हिंदी विवेक
  • Login
  • परिचय
  • संपादकीय
  • पूर्वांक
  • ग्रंथ
  • पुस्तक
  • संघ
  • देश-विदेश
  • पर्यावरण
  • संपर्क
  • पंजीकरण
No Result
View All Result
  • परिचय
  • संपादकीय
  • पूर्वांक
  • ग्रंथ
  • पुस्तक
  • संघ
  • देश-विदेश
  • पर्यावरण
  • संपर्क
  • पंजीकरण
No Result
View All Result
हिंदी विवेक
No Result
View All Result
कुर्बानी या निर्मम हत्या ?

कुर्बानी या निर्मम हत्या ?

by हिंदी विवेक
in सामाजिक
0

विश्व की लगभग सभी धार्मिक परम्पराएँ मनुष्य को त्याग, करुणा, संयम और मानवता की ओर ले जाने का संदेश देती हैं। धर्म का मूल उद्देश्य मनुष्य को भीतर से शुद्ध करना और उसे अधिक संवेदनशील बनाना है, ताकि वह अपने भीतर की हिंसा, अहंकार और स्वार्थ पर विजय प्राप्त कर सके। इसी सन्दर्भ में कुर्बानी शब्द को समझना आवश्यक है। सामान्यतः इसे बलिदान या त्याग के रूप में देखा जाता है, किन्तु व्यवहार में यह अनेक स्थानों पर निरीह पशुओं की हत्या से जुड़ गया है। प्रश्न यह है कि क्या किसी बेजुबान प्राणी का वध वास्तव में कुर्बानी कहलाता है या यह केवल परंपरा के नाम पर एक हिंसक प्रक्रिया है?
कुर्बानी का वास्तविक अर्थ यदि त्याग है, तो वह त्याग मनुष्य को स्वयं अपने भीतर से करना चाहिए। अपने अहंकार का त्याग, अपने क्रोध का त्याग, अपने लोभ एवं हिंसक प्रवृत्तियों का त्याग करना चाहिए और यही सच्चे अर्थों में कुर्बानी है। जिस पीड़ा को मनुष्य स्वयं सहन नहीं करना चाहता, वही पीड़ा किसी निरीह जीव को देना गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। क्या आध्यात्मिकता का मार्ग किसी अन्य प्राणी के जीवन को समाप्त करके प्रशस्त हो सकता है?

ऐसी मान्यता है कि इस्लामी परम्परा में कुर्बानी की पृष्ठभूमि पैगम्बर इब्राहीम और उनके पुत्र इस्माइल की कथा से जुड़ी है। जिसके अनुसार पैगम्बर इब्राहीम (अब्राहम) को अल्लाह ने परीक्षा के रूप में अपने पुत्र इस्माइल की कुर्बानी देने का आदेश दिया था। इब्राहीम अपने पुत्र को अल्लाह की राह में बलिदान करने के लिए तैयार हो गए। किन्तु अन्तिम क्षण में अल्लाह ने इस्माइल के स्थान पर एक दुम्बा (भेड़) भेज दिया और उसकी कुर्बानी हुई। इसी घटना की स्मृति में मुसलमान कुर्बानी की परम्परा निभाते हैं।

अरबी शब्द कुर्बान का अर्थ है- ईश्वर के निकट होना। इसलिए इस परम्परा को केवल पशु वध नहीं, बल्कि त्याग, समर्पण और ईश्वर के प्रति आज्ञाकारिता का प्रतीक माना जाता है। किंतु समय के साथ इसका व्यावहारिक स्वरूप बड़े पैमाने पर पशु वध तक सीमित होता चला गया। जबकि किसी भी पूजा-पाठ का मूल सन्देश उसके आन्तरिक भाव में निहित होता है, न कि केवल बाहरी अनुष्ठान में।

आज यह विषय केवल धार्मिक परम्परा तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसका सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभाव भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। कई स्थानों पर कुर्बानी के नाम पर पशुओं का वध सार्वजनिक स्थानों, गलियों, खुले मैदानों और कभी-कभी जल स्रोतों के निकट किया जाता है। इससे न केवल लोगों की संवेदनशीलता प्रभावित होती है, बल्कि गम्भीर स्वच्छता और स्वास्थ्य सम्बंधी समस्याएँ भी उत्पन्न होती हैं।

खून, अवशेष और पशु अपशिष्ट जब खुले में या नदी-नालों में फेंक दिए जाते हैं, जिससे जल प्रदूषण, दुर्गंध और संक्रामक रोगों का खतरा बढ़ जाता है। शहरी क्षेत्रों में यह समस्या और भी गम्भीर रूप ले लेती है, जहाँ पहले से ही जनसंख्या घनत्व अधिक होता है। ऐसे में यह केवल धार्मिक मुद्दा नहीं रह जाता, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरणीय सन्तुलन का विषय बन जाता है।

इसी घटना पर यह प्रश्न भी उठता है कि जब पशु अधिकारों और पर्यावरण संरक्षण की बात आती है, तब पेटा (PETA) जैसे तथाकथित विभिन्न संस्थाएँ और संगठन अत्यन्त सक्रिय दिखाई देते हैं, किन्तु कुछ धार्मिक अवसरों पर होने वाले बड़े पैमाने के पशु वध और उससे उत्पन्न प्रभावों पर उनकी भूमिका अपेक्षाकृत सीमित क्यों दिखाई देती है। यह प्रश्न किसी संस्था विशेष पर आरोप नहीं है, बल्कि यह समाज में सम्वेदनशीलता के असन्तुलन की ओर संकेत करता है।

इसी प्रकार जब पतंगबाजी के दौरान डोर से पक्षियों के घायल होने या मरने की घटनाएँ होती हैं, तो उस पर भी व्यापक चर्चा और चिन्ता व्यक्त की जाती है। लेकिन बड़े पैमाने पर होने वाले पशु वध और उससे जुड़े पर्यावरणीय प्रभावों पर वैसा व्यापक विमर्श अक्सर नहीं देखा जाता। यह अन्तर समाज में प्रश्न खड़े करता है कि संवेदनशीलता के मानदण्ड समान क्यों नहीं हैं।

भारतीय सभ्यता ने सदियों से “अहिंसा परमो धर्मः” का संदेश दिया है। यहाँ जीव मात्र के प्रति करुणा को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। गौतम बुद्ध ने करुणा को धर्म का आधार बताया और महावीर स्वामी ने जीवदया को आध्यात्मिक साधना का मूल माना। सनातन परंपरा में भी प्रकृति और जीवों के साथ सह-अस्तित्व की भावना गहराई से निहित रही है।

यहाँ वृक्ष, नदियाँ, पशु-पक्षी और प्रकृति केवल संसाधन नहीं बल्कि जीवन के सहचर माने गए हैं। ऐसे में किसी भी प्रकार की हिंसा, चाहे वह धार्मिक नाम पर ही क्यों न हो, समाज के एक बड़े वर्ग की संवेदनाओं को प्रभावित करती है।

यदि कुर्बानी को केवल त्याग और समर्पण की भावना के रूप में देखा जाए, तो इसका एक अधिक मानवीय और आधुनिक विकल्प भी संभव है। आज के समय में सांकेतिक कुर्बानी की अवधारणा अधिक प्रासंगिक प्रतीत होती है, जिसमें किसी जीव की हत्या के बजाय व्यक्ति अपने संसाधनों और स्वार्थ का त्याग कर सकता है।

धन का दान, निर्धनों को भोजन कराना, शिक्षा और चिकित्सा में सहयोग देना, तथा समाज के वंचित वर्गों के जीवन स्तर को सुधारने के लिए सेवा-दान करने जैसे कार्य सही अर्थों में कुर्बानी की भावना को व्यक्त करते हैं। यदि कोई व्यक्ति अपने विलासिता भरे जिवन का त्याग कर किसी भूखे को भोजन दे, असहाय की सहायता करे, तो वह आध्यात्मिक दृष्टि से कहीं उचित कुर्बानी होगी।

इस दृष्टि से देखा जाए तो कुर्बानी का अर्थ जीवन समाप्त करना नहीं, बल्कि जीवन को बेहतर बनाना होना चाहिए। यही वह मार्ग है जो धर्म, करुणा और आधुनिक मानवता तीनों के बीच संतुलन स्थापित कर सकता है।

कुर्बानी का मूल भाव त्याग है और त्याग का सर्वोच्च रूप अपने भीतर की बुराइयों का त्याग है। किसी बेजुबान जीव की हत्या को कुर्बानी कहना केवल एक परम्परागत व्याख्या है, किन्तु नैतिक, पर्यावरणीय और मानवीय दृष्टिकोण से यह विषय पुनःर्विचार की मांग करता है।
धर्म का उद्देश्य मनुष्य को अधिक दयालु बनाना है, न कि संवेदनहीन। सभ्य समाज की पहचान उसकी करुणा, सन्तुलन और सभी जीवों के प्रति सम्मान से होती है। इसलिए आवश्यक है कि परम्पराओं को उनकी मूल भावना के साथ समझते हुए उन्हें अधिक मानवीय और समाधान-परक दिशा दी जाए।

– अखिलेश चौधरी

Share this:

  • Share on X (Opens in new window) X
  • Share on Facebook (Opens in new window) Facebook
  • Share on LinkedIn (Opens in new window) LinkedIn
  • Share on Telegram (Opens in new window) Telegram
  • Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp

हिंदी विवेक

Next Post
हिंदू राष्ट्र के मंत्रदृष्टा वीरवर सावरकर

हिंदू राष्ट्र के मंत्रदृष्टा वीरवर सावरकर

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

हिंदी विवेक पंजीयन : यहां आप हिंदी विवेक पत्रिका का पंजीयन शुल्क ऑनलाइन अदा कर सकते हैं..

Facebook Youtube Instagram

समाचार

  • मुख्य खबरे
  • मुख्य खबरे
  • राष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • क्राइम

लोकसभा चुनाव

  • मुख्य खबरे
  • मुख्य खबरे
  • राष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • क्राइम

लाइफ स्टाइल

  • मुख्य खबरे
  • मुख्य खबरे
  • राष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • क्राइम

ज्योतिष

  • मुख्य खबरे
  • मुख्य खबरे
  • राष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • क्राइम

Copyright 2024, hindivivek.com

Facebook X-twitter Instagram Youtube Whatsapp
  • परिचय
  • संपादकीय
  • पूर्वाक
  • देश-विदेश
  • पर्यावरण
  • संपर्क
  • पंजीकरण
  • Privacy Policy
  • Terms and Conditions
  • Disclaimer
  • Shipping Policy
  • Refund and Cancellation Policy

copyright @ hindivivek.org by Hindustan Prakashan Sanstha

Welcome Back!

Login to your account below

Forgotten Password?

Retrieve your password

Please enter your username or email address to reset your password.

Log In

Add New Playlist

No Result
View All Result
  • परिचय
  • संपादकीय
  • पूर्वांक
  • ग्रंथ
  • पुस्तक
  • संघ
  • देश-विदेश
  • पर्यावरण
  • संपर्क
  • पंजीकरण

© 2024, Vivek Samuh - All Rights Reserved

0