुरुआत में हमारी छाती में दबाव पैदा करता है। इस दबाव से मुक्ति पाने के बाद बेहतर महसूस होना स्वाभाविक है।
उनके अनुसार कुछ ऐसे प्रमाण मिले हैं कि छींक की वजह से हमारे मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र में एंडोर्फिन्स स्रावित होते हैं और वे हमारे मस्तिष्क में आनंद की अनुभूति पैदा करते हैं। दरअसल, छींक शरीर को नुकसान पहुंचाने वाले कारकों से मुक्त कराने वाली एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। छींक हमारी नाक की भीतरी सतहों पर विभिन्न वजहों से पड़ने दबाव को निरस्त करने के लिए एक नैसर्गिक उपाय है। जब छींक ठीक से काम करती है, तो यह नाक के मार्ग के भीतर के वातावरण को पुनः चुस्त-दुरुस्त कर देती है, लेकिन साइनेसाइटिस जैसे नासिका रोगों से पीड़ित रोगियों को छींक से प्रभावी लाभ नहीं मिल पाता है।
कुल मिलाकर, सामान्यतया छींक आना कोई हानिकारक शारीरिक प्रक्रिया नहीं है। यदि छींक आ रही है तो उसे रोकने का प्रयास नहीं करना चाहिए। ऐसा प्रयास म्यूकस को साइनसों एवं कानों में पहुंचा सकता है जहां वह जीवाणु संक्रमण का कारण बन सकती है। छींक हमारे शरीर की एक प्राकृतिक सुरक्षा प्रणाली है जो हमें विभिन्न हानिकारक कणों और रोगाणुओं से बचाती है, इसलिए इसे आने दीजिए और अपने आसपास के लोगों को भी इसके बारे में जागरूक कीजिए।
– सुभाष चंद्र लखेड़ा
