पसीना आना हमारे शरीर की एक बहुत जरूरी और प्राकृतिक प्रक्रिया है। गर्म मौसम, व्यायाम, मसालेदार भोजन, घबराहट, तनाव या बुखार जैसी स्थितियों में हमें पसीना आता है। कुछ लोगों को मधुमेह, हृद्पात, चिंता या अतिसक्रिय थायराइड जैसी समस्याओं के कारण भी अधिक पसीना आ सकता है। थोड़ी मात्रा में पसीना आना शरीर के लिए जरूरी है, क्योंकि इससे शरीर का तापमान नियंत्रित रहता है। लेकिन बहुत कम पसीना आना भी नुकसानदेह हो सकता है, क्योंकि इससे शरीर गरम होकर खतरे में पड़ सकता है। दूसरी ओर, बहुत अधिक पसीना आना मानसिक परेशानी पैदा कर सकता है।
समय के साथ वैज्ञानिकों ने त्वचा में मौजूद स्वेद ग्रंथियों और उनकी कार्यप्रणाली का अध्ययन शुरू किया। धीरे-धीरे यह स्पष्ट हुआ कि त्वचा में छोटे-छोटे छिद्रों के जरिए पसीना बाहर निकलता है।
कई सदियों के शोध के बाद यह समझ आया कि शरीर का तापमान एक निश्चित सीमा में बना रहता है। स्वस्थ व्यक्ति का तापमान आम तौर पर लगभग 37 डिग्री सेल्सियस होता है। जब बाहरी वातावरण बहुत गरम हो जाता है, तब शरीर अपने अंदर बनी अतिरिक्त गर्मी को बाहर निकालने की कोशिश करता है। यह काम मुख्य रूप से मस्तिष्क के एक भाग, अधश्चेतक (हाइपोथैलेमस), द्वारा नियंत्रित होता है। अधश्चेतक को शरीर का “थर्मोस्टेट” कहा जा सकता है।

जब शरीर का तापमान बढ़ता है, तो अधश्चेतक त्वचा की रक्त वाहिकाओं को फैलने का संकेत देता है। इससे त्वचा की सतह पर अधिक रक्त पहुंचता है और गर्मी बाहर निकलने लगती है। अगर केवल इससे पर्याप्त ठंडक न मिले, तो स्वेद ग्रंथियां सक्रिय होकर पसीना बनाने लगती हैं। जब यह पसीना त्वचा से वाष्पित होता है, तो वह शरीर की गर्मी अपने साथ ले जाता है। इसी कारण हमें राहत महसूस होती है।
पसीना मुख्य रूप से पानी होता है, लेकिन इसमें थोड़ा-बहुत नमक, यूरिया और अन्य पदार्थ भी होते हैं। बहुत गरम और शुष्क मौसम में पसीना जल्दी सूख जाता है, इसलिए शरीर को जल्दी ठंडक मिलती है। लेकिन यदि हवा में नमी अधिक हो, तो पसीना देर से सूखता है। इसलिए उमस भरा मौसम अधिक असहज लगता है। ऐसे मौसम में शरीर से निकलने वाला पसीना त्वचा पर टपकता तो रहता है, लेकिन उसे वाष्पन के लिए पर्याप्त जगह नहीं मिलती। नतीजा यह होता है कि शरीर को उतनी ठंडक नहीं मिल पाती जितनी मिलनी चाहिए।
पसीना केवल गर्मी के कारण ही नहीं आता। भावनात्मक तनाव, शर्म, घबराहट या डर जैसी स्थितियों में भी पसीना आ सकता है। इस प्रकार का पसीना आम तौर पर हथेलियों, तलवों, कांख और माथे पर अधिक दिखाई देता है। दूसरी ओर, शरीर के तापमान बढ़ने पर पसीना पूरे शरीर में आ सकता है। यानी पसीने का कारण चाहे शारीरिक हो या मानसिक, दोनों ही स्थितियों में तंत्रिका तंत्र स्वेद ग्रंथियों को सक्रिय करता है।

पसीना बनाने वाली दो मुख्य ग्रंथियां होती हैं: एक्क्राइन और एपोक्राइन। एक्क्राइन ग्रंथियां शरीर में अधिक संख्या में होती हैं और ये सीधे त्वचा की सतह पर पसीना छोड़ती हैं। यही ग्रंथियां शरीर को ठंडा रखने में सबसे ज्यादा मदद करती हैं। एपोक्राइन ग्रंथियां कम संख्या में होती हैं और मुख्यतः बगल, भौंह, पेडू और कुछ अन्य क्षेत्रों में पाई जाती हैं। इनसे निकलने वाला स्राव थोड़ा गाढ़ा होता है और उसमें गंध भी हो सकती है।
शरीर में पसीने की मात्रा कई बातों पर निर्भर करती है, जैसे उम्र, लिंग, शरीर का वजन, फिटनेस, वातावरण और आनुवंशिकी। जो लोग शारीरिक रूप से अधिक सक्रिय और फिट होते हैं, उनमें शरीर का तापमान बढ़ने पर पसीना जल्दी आ सकता है। यह इस बात का संकेत है कि उनका ताप-नियंत्रण तंत्र अच्छी तरह काम कर रहा है।
बहरहाल, कभी-कभी शरीर आवश्यकता से अधिक पसीना बनाने लगता है। इसे हाइपरहाइड्रोसिस कहते हैं। इसमें बिना किसी स्पष्ट कारण के बहुत अधिक पसीना आता है। यह समस्या बगल, हथेलियों, तलवों और चेहरे पर अधिक दिख सकती है। कई मामलों में इसका कारण स्पष्ट नहीं होता, लेकिन कभी-कभी यह किसी बीमारी से जुड़ी हो सकती है। ऐसे मामलों में डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है।
हाइपरहाइड्रोसिस मानसिक और सामाजिक परेशानी पैदा कर सकता है। व्यक्ति को बार-बार कपड़े बदलने पड़ सकते हैं, असहजता महसूस हो सकती है और कई बार आत्मविश्वास पर भी असर पड़ता है। इसलिए अगर किसी को लगातार और असामान्य रूप से अधिक पसीना आता हो, तो इसका कारण जानना चाहिए।
कुल मिलाकर पसीना हमारे शरीर की एक उपयोगी और आवश्यक क्रिया है। यह शरीर को ठंडा रखने, तापमान संतुलित रखने और गर्मी से बचाने में मदद करता है। पसीना कब आता है, क्यों आता है और कैसे आता है, यह समझने के लिए वैज्ञानिकों ने बहुत लंबे समय तक शोध किया।
आज हम जानते हैं कि मस्तिष्क, त्वचा, रक्त वाहिकाएं और स्वेद ग्रंथियां मिलकर इस प्रक्रिया को नियंत्रित करती हैं। इसलिए पसीना कोई साधारण बात नहीं, बल्कि शरीर की सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण तरीका है।
– सुभाष चंद्र लखेड़ा

