हिंदी विवेक
  • Login
  • परिचय
  • संपादकीय
  • पूर्वांक
  • ग्रंथ
  • पुस्तक
  • संघ
  • देश-विदेश
  • पर्यावरण
  • संपर्क
  • पंजीकरण
No Result
View All Result
  • परिचय
  • संपादकीय
  • पूर्वांक
  • ग्रंथ
  • पुस्तक
  • संघ
  • देश-विदेश
  • पर्यावरण
  • संपर्क
  • पंजीकरण
No Result
View All Result
हिंदी विवेक
No Result
View All Result
राज्य बड़ा हुआ, समाज छोटा पड़ गया

राज्य बड़ा हुआ, समाज छोटा पड़ गया

by हिंदी विवेक
in सामाजिक
0

भारत की सभ्यता को समझने की सबसे बड़ी भूल यह रही कि स्वतंत्रता के बाद भारत को उसकी अपनी सभ्यतागत प्रकृति के अनुसार पुनर्गठित करने के बजाय उसे यूरोप में विकसित राजनीतिक और वैचारिक ढाँचों में ढालने का प्रयास किया गया। यह मान लिया गया कि जिस प्रकार यूरोप ने केंद्रीकृत State, आधुनिक Democracy, Social Justice, Nationalism और एकरूप कानून के माध्यम से स्वयं को संगठित किया, उसी प्रकार भारत को भी संगठित किया जा सकता है। यहीं से समस्या प्रारंभ होती है, क्योंकि भारत और यूरोप की ऐतिहासिक स्मृति, सामाजिक संरचना, धार्मिक दृष्टि और सभ्यतागत प्रकृति मूलतः भिन्न रही है।

यूरोप का इतिहास चर्च, साम्राज्य और केंद्रीकृत सत्ता के संघर्ष से निर्मित हुआ। वहाँ क्रिश्चियनिटी के विस्तार के साथ यह धारणा विकसित हुई कि सम्पूर्ण समाज को एकरूप “सभ्य” ढाँचे में ढालना आवश्यक है। स्थानीय परंपराएँ, बहुदेववादी आस्थाएँ, जनजातीय संस्कृतियाँ और प्राचीन सभ्यताएँ “असभ्य”, “पैगन” अथवा “बर्बर” घोषित की गईं। यूरोप, लैटिन अमेरिका, अफ्रीका और एशिया में अनेक प्राचीन सभ्यताओं का विनाश इसी “Civilizing Mission” अर्थात “सभ्य बनाने” के नाम पर हुआ। यह केवल धार्मिक विस्तार नहीं था; यह सांस्कृतिक नियंत्रण और केंद्रीकरण की प्रक्रिया थी।

People india Images - Free Download on Freepik

भारत में अंग्रेज उसी मानसिकता के साथ आए। उन्होंने केवल राजनीतिक शासन स्थापित नहीं किया, बल्कि भारतीय समाज की मूल संरचनाओं को तोड़ने का प्रयास किया। भारतीय ग्राम व्यवस्था, जाति-आधारित पेशागत तंत्र, स्थानीय अर्थव्यवस्था, कुल-परंपराएँ, लोकाचार, आश्रम व्यवस्था, गुरुकुल शिक्षा और धार्मिक संस्थाओं को पिछड़ा और अवैज्ञानिक घोषित किया गया। 1835 की मैकाले शिक्षा नीति केवल शिक्षा सुधार नहीं थी; वह भारतीय मस्तिष्क के पुनर्गठन की परियोजना थी। उद्देश्य ऐसा वर्ग तैयार करना था जो शरीर से भारतीय हो, परंतु सोच से यूरोपीय बने।

यहीं से भारत को यूरोपीय चश्मे से देखने की प्रक्रिया प्रारंभ हुई। भारतीय समाज को उसकी अपनी सभ्यतागत संरचना में समझने के बजाय यूरोपीय राजनीतिक सिद्धांतों के अनुसार परिभाषित किया जाने लगा। जबकि भारत कभी भी यूरोप की भाँति केंद्रीकृत Nation-State नहीं रहा। “Nation-State” का हिंदी अनुवाद “राष्ट्र-राज्य” कर देना स्वयं एक वैचारिक भ्रांति उत्पन्न करता है, क्योंकि भारत में “राष्ट्र” की अवधारणा सांस्कृतिक थी, राजनीतिक नहीं। भारत एक सांस्कृतिक राष्ट्र था, जिसमें अनेक राज्य, जनपद, गणराज्य, राजतंत्र और स्थानीय व्यवस्थाएँ सहअस्तित्व में थीं। यूरोप में Nation-State का निर्माण एक भाषा, एक चर्च, एक कानून और केंद्रीकृत सत्ता के आधार पर हुआ, जबकि भारत की एकता विविधता के भीतर विकसित हुई।

महाभारत, शुक्रनीति, कौटिल्य अर्थशास्त्र, बौद्ध ग्रंथ और जैन साहित्य स्पष्ट बताते हैं कि भारत में शासन की अनेक प्रणालियाँ थीं। कहीं राजतंत्र था, कहीं गणतंत्र, कहीं गणसंघ, कहीं वैराज्य, कहीं कुल-आधारित व्यवस्था। लिच्छवि, मल्ल, शाक्य जैसे गणराज्य थे। दक्षिण भारत में स्थानीय सभाएँ और ग्राम संस्थाएँ थीं। राजस्थान में क्षत्रिय कुलों की संरचनाएँ अलग थीं। पूर्वोत्तर में जनजातीय स्वशासन की परंपराएँ थीं। भारत ने कभी सम्पूर्ण भूभाग पर एक समान व्यवस्था थोपने का प्रयास नहीं किया। यही उसकी स्थिरता का आधार था।
भारतीय समाज की वास्तविक शक्ति राज्य में नहीं, समाज में थी। गाँव केवल प्रशासनिक इकाई नहीं था; वह आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और न्यायिक दृष्टि से स्वायत्त इकाई था। ब्रिटिश प्रशासक चार्ल्स मेटकॉफ ने भारतीय गाँवों को “Little Republics” कहा था। गाँव स्वयं अपने विवाद सुलझाते थे, संसाधनों का प्रबंधन करते थे और सामाजिक संतुलन बनाए रखते थे। राज्य का हस्तक्षेप सीमित था। इसी कारण समाज आत्मनिर्भर था।

आज जिस बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक निर्भरता को सामान्य मान लिया गया है, वह भारतीय समाज की स्वाभाविक स्थिति नहीं थी। जब गाँव आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर थे, तब प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी स्थानीय उत्पादन, शिल्प, कृषि, सेवा या परंपरागत व्यवसाय से जुड़ा था। समाज उत्पादन-आधारित था, उपभोग-आधारित नहीं। आज स्थिति यह है कि करोड़ों लोग सरकारी नौकरियों पर निर्भर मानसिकता में जी रहे हैं। यह परिवर्तन अचानक नहीं आया; यह केंद्रीकरण और राज्य-निर्भर व्यवस्था का परिणाम है।

स्वतंत्रता के बाद अंग्रेजों द्वारा निर्मित केंद्रीकृत State को समाप्त करने के बजाय उसी को और अधिक शक्तिशाली बनाया गया। नौकरशाही, न्यायपालिका, शिक्षा व्यवस्था, प्रशासनिक ढाँचा सब कुछ उसी औपनिवेशिक मानसिकता पर चलता रहा। अंतर केवल इतना आया कि सत्ता विदेशी हाथों से निकलकर भारतीय राजनीतिक वर्ग के हाथों में आ गई।

इसके साथ यूरोपीय विचारधाराएँ भारत पर आरोपित की गईं Socialism, Marxism, Secularism, आधुनिक Social Justice और केंद्रीकृत Democracy। समस्या यह नहीं थी कि इन विचारों पर विमर्श हुआ; समस्या यह थी कि इन्हें भारत की सभ्यतागत प्रकृति से ऊपर अंतिम सत्य मान लिया गया।

आधुनिक Social Justice का विचार भी भारतीय परंपरा से उत्पन्न नहीं हुआ। भारतीय परंपरा में न्याय का संबंध धर्म, कर्तव्य, संतुलन और औचित्य से था। कौटिल्य अर्थशास्त्र, शुक्रनीति और धर्मशास्त्रों में न्याय की चर्चा है, परंतु वहाँ समाज को स्थायी रूप से “शोषक” और “शोषित” वर्गों में विभाजित करके नहीं देखा गया। भारतीय चिंतन व्यक्ति को उसके कर्मों के आधार पर देखता था, उसके पूर्वजों के आधार पर नहीं।

इसके विपरीत आधुनिक Social Justice मुख्यतः यूरोपीय और अमेरिकी बौद्धिक परंपराओं से निकला विचार है Karl Marx का वर्ग-संघर्ष सिद्धांत, Fabian Socialism, John Rawls की न्याय अवधारणा, फ्रांसीसी क्रांति और अमेरिकी Civil Rights आंदोलन इसके प्रमुख स्रोत रहे। भारत में यह विचार औपनिवेशिक शिक्षा, नेहरूवादी समाजवाद, मंडल राजनीति और वामपंथी अकादमिक विमर्श के माध्यम से स्थापित हुआ।

INDIA-POLITICS

परिणाम यह हुआ कि भारतीय समाज को निरंतर संघर्षरत समूहों में विभाजित किया जाने लगा। स्त्री बनाम पुरुष, बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक, जाति बनाम जाति, गरीब बनाम अमीर, श्रमिक बनाम उद्योगपति समाज को एक जैविक इकाई के रूप में देखने के बजाय संघर्ष के मैदान की तरह देखा जाने लगा। यह दृष्टिकोण भारतीय सभ्यता की मूल चेतना के विपरीत था।

आरक्षण जैसी व्यवस्थाएँ प्रारंभ में सीमित और अस्थायी उपाय के रूप में लाई गई थीं, परंतु धीरे-धीरे वे स्थायी राजनीतिक संरचना बन गईं। आज स्थिति यह है कि प्रत्येक समुदाय स्वयं को “पिछड़ा” सिद्ध कर राज्य से विशेषाधिकार प्राप्त करना चाहता है। अधिकारों की राजनीति बढ़ी, परंतु कर्तव्यों का बोध घटता गया। समाज का बड़ा वर्ग यह मानने लगा कि राज्य उसका पालनकर्ता है और उसकी प्रत्येक समस्या का समाधान State करेगी।

यहीं वर्तमान Democracy की सबसे बड़ी समस्या दिखाई देती है। यह व्यवस्था धीरे-धीरे समाज को भीतर से उसी प्रकार खोखला कर रही है, जैसे घुन लकड़ी को भीतर से खाता है। बाहर से संरचना वैसी ही दिखाई देती है, परंतु भीतर उसका बल समाप्त हो चुका होता है। भारत में भी यही स्थिति बनती दिखाई दे रही है। चुनाव, घोषणाएँ, मुफ्त योजनाएँ, आरक्षण, पहचान-आधारित राजनीति और वोट बैंक इन सबने समाज को अधिकारों का उपभोक्ता बना दिया, उत्तरदायी समुदाय नहीं।

This Constitution does not Permit War | NewsClick

भारतीय समाज पहले कर्तव्य-आधारित था। परिवार, कुल, जाति, ग्राम और धर्म व्यक्ति को उत्तरदायित्व सिखाते थे। आज सब कुछ अधिकार-आधारित हो गया है। परिणामस्वरूप समाज का प्रत्येक वर्ग राज्य से कुछ न कुछ चाहता है, परंतु समाज और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों पर चर्चा कम होती जा रही है।

क्रिश्चियनिटी से प्रभावित यूरोपीय राजनीतिक दृष्टि समाज को भेड़ के झुंड” की तरह देखती है, जिसे केंद्रीकृत State नियंत्रित करके “सभ्य” बनाती है। यही मानसिकता आधुनिक प्रशासनिक संरचनाओं में भी दिखाई देती है। भारत में भी समाज को उसकी स्वाभाविक विविधताओं सहित स्वीकार करने के बजाय उसे एक समान कानूनी और वैचारिक ढाँचे में बाँधने का प्रयास हुआ। परिणामस्वरूप स्थानीय परंपराएँ, जातीय संस्थाएँ, लोकाचार और सांस्कृतिक संरचनाएँ लगातार कमजोर हुईं।

the largest democracy of India

भारत का विभाजन केवल 1947 की एक राजनीतिक घटना नहीं था। उसके पीछे लंबे समय तक चली सांस्कृतिक, शैक्षिक और सामाजिक विघटन की प्रक्रिया कार्य कर रही थी। अंग्रेजों ने भारत को केवल राजनीतिक रूप से नियंत्रित नहीं किया, बल्कि उसकी सभ्यतागत एकता को भी कमजोर करने का प्रयास किया। अंग्रेजी शिक्षा, औपनिवेशिक इतिहास-लेखन, जनगणना आधारित पहचान, पृथक निर्वाचन और समुदाय-आधारित राजनीति ने भारतीय समाज को उसकी सांस्कृतिक चेतना से काटकर जाति, पंथ, भाषा और धार्मिक पहचान के आधार पर पुनर्परिभाषित करना प्रारंभ किया। इसी परिस्थिति का लाभ इस्लामी पृथकतावाद को मिला और अंततः भारत का विभाजन हुआ।
पाकिस्तान केवल लगभग 80 वर्ष पूर्व बना, परंतु भारतीय भूभाग का विखंडन उससे बहुत पहले से होता रहा है। पिछले लगभग दो हजार वर्षों में भारतीय सभ्यता-क्षेत्र के लगभग 25 बड़े टुकड़े हो चुके हैं। अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, तिब्बत, म्यांमार और श्रीलंका जैसे अनेक क्षेत्र किसी न किसी कालखंड में भारतीय सांस्कृतिक प्रभाव क्षेत्र का हिस्सा रहे थे, परंतु समय के साथ वे अलग राजनीतिक इकाइयों में परिवर्तित हो गए। यह केवल सीमाओं का परिवर्तन नहीं था; यह भारतीय सभ्यतागत प्रभाव के क्रमिक क्षरण का संकेत भी था।

इतिहास यह स्पष्ट संकेत देता है कि जब भी भारत की सांस्कृतिक चेतना कमजोर हुई, जब समाज अपनी स्थानीय परंपराओं, ग्राम-आधारित संरचनाओं, धार्मिक-सांस्कृतिक संस्थाओं और सभ्यतागत आत्मबोध से दूर हुआ, तब विखंडन की प्रक्रियाएँ तेज हुईं। भारत की एकता कभी केवल राजसत्ता या सैन्य शक्ति पर आधारित नहीं रही; उसका वास्तविक आधार सांस्कृतिक निरंतरता, लोकपरंपराएँ और समाज की आंतरिक एकात्म चेतना थी।

आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत स्वयं को यूरोपीय वैचारिक चश्मे से देखना बंद करे। भारत की स्थिरता का आधार सर्वशक्तिमान State नहीं, बल्कि शक्तिशाली समाज रहा है। ग्राम स्वशासन, स्थानीय संस्थाएँ, कुल-परंपराएँ, धार्मिक-सांस्कृतिक संरचनाएँ और सामाजिक उत्तरदायित्व इन्हीं ने भारत को हजारों वर्षों तक जीवित रखा।
यदि भारत अपनी सभ्यतागत प्रकृति को समझे बिना केवल केंद्रीकरण, राज्य-नियंत्रण और पहचान-आधारित राजनीति के मार्ग पर चलता रहा, तो भविष्य में सामाजिक विखंडन, हिंसा और अस्थिरता की संभावनाएँ और बढ़ सकती हैं। भारत को बचाने का मार्ग उसकी विविधता को समाप्त करना नहीं, बल्कि उसे सम्मान देना है। क्योंकि भारत की शक्ति एकरूपता में नहीं, बल्कि सहस्रों विविधताओं के सहअस्तित्व में रही है।

– दीपक कुमार द्विवेदी

Share this:

  • Share on X (Opens in new window) X
  • Share on Facebook (Opens in new window) Facebook
  • Share on LinkedIn (Opens in new window) LinkedIn
  • Share on Telegram (Opens in new window) Telegram
  • Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp
Tags: civilization statecultural nationalismDemocracy exposedDemocracy का सचNation State Indiapolitical analysis hindipolitical podcast hindiSocial Justice debateग्राम स्वराजपश्चिमी विचारधाराभारत का विखंडनभारत की असली ताकतभारत की लोकतंत्र व्यवस्थाभारत बनाम यूरोपभारतीय इतिहासभारतीय राजनीतिभारतीय सभ्यताभारतीय समाजभारतीय संस्कृतिसनातन दृष्टि

हिंदी विवेक

Next Post
चांदी का स्वास्थ्य लाभ और वैज्ञानिक रहस्य

चांदी का स्वास्थ्य लाभ और वैज्ञानिक रहस्य

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

हिंदी विवेक पंजीयन : यहां आप हिंदी विवेक पत्रिका का पंजीयन शुल्क ऑनलाइन अदा कर सकते हैं..

Facebook Youtube Instagram

समाचार

  • मुख्य खबरे
  • मुख्य खबरे
  • राष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • क्राइम

लोकसभा चुनाव

  • मुख्य खबरे
  • मुख्य खबरे
  • राष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • क्राइम

लाइफ स्टाइल

  • मुख्य खबरे
  • मुख्य खबरे
  • राष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • क्राइम

ज्योतिष

  • मुख्य खबरे
  • मुख्य खबरे
  • राष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • क्राइम

Copyright 2024, hindivivek.com

Facebook X-twitter Instagram Youtube Whatsapp
  • परिचय
  • संपादकीय
  • पूर्वाक
  • देश-विदेश
  • पर्यावरण
  • संपर्क
  • पंजीकरण
  • Privacy Policy
  • Terms and Conditions
  • Disclaimer
  • Shipping Policy
  • Refund and Cancellation Policy

copyright @ hindivivek.org by Hindustan Prakashan Sanstha

Welcome Back!

Login to your account below

Forgotten Password?

Retrieve your password

Please enter your username or email address to reset your password.

Log In

Add New Playlist

No Result
View All Result
  • परिचय
  • संपादकीय
  • पूर्वांक
  • ग्रंथ
  • पुस्तक
  • संघ
  • देश-विदेश
  • पर्यावरण
  • संपर्क
  • पंजीकरण

© 2024, Vivek Samuh - All Rights Reserved

0